ब्लॉगः याद कीजिए, आडवाणी ने भी कहा था फिर लग सकती है इमरजेंसी

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- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, संपादक, बीबीसी हिंदी रेडियो
लालकृष्ण आडवाणी ने तब भी कहा था और अगर कोई आज पूछे तो शायद फिर कहेंगे कि तीन साल पहले उन्होंने इमरजेंसी की चेतावनी फ़िलहाल देश का नेतृत्व कर रहे किसी व्यक्ति को निशाने में रख कर नहीं दी थी.
पर उस चेतावनी को अगर आप आज 'शहरी नक्सलवाद' के संदर्भ में पढ़ें तो उसके नए अर्थ समझ में आएँगे.
आडवाणी ने इमरजेंसी की 40वीं सालगिराह पर खरे शब्दों में चेतावनी दी थी: "मैं ये नहीं कहता कि राजनीतिक नेतृत्व परिपक्व नहीं है. लेकिन कमियों के कारण विश्वास नहीं होता... कि इमरजेंसी फिर कभी नहीं लग सकती."
उन्होंने ये भी कहा कि "ऐसा कोई उपाय नहीं किया गया है जिससे ये भरोसा जगे कि नागरिकों की आज़ादी अब कभी ख़त्म नहीं की जा सकेगी.... बुनियादी अधिकारों को फिर से ख़त्म किया जा सकता है."
इंडियन एक्सप्रेस को दिए इस इंटरव्यू में उन्होंने जनतंत्र और उसके तमाम दूसरे पहलुओं के प्रति प्रतिबद्धता न होने पर चिंता जताई थी.
क्या लालकृष्ण आडवाणी को तब वो सब नज़र आ रहा था जो किसी और को नज़र नहीं आया?

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विपरीत विचार पर विश्लेषण एक
इस साल की शुरुआत में पुणे के पास भीमा कोरेगाँव में हुए दलित विरोध प्रदर्शन और दलित विरोधी हिंसा के बाद पुलिस ने मानवाधिकार के लिए काम करने वाले बुद्धिजीवियों, कवि-लेखकों और प्रोफ़ेसरों की गिरफ़्तारी की है.
जिसके बाद प्रशांत भूषण से लेकर अरुंधति रॉय तक कह रहे हैं कि देश में इमरजेंसी से भी ज़्यादा गंभीर हालात पैदा हो गए हैं. आडवाणी की भी चिंता थी कि इमरजेंसी के बाद ऐसे उपाय नहीं किए गए कि फिर इमरजेंसी लगने का ख़तरा पूरी तरह ख़त्म हो गया हो.
कितनी दिलचस्प बात है कि विचारधारात्मक तौर पर हमेशा विपरीत ध्रुवों पर रहने वाले लोग मौजूदा परिस्थितियों का लगभग एक जैसा विश्लेषण करते हुए एक जैसे नतीजे निकालते नज़र आ रहे हैं.
जब आडवाणी ने इमरजेंसी के प्रति ख़बरदार किया था तब बहुत से लोगों ने उनके इस बयान को राजनीति की बिसात पर नरेंद्र मोदी से मात खाने से पैदा हुई खीझ का नतीजा माना था.
हालाँकि आडवाणी ने हमेशा इससे इनकार किया कि उनकी टिप्पणी किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ थी.

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मोदीमय भारत
तब नरेंद्र मोदी को सत्ता सँभाले सिर्फ़ एक बरस हुआ था. तब तक न भीमा कोरेगाँव में दलितों ने यलग़ार परिषद का आयोजन किया था, न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश के ब्लूप्रिंट वाली चिट्ठी का कोई अता पता था.
तब तक गोमांस रखने के शक में दादरी के मोहम्मद अख़लाक़ की लिंचिंग भी नहीं हुई थी. न ही जगह-जगह पर गोरक्षकों के गिरोह जिस तिस को पकड़ पकड़ कर पीट रहे थे.
उन कट्टर मोदी विरोधियों को थोड़ी देर के लिए नज़रअंदाज़ कर दें जिन्हें मोदी में हमेशा ही एक तानाशाह की छवि नज़र आती है. पर उस वक़्त आडवाणी के अलावा किसी और को ये कहने का ख़्याल नहीं आया कि देश में इमरजेंसी का ख़तरा बना हुआ है.
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बल्कि उद्योगपति, व्यापारी, डिप्लोमैट, पत्रकार, ज़्यादातर बुद्धिजीवी और वोटरों की भारी तादाद ये मान रही थी कि काँग्रेस के कुशासन से देश को मुक्ति मिल गई है और अब देश विकास के पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ेगा.
तब तक वो रात भी नहीं आई थी जब मोदी ने टेलीविज़न के पर्दे से हज़ार और पाँच सौ के नोटों को रद्दी के टुकड़ों में बदलने की घोषणा की थी. तब तक वो आधी रात भी नहीं आई थी जब मोदी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश की संसद में बटन दबाकर देश की दूसरी आज़ादी के अंदाज़ में जीएसटी लागू किए जाने की घोषणा की थी.
व्यापारियों को तब अंदाज़ा नहीं था कि नोटबंदी और जीएसटी का क्या नतीजे निकलने वाले हैं.

