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अदालत के फ़ैसले के बाद क्या समलैंगिक अब शादी कर पाएंगे?
सुप्रीम कोर्ट ने आज फ़ैसला सुनाते हुए समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. अब अगर दो वयस्क आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा.
लेकिन ये फ़ैसला इतना अहम क्यों है? ये तो वही शख़्स सबसे बेहतर तरीक़े से बता सकता है जिसने इसका दर्द सहा हो.
पुणे के रहने वाले गे कपल समीर समरुद्धा और अमित गोखले ने पहले 2010 में शादी की. उसके बाद दोबारा 2014 में क़ानूनी तौर पर शादी रचाई जब अमरीका में एलजीबीटी शादियों को मान्याता मिली. भारत में धारा 377 पर आज के फ़ैसले पर समीर और अमित ने बीबीसी मराठी सेवा से बात की.
उनका कहना है, "हमारे पास शब्द नहीं हैं. ये एक भावनात्मक पल है. भारत में दोयम दर्जे के नागरिक लगते थे. ऐसा लगता था मानो हम अपराधी हों. ये देख कर दुख होता था कि हमारे प्यार को समाज स्वीकार नहीं करता. पर आज के फ़ैसले के बाद हम खुश हैं. अब हम अपने समाज में बिना किसी डर के रह सकते हैं. आज वही फ़ीलिंग आ रही है जो 1947 में आजादी के बाद लोगों ने फ़ील की होगी."
क्या समलैंगिक अब शादी कर पाएंगे?
लेकिन सवाल अब भी कई हैं - क्या समीर और अमित की शादी को भारत में अब स्वीकार किया जाएगा?
क्या समलैंगिकों को शादी का अधिकार होगा?
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील आनंद ग्रोवर के मुताबिक़, "इस फ़ैसले के बाद ऐसा नहीं है कि इस समुदाय के लोगों को शादी का अधिकार मिल जाएगा."
उनके अनुसार, देश में फ़िलहाल कोई क़ानून नहीं है जिसके आधार पर समलैंगिक शादी कर सकें. बाहर किसी देश में शादी करके वो देश में आते हैं तो भी वहां उनकी वैध शादी, यहां वैध होगी या नहीं इस पर भी अभी सवाल हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि फिर समलैंगिकों को शादी का अधिकार कैसे मिलेगा?
इस सवाल के जवाब में आनंद ग्रोवर कहते हैं, "इसके लिए सरकार को क़ानून बदलना पड़ेगा. क़ानून संसद में बनेगा. कोर्ट सरकार को क़ानून बनाने का आदेश नहीं दे सकता."
तीन तलाक़ के फ़ैसले का हवाला देते हुए आनंद ग्रोवर कहते हैं, "जिस तरह से कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक क़रार दिया, फिर केन्द्र सरकार इस पर बिल लेकर आई, वैसे ही इस मामले में भी सरकार पहल कर सकती है."
लेकिन क्या ये इस फ़ैसले का यही इकलौता पेंच है?
इस पर आनंद ग्रोवर कहते हैं ''ऐसा नहीं है. अब तक इस समुदाय को सहमति से भी संबंध बनाने की इजाज़त ही नहीं थी. अब जब सहमति से संबंध बनाना अपराध नहीं है तो एलजीबीटी समुदाय के लोगों के साथ रेप, यौन हिंसा, यौन उत्पीड़न के मामले भी अब सामने आ सकते हैं. ऐसे में क़ानून कैसे इसे डील करेगा इस पर भी सरकार को अब सोचना होगा.''
उनके मुताबिक़ आज का ये फ़ैसला केवल समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने का है.
तो क्या समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार भी होगा? इस सवाल के जबाव में आनंद ग्रोवर कहते हैं इस फ़ैसले के बाद गोद लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा.
उनके मुताबिक़, जायदाद में हिस्सा लेने पर फ़िलहाल उन पर रोक नहीं है और इस फ़ैसले का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
समुदाय से जुड़े लोगों की राय
आरिफ़ ज़फ़र एक ऐसे ही शख़्स हैं जो धारा 377 के तहत जेल भी जा चुके हैं.
