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पंजाब में नशा दूर करने के लिए 'अफ़ीम की मांग'
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब में नशे से मुक्ति के लिए अब एक अजीब तरह की मांग ज़ोर पकड़ रही है. यह मांग है अफ़ीम और उसके पेड़ से निकलने वाली 'बुक्की' यानी बुरादे से प्रतिबंध हटाने की. हालांकि सारे चुनावी मुद्दों पर नशे का मुद्दा हावी हो गया है क्योंकि सभी राजनीतिक दलों ने नशे पर रोक का वादा किया है.
निर्दलीय उम्मीदवार तारसेम जोधा ने अफ़ीम से प्रतिबंध हटाने की मांग को ही अपने चुनाव प्रचार का 'स्लोगन' बना लिया है.
"नशा कनून सोदांगे, अफ़ीम बुक्की खोलांगे.....चिट्टे दा मूंह मोडांगे, नशा माफिया तोडांगे..." यानी नारा कहता है कि नशे से जुड़े कानून में संशोधन करेंगे जिसके तहत अफ़ीम और उसके पेड़ से निकलने वाली बुक्की यानी बुरादे पर प्रतिबंध लगाया गया है. नारे में कहा गया है कि 'चिट्टा' यानी सफ़ेद 'सिंथेटिक' नशे के पदार्थों पर रोक लगाएंगे और इसी तरह नशे के माफिया से मुकाबला करेंगे.
तारसेम जोधा अपने विधानसभा क्षेत्र- हल्का दाखा- को नशे की चपेट से मुक्ति दिलाने के लिए अब इस नारे का सहारा ले रहे हैं. लुधियाना शहर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जांगपुर गाँव में जब मेरी मुलाक़ात उनसे हुई तो वो बुजुर्गों से घिरे हुए थे.
अपने नारे पर चर्चा करते हुए तारसेम जोधा कहते हैं कि जबसे अफ़ीम पर प्रतिबंध लगाया गया है तबसे पंजाब में 'चिट्टा' यानी सफ़ेद नशीले पदार्थों का सेवन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है. वह कहते हैं कि जबतक लोग अफ़ीम और उससे जुड़े प्राकृतिक नशीले पदार्थों का सेवन करते रहे वो उतने ज़्यादा प्रभावित नहीं हुए जितना कुत्रिम तरीकों से बनाए गए सफ़ेद नशीले पदार्थ लोगों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं.
वो कहते हैं, "पहले अफ़ीम की खेती होती थी और लोग उसी का नशा करते थे. यह प्राकृतिक था और इसमें रसायन नहीं होता था. मगर अब रसायन वाले नशीले पदार्थ पंजाब की पूरी नस्ल को ख़राब कर रहे हैं. इसका सेवन करने वाले बमुश्किल चार से पांच साल ज़िंदा रहते हैं. घर के घर उजड़ गए हैं."
उनका कहना है कि इसी लिए उन्होंने अपने प्रचार में इस तरह का नारा दिया है जिससे लोग भी सहमत हैं. जांगपुर और इसके आसपास के रहने वाले लोग भी युवाओं में नशे की बढ़ती लत से काफी चिंतित हैं और वो बड़ी गंभीरता से तारसेम जोधा की बाते सुनते हैं.
यहीं के रहने वाले अमरजीत सिंह कहते हैं कि जिसको एक बार रसायनयुक्त सफ़ेद नशीले पदार्थों की लत लग जाती है उसके लिए इसे छोड़ना मुश्किल है. वो यह भी कहते हैं कि नशा छुडाने के लिए जो गोलियां 'नशा-मुक्ति केन्द्रों' पर दी जातीं हैं, उनसे लीवर और किडनी पर बुरा असर पड़ता है. इस लिए जो गाँव के लोगों के जो नशा करने के पुराने प्राकृतिक स्रोत थे वो इतने बुरे नहीं हैं. उनसे जान नहीं जाती थी.
मलकीत सिंह भी इसी गाँव के रहने वाले हैं और कहते हैं कि पूरे इलाके के नौजवान नशे की चपेट में हैं. वो कहते हैं, "सरकार को चाहिए कि वो अफ़ीम और डोडे के सरकारी ठेके खोल दे, जैसे राजस्थान में हैं. उससे स्मैक, हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों का चलन बंद हो जाएगा. पंजाब का नौजवान बच जाएगा. परिवार बच जाएंगे."
लुधियाना शहर के एक 'डी-एडिक्शन सेंटर' के अधीक्षक डॉ इंदरजीत सिंह ढींगरा भी कहते हैं कि हाल के दिनों में सरकारी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में भी इस तरह के सुझाव दिए गए.
वो कहते हैं कि बैठक में कई नशा मुक्ति केन्द्रों के संचालकों ने सरकारी अधिकारियों को सुझाव भी दिया कि नशा छोड़ने की कोशिश करने वालों के कार्ड बनाए जाएँ और उन्हें संतुलित मात्रा में अफ़ीम दी जाए ताकि रासायनिक नशीले पदार्थों -जैसे स्मैक, हेरोइन और कोकीन की लत छुड़ाई जा सके.
मौजूदा परिस्थिति में पंजाब के सरकारी अस्पतालों में नशे की लत वाले युवकों को दूसरी गोलियां दी जाती हैं ताकि वो स्मैक, चरस, कोकीन और हेरोइन से हटकर गोलियों के नशे की तरफ आ जाएँ. यानी एक नशा छुडाने के लिए दुसरे नशे की लत.
डाक्टर ढींगरा कहते हैं, "मगर यह गोलियां भी रासायनिक हैं और इनके बुरे 'साइड इफ़ेक्ट' हैं". वो कहते हैं कि बेहतर होगा कि सरकार अफ़ीम के ठेके खोले ताकि पंजाब के नौजवानों को और समाज को सफ़ेद नशे की काली दुनिया से निकाला जा सके.
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