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हिमाचल प्रदेश में सोने से भी महंगा बिक रहा है ये नशा
- Author, पंकज शर्मा
- पदनाम, शिमला से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"मुझे नशा ख़रीदने के लिए पैसे दे दो, नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा."
ये किसी फ़िल्म का डायलॉग नहीं बल्कि देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में बढ़ते नशे की लत के आदी हो गए एक नौजवान राजू (बदला हुआ नाम) की कहानी है.
सफ़ेद दिखने वाला पाउडर, जिसके एक ग्राम की क़ीमत क़रीब 6000 रुपये है. सोने से भी मंहगा बिकने वाला ये नशा चिट्टा कहलाता है.
इसकी तस्दीक खुद हिमाचल प्रदेश के डीजीपी सीता राम मरढ़ी ने बीबीसी से की, "नशे के सौदागरों के लिए ये पैसे कमाने का सबसे आसान धंधा बन गया है."
इसका असर हिमाचल प्रदेश की नई नस्ल के ऊपर दिखने लगा है. जैसा कि राजू के शब्दों से जाहिर होता है, "इसकी आदत पड़ गई है. नहीं मिलने पर नींद नहीं आती है."
सोने से भी मंहगा चिट्टा
शिमला मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और मनोचिकित्सक डॉक्टर रवि शर्मा बताते हैं, "किसी भी नशे के सेवन के नुक़सान अलग-अलग तरह के होते हैं."
"लेकिन चिट्टा का एक ऐसा नशा है जिसका एक या दो बार सेवन करने के बाद, कोई भी इसका आदी हो जाता है. और इसे छुड़ाने के लिए कई बार मरीज़ को भर्ती भी करना पड़ता है."
सफेद रंग के पाउडर सा दिखने वाला ये नशा एक तरह का सिंथेटिक ड्रग्स है. हेरोइन के साथ कुछ केमिकल्स मिलाकर ये ड्रग्स तैयार किया जाता है.
हाल ही में हिमाचल के अलग-अलग जगहों से गिरफ़्तार हुए नशे के सौदागरों से ये बात सामने आई है कि कैसे वो युवाओं और बच्चों को अपने जाल में फंसाते हैं.
राजू ने भी इसके बारे में बताया, "जो नशा करते हैं, वही इसे आगे बढ़ा रहे हैं. उन्हें इतना पैसा घर से नहीं मिलता तो वे इसका बिज़नेस करने लगते हैं. ताकि खुद का काम भी चल जाए और लोगों से थोड़ा पैसा भी मिल जाए."
कारण क्या हो सकते हैं?
लेकिन ये सवाल तो उठता ही है कि हिमाचल प्रदेश में पहले तो कभी ऐसी चीज़ें देखी-सुनी नहीं जाती थी?
हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र विभाग के विभागध्यक्ष प्रोफ़ेसर मोहन झारटा बताते हैं, "हिमाचल में आम लोगों के जीवन स्तर में बड़ा सुधार और अच्छा पैसा होना इसकी एक बड़ी वजह है."
"कई माता-पिता ज्यादा लाड़-प्यार कर बच्चों की हर अच्छी-बुरी आदत को नजरअंदाज कर देते हैं जो बाद में उन पर भारी पड़ जाती है."
"इसके अलावा बेरोज़गारी और तेजी से बदलता नया माहौल भी एक बड़ा फ़ैक्टर है."
"युवाओं के पास रोज़गार ना होने की वजह से भी वो कई बार नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं. ये समाज के लिए एक गंभीर चुनौती है."
मौत के दोराहे पर...
एक ज़माने में इस पहाड़ी राज्य हिमाचल को बदनाम करने वाले भांग, अफ़ीम और चरस जैसे ख़तरनाक नशे की जगह अब चिट्टा ने ले ली है.
सफ़ेद पाउडर जैसा दिखने वाला ये नशा युवाओं की ज़िंदगी को मौत के दोराहे पर ले जा रहा है.
हिमाचल के स्थानीय साप्ताहिक ग्राम परिवेश के संपादक एमपी सिंह राणा कहते हैं, "चिट्टा का नशा पिछले कुछ समय में तेज़ी से बढ़ा है. हिमाचल प्रदेश में इस जानलेवा नशे की एंट्री क़रीब एक से दो साल पहले ही हुई है."
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "जब पंजाब में ड्रग तस्करों पर शिकंजा कसने लगा तो इस धंधे से जुड़े लोगों ने पंजाब के साथ लगने वाले हिमाचल प्रदेश के इलाकों को अपना टारगेट बनाया."
"हालांकि नशे का कोराबार हिमाचल में काफ़ी पहले से सक्रिय था लेकिन सरकार संभालते ही हमने सबसे पहले इस पर शिकंजा कसा और पिछले छह महीने में काफ़ी गिरफ्तारियां भी हुई हैं."
इसे सरकार की बड़ी कामयाबी बताते हुए उन्होंने कहा, "हिमाचल प्रदेश पुलिस ने प्रदेश की सीमा के साथ लगते राज्यों की पुलिस से संपर्क साध-कर एक संयुक्त रणनीति बनाई है ताकि नशे के इन सौदागरों पर शिकंजा कसा जा सके."
क्या कहती है पुलिस
हिमाचल प्रदेश पुलिस के डीजीपी सीता राम मरढ़ी कहते हैं, "चिट्टा नशे के कारोबारियों ने शुरुआत में हिमाचल के काँगड़ा और ऊना ज़िलों के पंजाब के साथ लगते गांव में अपना ठिकाना बनाया और फिर यहां से पूरे राज्य में अपना जाल बिछाना शुरू किया."
