You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भीमा कोरेगांव: क्या है नज़रबंदी, ट्रांज़िट रिमांड...जैसे शब्दों का मतलब
- Author, दलजीत अमी
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी पंजाबी
पुणे पुलिस ने मंगलवार को पांच बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ़्तार किया.
ये हैं वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस.
गिरफ़्तार किए गए सभी लोग मानवाधिकार और अन्य मुद्दों को लेकर सरकार के आलोचक रहे हैं. उन पर आरोप है कि वे भीमा कोरोगांव हिंसा को भड़काने में शामिल थे.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में गिरफ़्तार लोगों को छह सितंबर तक हाउस अरेस्ट यानी नज़रबंद रखने के लिए आदेश दिए हैं.
पिछले साल 31 दिसंबर को दलितों ने एक बड़ी रैली का आयोजन किया था, जो बाद में झड़प में बदल गई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने जिस हाउस अरेस्ट का ज़िक्र किया है, वो क़ानून होता क्या है, चलिए जानते हैं -
हाउस अरेस्ट या नज़रबंदी
भारतीय क़ानून में हाउस अरेस्ट का ज़िक्र नहीं है. इसका मतलब सिर्फ़ इतना होता है कि गिरफ़्तार किया गया व्यक्ति अपने घर से बाहर न निकल पाए. इसमें व्यक्ति को थाने या फिर जेल नहीं ले जाया जाता है.
हाउस अरेस्ट के दौरान गिरफ़्तार व्यक्ति किस से बात करे, किससे नहीं, इस पर पांबदी लगाई जा सकती है. उन्हें सिर्फ़ घर के लोगों और अपने वकील से बातचीत की इजाज़त दी जा सकती है.
आगे कोई अपराध न हो और सबूतों या फिर गवाहों को अभियुक्त प्रभावित न कर सके, उस स्थिति में हाउस अरेस्ट को सही माना जाता है.
- यह भी पढ़ें | नज़रबंद रहेंगे गिरफ़्तार 'मानवाधिकार कार्यकर्ता'
सर्च वॉरंट
सर्च वॉरंट वो क़ानूनी अधिकार है जिसके तहत पुलिस या फिर जांच एजेंसी को घर, मकान, बिल्डिंग या फिर व्यक्ति की तलाशी के आदेश दिए जाते हैं.
पुलिस इसके लिए मजिस्ट्रेट या फिर ज़िला कोर्ट से इजाज़त मांगती है. अपराध के सबूतों का पता लगाने के लिए कोर्ट से इसकी इजाज़त मांगी जाती है.
अपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 91, 92 और 93 के तहत जांच एजेंसी इसकी इजाज़त मांगती है.
अगर पुलिस अपने क्षेत्र से बाहर सर्च वॉरंट चाहती है तो उसे स्थानीय कोर्ट से संपर्क करना होता है. इजाज़त मिलने के बाद उसे स्थानीय पुलिस को भी जांच में शामिल करना होता है. स्थानीय पुलिस थाने में इसका लिखित ज़िक्र किया जाता है.
जघन्य अपराध के मामले में पुलिस बिना सर्च वॉरंट के तलाशी ले सकती है. अगर अभियुक्त को गिरफ़्तार करने की ज़रूरत होती है तो पुलिस को तलाशी का अधिकार होता है.
अगर किसी बिल्डिंग में सिर्फ़ औरतें रहती हैं तो तलाशी सूरज डूबने के बाद और सूर्योदय के पहले नहीं ली जा सकती है.
अरेस्ट वॉरंट या गिरफ़्तारी के आदेश
किसी अभियुक्त को गिरफ़्तार करने के लिए कोर्ट अरेस्ट वॉरंट जारी करता है. अरेस्ट वॉरंट के तहत संपत्ति की तलाशी ली जा सकती है और उसे ज़ब्त भी किया जा सकता है.
अपराध किस तरह का है, उसके आधार पर यह ज़मानती और गैर-ज़मानती हो सकता है. अगर गिरफ़्तारी पुलिस को अपने निर्धारित क्षेत्र से बाहर करनी होती है तो उसे स्थानीय पुलिस का सहयोग लेना ज़रूरी है. इसके बारे में स्थानीय पुलिस थाने में लिखित ज़िक्र किया जाता है.