आरिफ़ बताते हैं कि उनका गे ग्रुप देश का पहला ग्रुप था. साल 1991 में उन्होंने एक ग्रुप शुरू किया. बड़ी मुश्किल से कुछ लोगों को इस ग्रुप से जोड़ा गया था. वो कहते हैं कि सरकार नहीं चाहती थी कि कोई ऐसा ग्रुप बने और इसी के चलते उन्हें और उनके साथियों को जेल में डाल दिया गया.
कुछ ऐसा ही कहना हमसफ़र ग्रुप से जुड़े अली का भी है. वो बताते हैं कि उनके पार्टनर के साथ रेप हुआ था जिसके बाद जब वो पुलिस स्टेशन पहुंचे तो उनके साथ बहुत ही बुरा सलूक हुआ. अली का कहना है कि वो ख़ुद भी बहुत डरे हुए थे कि कहीं उन पर धारा 377 न लगा दी जाए.
लेकिन अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है तो समुदाय के लोगों के लिए रास्ते खुल गए हैं.
अली कहते हैं कि 'अब कम से कम हम मदद मांगने से तो नहीं डरेंगे.'
सुप्रीम कोर्ट को इस संबंध में 30 से ज़्यादा याचिकाएं मिली थीं, जिसमें समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने समेत कई दूसरी मांगें भी की गई थीं. इनमें शादी और बच्चा गोद लेने को भी क़ानूनी बनाए जाने की मांग थी, लेकिन कोर्ट ने उस पर कोई भी फ़ैसला नहीं सुनाया है.
फ़ैसले से एलजीबीटी समुदाय के लोग खुश तो हैं, लेकिन उनका मानना है कि उनकी लड़ाई अब भी ख़त्म नहीं हुई है. एलजीबीटी समुदाय से जुड़ी बेबो कहती हैं कि 'क़ानून ने तो हमें खुश होने की सौगात दे दी है, लेकिन समाज को भी हमें स्वीकार करना चाहिए. बिना उसके कुछ भी बदलेगा नहीं.'
पर क्या फ़ैसला है और क्या कमियां हैं?
वरिष्ठ अधिवक्ता अवनि बंसल ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट ने धारा 377 पर जो फ़ैसला दिया है वो सिर्फ़ संवैधानिकता पर आया फ़ैसला है.
उनका कहना है कि समलैंगिक संबंधों से जुड़े अभी बहुत से ऐसे मामले हैं जिन पर आने वाले दिनों में नए सिरे से सोचना होगा. हालांकि इस फ़ैसले से उन लोगों को ज़रूर राहत मिलेगी जिन पर समलैंगिक सबंधों के आरोप में मामले चल रहे हैं.
आरिफ़ जाफ़र भी इस बात से खुश हैं कि कोर्ट ने उन्हें वही अधिकार देने की बात कही जो एक आम नागरिक के हैं, लेकिन वो ये भी मानते हैं कि अभी बहुत से मुद्दे हैं जिनमें आगे बढ़ना होगा.
वो कहते हैं "हमें ये सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि हमारी हिस्सेदारी समाज के हर तबक़े में हो. पिछले इतने सालों से जिस तरह इस समुदाय को दबा कर रखा गया था वो अब ख़त्म होना चाहिए. समाज को इस सोच से उबरने की ज़रूरत है."
लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया में सलाहकार सौम्या सक्सेना भी यही मानती हैं. सौम्या का कहना है कि क़ानून ने भले अपना फ़ैसला सुना दिया हो, लेकिन इसे अभी सामाजिक स्तर पर आना बाकी है. हालांकि वो ये ज़रूर मानती हैं कि ये पहला क़दम है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
पांच जजों की संवैधानिक पीठ में शामिल जस्टिस नरीमन ने कहा ये कोई मानसिक बीमारी नहीं है. केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को ठीक से समझाए ताकि एलजीबीटी समुदाय को कलंकित न समझा जाए.
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