नज़रिया: एनडीए छोड़ने का मन बना चुके हैं उपेंद्र कुशवाहा?

- Author, सुरूर अहमद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
अगर केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर यकीन किया जाए तो राज्य में एक नई तरह की सियासी खीर (गठबंधन) पक रही है, जिसका विस्तार पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और झारखंड में भी हो सकता है.
मगर इस तरह का गठजोड़ 1930 के त्रिवेणी संघ की तरह नहीं होगा जब यादव, कोइरी और कुर्मी एक साथ आए थे. न ही उस तरह से, जैसे आज से ठीक 28 साल पहले अगस्त 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद वे एकजुट हुए थे.
बिहार में नया सियासी गठजोड़?
इस तरह के गठजोड़ का विचार कुशवाहा ने पूर्व मुख्यमंत्री बीपी मंडल की 100वीं जयंती पर पेश किया, जिनकी अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण पर रिपोर्ट ने उत्तर भारत के बड़े हिस्से में राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे.
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख ने यदुवंशी और कुशवाहावंशी गठजोड़ पर बात की और इसमें अति पिछड़ी जातियों और दलितों को शामिल करने पर ज़ोर दिया. वहीं, तेजस्वी ने उनके इस बयान पर ट्वीट किया कि यह 'खीर' काफ़ी स्वादिष्ट होगी.

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इसका मतलब यह निकलता है कि इस गठजोड़ से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति कुर्मी बाहर रहेगी.
ये काफ़ी ख़ास बात होगी क्योंकि कोइरी और कुर्मी समीकरण को हमेशा लव-कुश जैसी जोड़ी कहा जाता रहा है.
उपेंद्र कुशवाहा अपने इस फॉर्मूले को ज़मीन पर लाने मे कामयाब होंगे या नहीं, यह चर्चा का विषय नहीं है.
बात यह है कि इससे एक नया गठजोड़ पैदा हो जाएगा जिसमें चार अगड़ी जातियां - ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ और साथ ही बनिया व कुर्मी भी शामिल नहीं होंगी.

ऐसे में एनडीए ज़रूर इन पर ध्यान देने की कोशिश करेगा.
हालांकि ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगा कि अति पिछड़ी जातियां और दलित, राजद, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और कांग्रेस के गठजोड़ के लिए उत्साह दिखाएंगे.
क्या ये पूर्व नियोजित था?
हालांकि बहुत से राजनीतिक पर्यवेक्षक कुशवाहा के विचार को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं क्योंकि उन्होंने 25 अगस्त को पटना में दिए भाषण में ऐसा शायद इसलिए कह दिया हो क्योंकि श्रोताओं में यादवों की संख्या अच्छी ख़ासी थी.
मगर तथ्य यह है कि इस नए सामाजिक समीकरण में बिहार में एनडीए की नींद उड़ाने की क्षमता है.
यहां ज़िक्र करना ज़रूरी है कि बीपी मंडल खुद बिहार के मधेपुरा ज़िले के यादव परिवार से थे.

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राष्ट्रीय लोक समता पार्टी कभी भी नीतीश के साथ सहज नहीं रही है क्योंकि बहुत से लोग मानते हैं कि वह खुद को बहुत ज़्यादा आंकने लगे हैं.
राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि हमेशा यह कहते आए हैं कि कोइरी नंबरों के मामले में कुर्मियों से काफी मज़बूत हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि कोइरी पूरे बिहार में मौजूद हैं मगर पटना और नालंदा जिलों में कुर्मियों की अच्छी खासी तादाद है.
राज्य की राजधानी में शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में उनका प्रभाव भी अच्छा ख़ासा है.

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दोनों ही मूलरूप से कृषक जातियां हैं जो पिछले तीन दशकों में आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर उभरी हैं.
नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा के रिश्ते
पिछड़ी जातियों में यादवों की संख्या सबसे ज्यादा है मगर उनके साथ समस्या यह है कि वे भले ही राजनीतिक रूप से मज़बूत हों मगर शिक्षा के मामले में वे कोइरी और कुर्मियों से पीछे हैं.
कोइरी और कुर्मी की नौकरशाही में भी अच्छी मौजूदगी है.
बनियों के साथ कोइरी और कुर्मी ही हैं जो मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद सबसे ज़्यादा लाभ उठा पाए हैं.
भले ही उपेंद्र कुशवाहा तभी से आरजेडी को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं, जब से नीतीश कुमार एनडीए में वापस आए हैं.
मगर सच यह है कि उन्होंने अक्सर नरेंद्र मोदी के समर्थन वाली टिप्पणियां करके जनता दल युनाइटेड और बीजेपी में बहुत से लोगों को अटकलें लगाने के लिए छोड़ दिया है.

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अगर वह आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में शामिल होते हैं तो वह ज़रूर अपना हिस्सा चाहेंगे.
नीतीश कुमार जिस तरह से खुद को कोइरी और कुर्मियों के नेता के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं, यह बात हमेशा से कुशवाहा को खटकती आई है.
महागठबंधन में वह बड़े कद वाला नेता बनकर उभरने की संभावना तलाशेंगे क्योंकि आरजेडी के प्रमुख लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और उनकी सेहत भी दुरुस्त नहीं है. ऐसे में नेतृत्व तेजस्वी के हाथ में है.
दूसरी बात यह है कि वह बड़े करीब से इस बार पर नज़र रख रहे हैं कि हो सकता है कि बिहार और अन्य राज्यों के राजनीतिक हालात एनडीए के पक्ष में न रहें.
पार्टी के अंदर के लोग मानते हैं कि कुशवाहा अभी पाला नहीं बदलना चाहते क्योंकि वह मंत्री के तौर पर अपने संसाधनों का पूरा इस्तेमाल करना चाहते हैं. मगर व्यवहारिकता में देखें तो लगता है कि वह एनडीए छोड़ने का मन बना चुके हैं.

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