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महज 6000 की पगार पर कश्मीर में तैनात हज़ारों पुलिस ऑफ़िसर
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
"हमने आज तक वो सभी काम किए जो हमें पुलिस अफ़सरों ने करने को कहा."
ये कहते हुए बीते 22 सालों से जम्मू और कश्मीर पुलिस के लिए काम करने वाले अली मोहम्मद सोफी की थकान दिखने लगती है.
"छह हज़ार पगार वाली इस नौकरी से मैं अपना परिवार नहीं चला नहीं पा रहा हूं."
ये सवाल किसी के भी मन में आ सकता है कि पुलिस की ऐसी कौन सी नौकरी है जिसमें छह हज़ार रुपए महीने पगार मिलती हो.
अली मोहम्मद सोफी जम्मू और कश्मीर पुलिस के 'स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर' हैं.
सुनने में ये 'डेजिगनेशन' अच्छा लगता है, लेकिन जम्मू और कश्मीर की पुलिस के लिए काम करने वाले इन लोगों की तकलीफ़ें, शिकायतें और कहानियां उतनी ख़ुशगवार नहीं लगतीं.
'स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर्स' यानी SPOs
जम्मू और कश्मीर की पुलिस ने साल 1994-95 में एक नए दस्ते गठन किया था. इस दस्ते का नाम SPOs या स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर्स रखा गया था.
जब इस दस्ते का गठन किया गया था तो इनका मानदेय 1500 रुपए प्रति महीना तय किया गया था. फिर इसे बढ़ाकर 3000 रुपए और अब ये छह हज़ार प्रति महीना है.
जम्मू और कश्मीर में इस समय 35,000 एसपीओ पुलिस विभाग में काम कर रहे हैं. इन एसपीओ को चरमपंथियों के ख़िलाफ़ चलाए जाने वाले अभियानों में भी शामिल किया जाता है.
इस दस्ते के गठन से लेकर आज तक क़रीब पांच सौ एसपीओ चरमपंथी हमलों या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ चलाए गए ऑपरेशंस में मारे गए हैं.
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में हिस्सा लेने के अलावा इन एसपीओ को विभाग के दूसरे कामों में भी लगाया जाता है.
जम्मू और कश्मीर पुलिस के डीजी एसपी वैद कहते हैं, "एसपीओ की भर्ती साल 1994-95 में शुरू की गई थी. इस दस्ते का मक़सद ये था कि ये लोग पुलिस की अतिरिक्त मदद के लिए काम आएंगे."
अली मोहम्मद सोफी की कहानी
अली मोहम्मद सोफी कहते हैं, "मैं 1996 में इसमें भर्ती हुआ था. मेरे पांच बच्चे हैं. हमने सरकार से बार-बार कहा कि हमारी नौकरी परमानेंट की जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं."
"जो सिविल विभाग में तैनात होते हैं, उनको तो सात साल के बाद परमानेंट किया जाता है. कुछ समय पहले मेरे पिता बीमार हो गए और उनके इलाज के लिए हमें अपनी ज़मीन बेचनी पड़ी."
"हमने हर वह ड्यूटी की, जिसके लिए हमें कहा गया. साल 2005 में जो भूकंप आया था, उसमें भी ड्यूटी दी, थाने में भी ड्यूटी दी. बाज़ार में ड्यूटी देते हैं."
"किसी जगह क़ानून व्यवस्था ख़राब होती है तो वहां भी जाते हैं. जिस तरह दूसरे परमानेंट सिपाही ड्यूटी देते हैं, उसी तरह हम भी काम करते हैं."
"हमें चरमपंथी हमलों में भाग लेने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. इसके बावजूद भी अगर हमें परमानेंट नहीं किया गया तो ये नाइंसाफ़ी हमारे साथ होगी."
"ये 22 साल इसी उम्मीद में गुज़ारे कि आज नहीं तो कल परमानेंट किया जाएगा. अब हम ज़िंदगी में क्या कर सकते हैं. अब तो इतनी उम्र हो गई है."
मुआवज़े के लिए संघर्ष
21 मार्च, 2018 को कुपवाड़ा के हलमत पोरा में एक एनकाउंटर हुआ था जिसमें जम्मू और कश्मीर पुलिस के एसपीओ मोहम्मद यूसुफ़ बझाड़ा मारे गए थे.
उस एनकाउंटर में पांच चरमपंथी भी मारे गए थे. पांच महीने गुज़र जाने के बावजूद यूसुफ़ के परिवारवालों को अभी भी पूरे मुआवज़े का इंतज़ार है.