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उदार विचारों पर सवाल
ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि आख़िर लालकृष्ण आडवाणी को अपने आसपास ऐसा क्या दिखा जिससे उन्हें लगा कि इमरजेंसी फिर से लग सकती है और नागरिक अधिकारों को फिर से मुल्तवी किया जा सकता है?
लेकिन उन परिस्थितियों का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है जिनमें नागरिक अधिकार कमज़ोर किए जा सकते हैं और हुकूमतों को किसी तरह के व्यापक विरोध का डर भी नहीं होता. इमरजेंसी लगाकर ऐसी परिस्थितियाँ एक झटके में बनाई जा सकती हैं.
लेकिन इमरजेंसी लगाए बिना ये काम करने के लिए बरसों से ज़मीन तैयार करनी होती है. इसके लिए उदार विचारों को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है.
मानवाधिकार को एक संदेहास्पद शब्द बना दीजिए और जब मानवाधिकारों का मुद्दा उठाया जाए तो कहिए कि क्या सिर्फ़ आतंकवादियों के मानवाधिकार होते हैं. उसके बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को 'शहरी नक्सल' और 'देशद्रोहियों' के पैरोकार बताकर मनचाहे ढंग से हमले कीजिए.

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धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज़्म को एक घृणास्पद शब्द में बदल दीजिए और इतनी बार उसे विकृत प्रवृत्ति बताइए कि लोग ख़ुद को सेक्युलर कहने से घबराने लगें. फिर धर्मनिरपेक्षता पर निशाना साधना सबसे आसान होगा.
ट्रेड यूनियन को 'नेतागिरी' का नाम देकर कामगारों के इस जनतांत्रिक अधिकार को इतना हास्यास्पद और नकारात्मक बना दीजिए कि कर्मचारी और मज़दूर ख़ुद ही ट्रेड यूनियन से नफ़रत करने लगें.
ध्यान देने वाली बात है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ साथ पिछले दो तीन दशक में ये सभी काम खुल कर हुए हैं. इसमें जिन लोगों की बड़ी भूमिका रही है उनमें ख़ुद लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं.
उन्होंने सेक्युलरिज़्म को एक फ़र्ज़ी और विकृत विचार के तौर पर पेश किया. उनकी कोशिश का ही नतीजा है कि पहले सेक्युलरिज़्म की बात करने वालों को मुस्लिम परस्त कह कर ख़ारिज कर दिया जाता था, पर अब उन्हें पाकिस्तान जाकर बसने की सलाह दी जाती है.
पीवी नरसिम्हा राव की नई आर्थिक नीतियों के साथ ही देश भर में ट्रेड यूनियन आंदोलन भी कमज़ोर हुआ. कई जगहों पर कामगार यूनियनों की कमर टूट गई और उन्हें कामगारों के अधिकारों की रक्षा करने वाले जनतांत्रिक मंच की बजाए कामचोरों की पनाहगाह माना जाने लगा.

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अर्बन नक्सल क्या अपराधी हैं?
आज सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार के उसके समर्थक और सरकारी मशीनरी कहती है कि छुपेरुस्तम माओवादी हमारे शहरों के कोने कोने में विश्वविद्यालय प्रोफ़ेसरों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के वेश में छिपे हुए हैं.
ये लोग चुनी हुई सरकार को हिंसा के ज़रिए उखाड़ना चाहते हैं. इनकी शिनाख़्त करके इनके ख़िलाफ़ चुन चुन कर कार्रवाई करके ही देश को माओवादी क्रांति की चपेट में आने से बचाया जा सकता है.
जिन लोगों पर पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी पार्टी से जुड़े होने का आरोप लगाया है, उन्हें दोषी साबित करना पुलिस की ज़िम्मेदारी है. लेकिन पुलिस को याद रखना होगा कि किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने भर से किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती, चाहे फिर वो प्रतिबंधित माओवादी पार्टी का सदस्य ही क्यों न हो.

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गिरफ़्तार लोगों को 'अर्बन नक्सल' या शहरी माओवादी होने का आरोप लगने भर से अपराधी मान लेने वालों को 15 अप्रैल, 2011 को पास किए गए आदेश को एक बार फिर ग़ौर से पढ़ लेना चाहिए.
छत्तीसगढ़ में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर बिनायक सेन पर देशद्रोह का आरोप लगाकर राज्य पुलिस ने उन्हें जेल में डाल दिया था. इस मामले में निचली अदालत ने उन्हें आजन्म कारावास की सज़ा भी सुना दी थी.
पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर सेन को ज़मानत दे दी और कहा, "ये एक जनतांत्रिक देश है. वो (माओवादियों के साथ) सहानुभूति रख सकते हैं. लेकिन सिर्फ़ इतने से ही उन्हें राष्ट्रद्रोह का अपराधी नहीं माना जा सकता."
इससे पहले 4 फ़रवरी, 2011 को असम के प्रतिबंधित संगठन उल्फ़ा के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था — "किसी प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता लेने मात्र से ही किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता है, जब तक वो हिंसा में लिप्त न हो या दूसरों को हिंसा के लिए भड़का न रहा हो, या शांति भंग करने के मक़सद से हिंसा न कर रहा हो."

