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नज़रिया: 'क्या गोगोई का कोर्ट मार्शल बन पाएगा मिसाल'
- Author, मसूद हुसैन
- पदनाम, मैनेजिंग एडिटर, कश्मीर लाइफ़
आख़िरकार, मेजर नितिन लीतुल गोगोई को सेना के निर्देशों के ख़िलाफ़ स्थानीय लोगों के साथ मेल-जोल बढ़ाने और ड्यूटी की जगह से दूर रहने का दोषी पाया गया है और अब उन्हें कोर्ट मार्शल का सामना करना पड़ेगा.
भारत के थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने खुलेआम कहा था कि अगर अगर गोगोई 'दोषी पाए गए' तो ऐसा दंड मिलेगा, जो दूसरों के लिए 'एक मिसाल बनेगा.'
अप्रैल 2017 से मई 2018 के 14 महीनों की अवधि में गोगोई दो बार अखबारों की सुर्खियां बने और कश्मीर की वादियों से बाहर लोगों ने उनका नाम जाना.
ख़ास बात ये है कि दोनों ही घटनाएं 'बुरी और डरावनी' थीं. पहली, घटना में उन्होंने एक शख़्स को मानव ढाल बनाकर सेना की जीप से बांध दिया था, और दूसरी घटना में वो एक स्थानीय लड़की को होटल के कमरे में ले जाने की कोशिश कर रहे थे.
भारत प्रशासित कश्मीर में दोनों ही घटनाओं पर जमकर बवाल मचा. लोगों का कहना था कि ये घटनाएं कानून का उल्लंघन तो हैं ही, मानवता, नैतिकता और सेना की सैन्य आबादी के साथ बरते जाने वाले व्यवहार के ख़िलाफ़ भी है. हालाँकि आम जनता से अलग सरकारी विभागों ने इन घटनाओं पर कुछ अलग ही तरह की प्रतिक्रिया दी.
मीडिया की वाहवाही
गोगोई ने जब बडगाम के फ़ारूक़ अहमद डार को मानव ढाल के रूप में जीप से बांधा, तो उन्हें हीरो के रूप में पेश किया गया. उनकी इस 'दिलेरी', 'होशियारी' और 'नई तरकीब' को मीडिया के एक ताक़तवर वर्ग ने न केवल हाथों-हाथ लिया, बल्कि इसके लिए जनरल साहब से गोगोई को बाकायदा एक प्रशस्ति पत्र भी मिला.
बॉलीवुड के एक निर्माता तो इस सीन से कुछ इस तरह प्रभावित हुए कि उन्होंने न केवल इसे अपनी फ़िल्म में लिया, बल्कि डार के रोल के लिए एक कश्मीरी 'एक्स्ट्रा' को भी लिया.
गोगोई के इस कारनामे का जश्न मनाने वालों का विरोध करने वाले बहुत कम थे. लेफ्टिनेंट जनरल एचएस पनाग ने ट्विटर पर लिखा था, "जीप के सामने बांधे गए 'पत्थरबाज़' की तस्वीरें भारतीय सेना और देश को हमेशा डराती रहेंगी. जब राज्य ही आतंकवादियों की मिरर इमेज लगने लगे तो ये एक चेतावनी है."
इन दो लाइनों के ट्वीट के लिए जनरल पनाग को भी ट्रोल किया गया था.
सेना में आठ साल तक सिपाही रहने के बाद अनिवार्य परीक्षा पास कर ऑफ़िसर रैंक तक पहुँचे गोगोई पहले ही 'सुपरहीरो' थे. उनके काम करने का अंदाज़ ही कुछ अलग रहा है. सैन्य अभियान वाले पहाड़ी इलाक़े से उतरकर वे अपने एक सहयोगी के साथ एक रात के लिए शहर में आए. उनके साथ एक ग़रीब शख्स की बेटी भी थी, जिनके घर गोगोई कथित रूप से पहले भी गए थे.
ऐसी ही एक घटना उत्तरी कश्मीर के बांदीपोर गांव में सैनिकों के एक दल के साथ हुई थी, जब स्थानीय निवासियों ने इन सैनिकों को पकड़ लिया था और फिर बड़े जुलूस की शक्ल में उन्हें अपने साथ मुख्य शहर ले आए थे. जब इन्हें (सैनिकों) पुलिस को सौंपा गया, तो वे अधमरी हालत में थे.