यूसुफ़ के बेटे इक़बाल अहमद बझाड़ा ने बताया, "पापा की मौत के बाद हमें अभी तक ढाई लाख रुपये मिले हैं. हमसे ये वादा किया गया था कि दो नौकरियां मिलेंगी और 17.5 लाख रुपये मिलेंगे."
"पापा के लिए छह हज़ार रुपये की पगार पर आठ लोगों का परिवार चलाना संभव नहीं था. पापा ने रिश्तेदरों और बैंक से कर्ज़ा लिया था. हमारे ऊपर पांच लाख रुपये का क़र्ज़ है. शहीद होना भी अब हमारे लिए बुरी बात हो गई है."
मोहम्मद यूसुफ़ बझाड़ा के मुआवज़े के मामले में पुलिस का कहना है कि कागज़ी कार्यवाही में देरी की वजह से इसमें देरी हुई है.
इक़बाल कहते हैं कि पापा ने देश के लिए जान दी लेकिन परिवारवालों के साथ पुलिस विभाग का ऐसा बर्ताव हो रहा है.
अगवा किए जाने की घटनाएं...
एक और एसपीओ ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि दशकों से ऐसे ही हाल में रहकर हम काफ़ी परेशान हो गए हैं.
उनका कहना है, "हमें हर किस्म की ड्यूटी देनी पड़ती है. पत्थरबाज़ों के साथ निपटना होता है. चरमपंथ विरोधी अभियानों में जाना पड़ता है."
"हमें चरमपंथी नौकरी छोड़ने के लिए कहते हैं. मस्जिदों के ज़रिए हमें नौकरी छोड़ने के लिए कहा जाता है. हमें हर तरफ से मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं."
हालिया दिनों में दक्षिणी कश्मीर में कई एसपीओ को चरमपंथियों ने निशाना बनाया है. उनके अगवा किए जाने की घटनाएं भी होती रही हैं और वे रिहा भी किए जाते रहे हैं.
कुछ दिन पहले दक्षिणी कश्मीर के तराल इलाके में दो दर्जन एसपीओ के इस्तीफ़े देने की भी ख़बरें सामने आई हैं.
क्या कहता पुलिस महकमा
डीजीपी एसपी वैद बताते हैं, "आपने देखा होगा कि पुलिस कर्मियों और एसपीओ को चरमपंथी ख़ौफ़ज़दा कर देते हैं. इस तरह की रिपोर्ट तराल से भी आई है जिसकी हम जाँच कर रहे हैं."
"इसमें कोई इश्यू नहीं है. हम नहीं चाहते हैं कि किसी भी एसपीओ या पुलिसकर्मी को कोई परेशानी हो. ये इतना बड़ा मुद्दा नहीं है."
डीजीपी वैद भी मानते हैं कि एसपीओ की सैलरी बहुत कम है, "आजकल की महंगाई के ज़माने में छह हज़ार रुपये बहुत कम होते हैं. मुझे उम्मीद है कि सरकार हमारी अर्ज़ी पर गौर करेगी."
"मैंने पिछली सरकार से भी इन एसपीओ को परमानेंट करने की मांग की थी. हमने सरकार से एक ऐसा प्रपोजल पास करवाया है."
"अगर कोई एसपीओ किसी सरकारी आईटीआई से एक साल का डिप्लोमा पेश करेगा तो उसकी नौकरी पक्की की जा सकती है."
"अगर कोई राज्य स्तर पर खेल के मैदान में पहली या दूसरी पोजीशन हासिल कर सके तो उसकी भी नौकरी पक्की हो सकती है. अगर कोई चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में हिस्सा लेगा तो उसकी नौकरी भी पक्की हो सकती है."
ट्रेनिंग के सवाल पर...
वे दावा करते हैं कि इस स्कीम के तहत हमने हज़ारों एसपीओ की नौकरी पक्की की है.
ये पूछने पर कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ होने वाले अभियानों में एसपीओ की किस तरह की ट्रेनिंग होती है?
डीजीपी वैद ने बताया, "हम किसी से ज़बरदस्ती नहीं करते हैं कि वह चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में भाग ले. ये लोग अपनी मर्ज़ी से भाग लेते हैं. इनको ट्रेनिंग भी दी जाती है."
वैद का कहना था कि मारे गए एसपीओ के लिए क्राउड फ़ंडिंग जैसे क़दम पुलिस विभाग ने उठाए है और क्राउड फंडिंग से आने वाला पैसा उनके परिवारवालों में बांटा जाएगा.
क्या सभी मारे गए एसपीओ को मुआवजा मिला है, डीजी कहते हैं, "मुआवज़ा देने का काम तो चलता रहता है. ड्यूटी पर मरने वाले एसपीओ के परिवारवालों को इस समय 17.5 लाख रुपये और आश्रित को नौकरी मिलती है."
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