"शुरुआती दौर में पुलिस इन्हें पकड़ने में इसलिए नाकाम रही क्योंकि जब कहीं भी छापा पड़ता था तो नशे के ये सौदागर राज्य की सीमा पार करके इधर-उधर चले जाते थे."
लेकिन जब इस नशे की वजह से एक दो मौत के मामले सामने आए तो सरकार और पुलिस हरकत में आई.
डीजीपी का कहना है, "ड्रग माफ़िया के नेक्सस को तोड़ने के लिए हिमाचल पुलिस ने जब पंजाब पुलिस के साथ मिलकर संयुक्त ऑपरेशन के तहत इनके कई ठिकानों पर रेड की तो इनके नेटवर्क तोड़ने में बड़ी कामयाबी मिली."
"इसके अलावा स्कूल, ढाबों और सार्वजनिक जगहों पर अपनी गश्त बढ़ा कर पुलिस लगातार निगरानी कर रही है. ताकि ये आसानी से बच्चों और युवाओं को अपना शिकार न बना सके."
कहानी आंकड़ों की जुबानी
यही वजह है कि अगर पिछले तीन साल में पकड़े गए अभियुक्तों और नशे की खेप पर एक नज़र डालें तो आँकड़े चौंकाने वाले हैं.
डीजीपी सीता राम मरढ़ी बताते हैं, "साल 2016 में 501 अभियुक्तों के साथ 432 केस दर्ज किए गए. इस दौरान क़रीब 231 किलोग्राम चरस, 234 ग्राम हेरोइन, 64 ग्राम स्मैक, 4 ग्राम कोकीन पकड़ी गई."
"इसी तरह साल 2017 में 695 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 573 केस रजिस्टर किए गए. 134 किलो चरस, 2.5 किलो हेरोइन, 73 ग्राम स्मैक, 16 ग्राम कोकीन, 4 किलो ब्राउन शुगर भी पकड़ी गई."
"लेकिन 2018 में अभी छह महीनों के भीतर पुलिस ने 789 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 653 केस फ़ाइल किए."
इनमें सबसे चौंकाने वाली बात ये थी कि पुलिस की गिरफ़्त में छह विदेशी तस्कर भी आए.
इसी बीच पुलिस कारवाई के दौरान क़रीब 257 किलो ग्राम चरस, 4.6 किलो हेरोइन, 293 ग्राम स्मैक, 68 ग्राम कोकीन और तीन किलो ब्राउन शुगर पकड़ी गई. ये पिछले कुछ सालों की तुलना में दोगुनी है.
पुलिस जहां इसे अपनी एक बड़ी सफलता मानती है, वहीं स्थानीय लोगों का मानना है कि ये आकंड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि नशाखोरी हिमाचल प्रदेश में कितनी तेज़ी से अपने पैर-पसार रहा है.
सख्त क़ानून की उठी मांग
हालांकि पंजाब के कड़े क़ानून की तर्ज पर हिमाचल सरकार ने भी तेज़ी से फैल रही ड्रग तस्करी को रोकने के लिए कड़े क़दम उठाना शुरू कर दिया है.
लेकिन पंजाब सरकार के ड्रग तस्कर को फाँसी की सज़ा देने की वक़ालत करने के बाद हिमाचल में भी पंजाब की तर्ज़ पर सख्त क़ानून की माँग उठने लगी है.
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कहते हैं, "सरकार को ड्रग माफ़िया में अफ्रीकी और नाइजीरियाई तस्करों के शामिल होने के पुख़्ता सबूत मिले हैं. ये लोग दूसरे राज्यों से अपना नेटवर्क चला रहे हैं. इनमें कुछ विदेशी ड्रग तस्करों की गिरफ़्तारियाँ भी हुई हैं."
"हमारी कोशिश है कि हम हिमाचल से लगते सभी राज्यों पर अपनी चौकसी बढ़ाएंगे और इन्हें रोकने के लिए दूसरे राज्यों की सरकारों से भी बात करेंगे और कड़े से कड़े क़ानून बनाकर इसे ख़त्म करने की पूरी कोशिश करेगें."
वहीं, हिमाचल प्रदेश में तेज़ी से ड्रग माफ़िया के बढ़ रहे मामलों को गंभीरता से लेते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी चिंता जाहिर की है.
कोर्ट ने मादक पदार्थों के व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए राज्य सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं.
हिमाचल में तस्करों का नेटवर्क
सरकार, पुलिस और क़ानून भले ही सख़्त हो लेकिन सच्चाई ये भी है कि हिमाचल प्रदेश में कोई बड़ा रिहैबिलिटेशन सेंटर न होने की वजह से नशे की लत के शिकार युवाओं को सही राह पर लाना भी एक बड़ी चुनौती है.
जब यही सवाल मुख्यमंत्री से किया गया तो उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस पर तेज़ी से काम कर रही है और इससे कैसे कारगर ढंग से निपटा जाए, इसके लिए योजना बनाई जा रही है.
सरकार और पुलिस का दावा भले ही मजबूत हो, लेकिन रोजाना कहीं ना कहीं चिट्टा और दूसरे मादक पदार्थों के तस्करों का पकड़ा जाना भी इस बात का सबूत है कि हिमाचल में इनका नेटवर्क कितना मजबूत है.
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