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'मौजूदा सियासी सिस्टम के प्रति असहिष्णुता दिखाई'
पुणे पुलिस ने कहा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ़्तार किए गए पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ उनके पास पुख़्ता सबूत हैं.
बुधवार को पुणे में एक प्रेसवार्ता में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शिवाजी बोडखे ने कहा, "इन लोगों ने मौजूदा राजनीतिक सिस्टम के प्रति असहिष्णुता दिखाई है. ये लोग उच्च पदों पर बैठे सियासी लोगों को भी टारगेट बना रहे थे."
मंगलवार को पुणे पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों में छापे मारकर सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुन फ़रेरा को गिरफ़्तार कर लिया था.
पहले पुलिस ने सिर्फ़ इतना ही कहा है कि यह इस साल जनवरी में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की जांच का हिस्सा है.
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक जनहित याचिका की सुनवाई के बाद कहा कि गिरफ़्तार किए गए पांचों लोगों को घर पर नज़रबंद रखा जाए.
पुलिस के सबूत
बुधवार को पुणे पुलिस ने गिरफ़्तारी की वजहें गिनाने के लिए प्रेसवार्ता बुलाई.
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शिवाजी बोडखे ने कहा, "सबूत सटीक तौर पर इस ओर संकेत करते हैं कि ये लोग जानबूझ कर प्रतिबंधित संस्था सीपीआई(एम) की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थे. "
इसके अलावा पुलिस ने फंड मुहैया करवाने से जुड़े सबूत भी होने की बात कही.
पुलिस अधिकारी ने कहा, "इन अर्बन नक्सलियों को ये ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो युवाओं और छात्रों को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाएं. हमारे पास इन्हें हथियार दिए जाने के भी सबूत हैं."
प्रतिबंधित संस्थाओं से रिश्ते
पुलिस का कहना है कि गिरफ़्तार किए गए लोग सक्रिय रूप से और जानबूझ कर, ग़ैर-कानूनी कार्यों में संलिप्त रहे हैं जिनकी वजह से बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों और मासूम नागरिकों की जान गई है.
इकट्ठा किए गए कुछ सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि हिंसा को बढ़ावा देने वाली ग़ैर-कानूनी संस्थाओं से भी इनके संबंध थे.
पुणे की अदालत में अरुन फ़रेरा, वरवरा राव और नरनॉन गोंज़ाल्विस की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील उज्ज्वला पवार ने भी कहा कि ये लोग प्रतिबंधित संस्था सीपीआई(एम) के सदस्य हैं.
पवार ने कहा कि पिछले साल बुलाई गई यलगार परिषद के पीछे भी सीपीआई(एम) का ही हाथ था.
सरकारी वकील का कहना था कि इन लोगों ने भारत की लोकतांत्रित सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ रखी है. उन्होंने ये भी कहा कि सीपीआई(एम) ने वरवरा राव को नेपाल और मणिपुर से हथियार ख़रीदने का अधिकार दिया हुआ था.
सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि फ़रेरा और गोंज़ाल्विस के जिम्मे छात्र संगठनों से संपर्क साधना और आंदोलन के लिए नए रंगरूट तैयार कर उन्हें ट्रेनिंग पर नक्सल इलाकों में भेजना था.
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