संज्ञेय अपराध के मामले में पुलिस अभियुक्त को बिना अरेस्ट वॉरंट के गिरफ़्तार कर सकती है. पुलिस को गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर कोर्ट में प्रस्तुत करना होता है.
धारा 41 के तहत पुलिस को गिरफ़्तार व्यक्ति को ज़मानत की प्रक्रिया बतानी होती है. उसे इससे संबंधित दूसरी जानकारी भी देनी होती है.
सीआरपीसी की धारा 41 के अनुसार पुलिस किसी को गिरफ़्तार तभी कर सकती है जब उसके ख़िलाफ़ कोई शिकायत दर्ज की गई हो, या फिर कोई पुख़्ता सूचना मिली हो. गिरफ़्तारी उस शिकायत के तहत की जा सकती है जिसके सिद्ध होने पर सात साल से ज़्यादा की सज़ा हो.
गिरफ़्तारी उस स्थिति में की जाती है जिसमें यह आशंका होती है कि अभियुक्त आगे अपराध को अंजाम दे सकता है या फिर सबूतों या जांच को प्रभावित कर सकता है.
इस क़ानून के तहत पुलिस को गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ़्तारी के संबंध में बताना होता है. 41D गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि पुलिसिया पूछताछ के दौरान वो अपने वकील से संपर्क साध सके.
ट्रांज़िट रिमांड या प्रत्यर्पण की मांग
गिरफ़्तारी के 24 घंटे के अंदर अभियुक्त को संबंधित कोर्ट में पेश करना होता है. अगर गिरफ़्तारी क्षेत्र से बाहर हुई हो या फिर कोर्ट में प्रस्तुत करने में वक़्त ज़्यादा लग सकत है तो स्थानीय कोर्ट में ट्रांज़िट रिमांड के लिए पेशी की जाती है.
सीआरपीसी की धारा 76 के मुताबिक यह ज़रूरी होता है. मजिस्ट्रेट कोर्ट से ट्रांज़िट रिमांड मिलने के बाद ही पुलिस गिरफ़्तार व्यक्ति को अपने क्षेत्र में ले जा सकती है.
- यह भी पढ़ें | 'मौजूदा सियासी सिस्टम के प्रति असहिष्णुता दिखाई'
हेबियस कॉरपस या बंदी प्रत्यक्षीकरण
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 में हेबियस कॉरपस का ज़िक्र किया गया है. यह एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ होता है कि "आपके पास शरीर है."
अगर किसी व्यक्ति को ग़लत तरीके से गिरफ़्तार किया गया हो, उसे हिरासत में अवैध तरीके से रखा गया हो और 24 घंटे के भीतर उसे कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया हो तो गिरफ़्तार शख़्स का कोई नजदीकी दोस्त या परिवार का सदस्य कोर्ट में हेबियस कॉरपस की याचिका डाल सकता है.
याचिका संवैधानिक कोर्ट, हाई कोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में डाली जा सकती है. इस पर सुनवाई उसी दिन किया जा सकता है, जिस दिन यह याचिका लगाई गई हो. या फिर ज़रूरत पड़ने पर जज के घर पर भी की जा सकती है.
ग़ैर-कानूनी गतिविधियां प्रतिबन्ध कानून (UAPA)
ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां क़ानून साल 1962 में देश की संप्रुभता और एकता की रक्षा करने के लिए बनाया गया था. इसे 2004 के बाद कई बार लागू किया गया है.
चरमपंथी या ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों को समर्थन देने की आशंका में इस क़ानून के तहत बिना गिरफ़्तारी वॉरंट के किसी को हिरासत में लिया जा सकता है.
अगर सरकार यह समझती है कि व्यक्ति का संबंध किसी चरमपंथी संगठन या प्रतिबंधित संस्था से है तो इस क़ानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है.
इस क़ानून के तहत सामान की ज़ब्ती की जा सकती है. इस विशेष क़ानून के तहत पुलिस को छह महीने के भीतर आरोप पत्र दाखिल करना होता है जबकि सामान्य क़ानून के तहत आरोप पत्र तीन महीने के भीतर दाखिल करना ज़रूरी होता है.
इस क़ानून के तहत जमानत मिलना कठिन होता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)