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जम्मू-कश्मीर: एक दशक में कितना कुछ कर पाए वोहरा
- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत सरकार ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के नए राज्यपाल की घोषणा की है. बिहार के वर्तमान राज्यपाल सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के 13वें राज्यपाल होंगे. लगभग 51 साल के बाद जम्मू-कश्मीर में किसी राजनेता को राज्यपाल नियुक्त किया गया है.
सत्यपाल मलिक, नरेंद्र नाथ वोहरा की जगह लेंगे.
जम्मू-कश्मीर के राज्यपालों में नरेंद्र नाथ वोहरा कई मायनों में अलग रहे हैं. वो पिछले 30 सालों में पहले ऐसे गैर राजनीतिक शख़्स हैं, जिन्हें इस पद की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
इससे पहले, साल 1990 में जगमोहन ऐसे सिविलियन थे, जिन्हें राज्यपाल नियुक्त किया गया था.
वोहरा ऐसे राज्यपाल रहे हैं, जिन्होंने अलगाववादियों और सरकार के बीच बातचीत में पुल का काम किया. वो इकलौते ऐसे राज्यपाल रहे जो एक दशक से ज़्यादा पद पर बने रहे.
वोहरा 2008 में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल नियुक्त हुए थे.
82 साल के वोहरा एक ऐसे नौकरशाह हैं, जिन्होंने राज्य की राजनीतिक उठापटक के बीच लगातार चार बार राज्यपाल का पद संभाला है.
वोहरा 1959 बैच के आईएएस हैं. वो रक्षा और गृह मंत्रालय के सचिव रह चुके हैं. कई लोगों का मानना है कि वो कश्मीर को बेहतर जानते हैं.
'मैंने फर्क महसूस किया है'
वोहरा ने अपने अंतिम कार्यकाल में प्रशासन को अधिक ज़िम्मेदार और लोगों के अनुकूल बनाने के लिए काम किया था.
कुछ दिन पहले राज्य में पीडीपी और भाजपा का गठबंधन टूटने के बाद राज्य में एक बार फिर राज्यपाल शासन लागू किया गया था.
दोनों पार्टियों ने मिलकर करीब तीन साल तक सरकार चलाई. इस कार्यकाल में उन्होंने घाटी में, ख़ासकर दक्षिण कश्मीर के इलाक़ों में शांति स्थापित करने की कोशिश की.
शोपियां में रहने वाले एजाज़ राशिद कहते हैं, "उन्होंने आम कश्मीरियों की हो रही हत्याओं को कम किया. मैं नहीं जानता उन्होंने ऐसा कैसे किया पर मैंने चुनी हुई सरकार और राज्यपाल शासन में फर्क महसूस किया है."
मतभेद
राज्य में 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. हिंदू बहुल इलाक़ा जम्मू में भाजपा को बहुमत और कश्मीर में पीडीपी की बड़ी पार्टी के रूप में वापसी के बाद दोनों ने मिलकर राज्य में साझा सरकार बनाई थी.
हालांकि दोनों पार्टियों की विचारधारा में विरोधाभास है, फिर भी वो सरकार बनाने और राज्य में शांति स्थापित करने के मकसद से सरकार में आई थी.
दोनों पार्टियों के बीच बहुत नहीं बन पाई और समय के साथ मतभेद उभरने लगे.
मुफ्ती मोहम्मद सईद की जनवरी 2016 में मौत के बाद महबूबा ने भाजपा के साथ अपने रिश्ते कायम रखने पर विचार किया. उनके फ़ैसला लेने तक राज्यपाल वोहरा दो महीने से अधिक तक राज्य के मुखिया रहे.
कठुआ में नाबालिग बच्ची की रेप और हत्या के बाद दोनों पार्टियों के बीच फासला बढ़ा और वो अलग हो गए.
भाजपा के कुछ मंत्रियों ने अभियुक्त के पक्ष में रैली निकाली थी. हालांकि भाजपा ने पहले इन मंत्रियों को हटा दिया लेकिन, कुछ समय बाद पार्टी ने सरकार से अलग होने का फ़ैसला किया.
इस फ़ैसले के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया गया और राज्य की कमान वोहरा के हाथों में आ गई.
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आठ मौकों पर कब-कब लगा राज्यपाल शासन
- पहली बारः 26 मार्च 1977 से 9 जुलाई 1977 तक. 105 दिनों के लिए.
- दूसरी बारः 6 मार्च 1986 से 7 नवंबर 1986 तक. 246 दिनों के लिए.
- तीसरी बारः 19 जनवरी 1990 से 9 अक्तूबर 1996 तक. छह साल 264 दिनों के लिए.
- चौथी बारः 18 अक्तूबर 2002 से 2 नवंबर 2002 तक. 15 दिनों के लिए.
- पांचवीं बारः 11 जुलाई 2008 से 5 जनवरी 2009 तक. 178 दिनों के लिए.
- छठी बारः 9 जनवरी 2015 से 1 मार्च 2015 तक. 51 दिनों के लिए.
- सातवीं बारः 8 जनवरी 2016 से 4 अप्रैल 2016 तक. 87 दिनों के लिए.
- आठवीं बारः 19 जून 2018 से अब तक.
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