कश्मीरियों को न्याय!
अगर सेना ने 7 अप्रैल 2017 के पत्थरबाज़ों को सबक सिखाने के गोगोई के 'मानव ढाल' के तरीके पर कार्रवाई की होती, तो शायद गोगोई का 23 मई वाला 'कारनामा' भी न होता.
अब गोगोई कोर्ट मार्शल का सामना करेंगे. उन्हें कुछ सज़ा भी मिल सकती है. लेकिन कश्मीर में, ज़्यादातर लोगों को इंसाफ़ की उम्मीद नहीं है, और इसकी वजह ये है कि अधिकांश चरमपंथ निरोधक मामलों में न्याय करते और होते हुए पारदर्शिता नहीं बरती जाती. पथरीबल इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है जहाँ पाँच नागरिकों को ज़िंदा जला दिया गया था.
उन्हें छित्तीसिंहपुरा नरसंहार में 35 सिखों का हत्यारा बता दिया गया था. ये साल 2000 के मार्च महीने की वही तारीख़ है जब दिल्ली में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन उतरे थे.
सीबीआई ने इस मामले की जाँच की और पाँच सैनिकों को इस हत्याकांड के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. इस मामले में भी कोर्ट मार्शल की कार्रवाई की गई, लेकिन कहा गया कि ऐसा कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं है जिससे "किसी भी अभियुक्त के ख़िलाफ़ प्रथम दृष्ट्या मामला बनता हो." अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है.
माचिल फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले का नतीजा भी कुछ ऐसा ही रहा था. जब तीन युवकों की नियंत्रण रेखा के नजदीक हत्या कर दी गई थी और उन्हें विदेशी बताया गया था. साल 2010 में हुई इस घटना की घाटी में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. स्थानीय नागरिक और सैनिकों का कई जगह आमना-सामना हुआ और 100 से अधिक आम नागरिक मारे गए थे.
इन तीन युवकों की हत्या की लिए छह सैनिकों को जिम्मेदार ठहराया गया और उनके ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू की गई. दो साल के बाद सेना ने कहा कि अभियुक्तों को उम्र क़ैद दी गई है, साल 2017 में मामला सशस्त्र बल ट्राइब्यूनल के पास पहुँचा और यहाँ छह में से पाँच अभियुक्तों की सज़ा निलंबित कर दी गई.
जानकारी
दिल्ली के एक सूचना अधिकार कार्यकर्ता ने कोर्ट ऑफ़ इनक्वायरी की जानकारी मांगी. उन्हें कहीं से पता चला था कि सेना ने पथरीबल मामले में कोर्ट मार्शल की कार्रवाई नहीं की है, सेना को आरटीआई के तहत जानकारी देने के निर्देश दिए गए, लेकिन सेना दिल्ली हाई पहुँच गई और आरटीआई के ख़िलाफ स्टे हासिल कर लिया. सेना की दलील थी कि ऐसी सूचना देने से लोग भड़क सकते हैं और देश की सुरक्षा और संप्रुभता को ख़तरा हो सकता है.
लेकिन गोगोई का मामला कश्मीर के लिए 'कुछ नहीं है', ऐसा नहीं है. 14 महीनों में आई इन दो तस्वीरों ने दो मोर्चों पर कश्मीर की अलग छवि दिखाई है.
इसने दिखाया है कि सैनिक किस तरह से चरमपंथ रोधी अभियानों में मानव ढाल का इस्तेमाल कर रहे हैं, एक ऐसी व्यवस्था जिसने पिछले 30 सालों में कई लोगों की जानें ली हैं. कश्मीर में लोग लंबे समय से इंसाफ़ की राह तक रहे हैं. अभी तक सामाजिक जोर इतिहास की किताब को बेदाग रखने पर रहा है. फिर भी कोर्ट मार्शल का कदम स्वागतयोग्य है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक 'कश्मीर लाइफ़' के मैनेजिंग एडिटर हैं)