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"शहरी माओवादी" होने के आरोप में पाँच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी से चार दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में 'शहरी नक्सलवाद - अदृश्य दुश्मन' नाम से एक सेमीनार करवाया गया था.
इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन सचिव सुनील आंबेडकर मुख्य अतिथि थे. सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा इस कार्यक्रम की मुख्य वक्ता थीं. उन्होंने कहा, "एक ज़ोर लगाना है इनको पूरा निकालने के लिए... केरल, मीडिया और जेएनयू में ही तो बाक़ी हैं."
विद्यार्थी परिषद के नेता आंबेडकर ने कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों के बारे में कुछ इस तरह बात की जैसे वो अपनी पहचान छिपाकर यहाँ वहाँ छिपे कोई अपराधी हों. उन्होंने कहा, "जेएनयू में 2016 में जो कुछ हुआ वो ठीक नहीं था पर उससे एक अच्छी बात ये हुई कि उस घटना के बाद फ़िल्म उद्योग, पत्रकारिता और विश्वविद्यालयों में छिपे कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों का पर्दाफ़ाश हो गया. वो स्लीपिंग सेल की तरह काम कर रहे थे."
उन्होंने ये नहीं बताया कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी या भाकपा - माले (लिबरेशन) भारत के संविधान के तहत काम करती हैं और उन्हें स्लीपिंग सेल की तरह काम करने की ज़रूरत नहीं है.

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पहले भी उठी शहरी माओवाद की बात
यानी शहरी नक्सलवाद पर किए जा रहे सेमीनार में नक्सलियों के साथ-साथ ऐसी कम्युनिस्ट पार्टियों को भी लपेट लिया गया जो संघ की कृपा से नहीं बल्कि संविधान के तहत चल रही हैं. काँग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये बताना होगा कि क्या वो ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं जो काँग्रेस के साथ साथ तमाम दूसरी विचारधाराओं वाली पार्टियों को भी ख़त्म करना चाहती है?
ध्यान रखिए कि 'शहरी माओवादी' मौजूदा बीजेपी सरकार की दिमाग़ की उपज नहीं हैं. 2014 से पहले काँग्रेस सरकार में गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी कई बार शहरों में 'माओवादियों के समर्थकों' की मौजूदगी की बात कही थी.
यूपीए सरकार के दूसरे दौर में माओवादी हिंसा में अचानक उफ़ान आया था. छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी और उत्तर प्रदेश की सीमा आज़ाद और उनके पति विश्व विजय जैसे कार्यकर्ताओं को काँग्रेस सरकार के इसी दौर में ही गिरफ़्तार किया गया था.

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पुलिस ने सोनी सोरी को भी माओवादी बताया था और उन पर जबरन वसूली जैसे संगीन जुर्म लगाए थे. सीमा आज़ाद और विश्व विजय को तो निचली अदालत ने माओवादी होने के जुर्म में आजीवन क़ैद की सज़ा भी सुना दी थी. पर बाद में हाईकोर्ट से उन्हें राहत मिल गई.
इन सभी परिस्थितियों को समाज शास्त्री प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में इन शब्दों में समझाया है: "जो हम आज देख रहे हैं वो ऐसी ख़तरनाक स्थिति है जो आहिस्ता आहिस्ता गहरा रही है. ये एक ऐसा मनोवैज्ञानिक जाल है जिसमें सब लोग ग़द्दार हैं. अदालतों और सिविल सोसाइटी को ऐसी सत्ता का प्रतिरोध करना चाहिए जो हमारे शरीर ही नहीं बल्कि आत्माओं को भी थका मारना चाहती है."
ऐसा लिखने के लिए क्या प्रताप भानु मेहता भी शहरी नक्सलियों के "स्लीपिंग सेल" के सदस्य क़रार दिए जाएँगे?
महाराष्ट्र पुलिस ने कहा है कि भीमा कोरेगाँव प्रदर्शनों के बाद मारे गए छापों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने की साज़िश का पर्दाफ़ाश हुआ है.
जिस चिट्ठी के आधार पर पुलिस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की माओवादी साज़िश का पर्दाफ़ाश करने का दावा कर रही है उसके बारे में वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा ने लिखा है कि अगर ये चिट्ठी फ़र्ज़ी है तो भारतीय जनतंत्र ख़तरनाक समय में प्रवेश कर चुका है.
क्या ऐसा लिखने के लिए प्रेम शंकर झा को भी कम्युनिस्टों की स्लीपिंग सेल का सदस्य मान लिया जाएगा?
आने वाले दिनों में अदालतों में ये सभी सवाल पूछे जाएँगे और पुलिस को संगीन आरोप सिद्ध करने के लिए सिर्फ़ जवाब नहीं ठोस सबूत देने होंगे.



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