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केरल के लिए भारत विदेशी सहायता क्यों नहीं ले रहा है?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
केरल में बाढ़ से हुई तबाही के बाद प्रशासन अब राहत और पुनर्वास के काम में जुटा है. पिछली एक सदी की सबसे बड़ी त्रासदी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 500 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की घोषणा की है.
केरल की बाढ़ आपदा के लिए विदेश से सहायता के वादे किए जा रहे हैं. संयुक्त अरब अमीरात ने 700 करोड़ रुपए की मदद देने का ऐलान किया. केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इसकी जानकारी दी थी.
मुख्यमंत्री विजयन ने कहा कि अबू धाबी के क्राउन प्रिंस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की है. उन्होंने कहा कि दोनों के बीच बातचीत राहत और बचाव कार्य की मौजूदा स्थिति पर हुई.
केरल सरकार ने विशेष सहायता में केंद्र सरकार से 2,000 करोड़ रुपए मांगे हैं. लेकिन केंद्र ने जो सहायता राशि दी है, वो इससे काफ़ी कम है.
लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक विदेशी सहायता को स्वीकार नहीं किया है और सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना भी की जा रही है. आलोचक कह रहे हैं कि केरल को खाने के पैकेट और कपड़ों की ज़रूरत है.
पहले भी किया है इनकार
केरलवालों के घरों की मरम्मत की ज़रूरत है. क्षतिग्रस्त सड़कों का पुनर्निर्माण किया जाना है. टूटे बुनियादी ढांचे को पुनर्गठित किया जाना है. ऐसे में वो सवाल उठा रहे हैं कि सरकार विदेशी मदद स्वीकार करने से क्यों इनकार कर रही है?
हालाँकि ये भी हक़ीक़त है कि पिछले 15-20 साल में देश में आई त्रासदी पर निगाह डालें तो मालूम होगा कि भारत सरकार पहले भी कई बार विदेशी सहायता लेने से इनकार कर चुकी है.
एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा, "भारत सरकार केरल में राहत और पुनर्वास कार्यों में मदद के लिए विभिन्न देशों से सहायता के प्रस्तावों की सराहना करती है. मौजूदा नीति के तहत सरकार राहत और पुनर्वास कार्यों को घरेलू संसाधनों से पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है."
साल 2004 में आई सूनामी के समय शुरू में भारत सरकार ने बाहरी सहायता लेने से इनकार कर दिया था लेकिन बाद में विदेशी सहायता ली गई. एक रिपोर्ट के अनुसार सूनामी में आई कुल मदद का 70 प्रतिशत विदेश से आया था.
इसके अगले साल भारतीय प्रशासित कश्मीर में आए भूकंप में 1300 व्यक्तियों की जानें गई थीं और 30,000 लोगों के घर तबाह हो गए थे. कई देशों ने सहायता देने का एलान किया. लेकिन भारत सरकार ने विदेशी सहायता लेने से इनकार कर दिया. दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी प्रशासित कश्मीर में इसी हादसे के बाद पाकिस्तान की सरकार ने विदेशी सहायता की अपील की थी.
ओडिशा में तूफ़ान में ली थी सहायता
इस पर टिपण्णी करते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा था, "भारत एक रिसीवर की बजाय खुद को एक डोनर (दाता) के रूप में चित्रित करने के लिए चिंतित है." अख़बार ने राजनयिक हामिद अंसारी (पूर्व उपराष्ट्रपति) के हवाले से कहा था, "हम अपने आप जो प्रबंधन कर सकते हैं, हम करते हैं. मुझे यह कहता हूँ कि आप स्वयं को चीज़ों का प्रबंधन करने में सक्षम हैं."
अख़बार के अनुसार भारत विदेशी सहायता अस्वीकार इसलिए करता है ताकि उसे एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जाए.
लेकिन 2014 में ओडिशा में चक्रवात से हुए नुकसान के बाद सरकार ने अमरीका से एक लाख डॉलर की सहायता ली थी. इसके बावजूद ये कहना सही होगा कि भारत की पिछले 15-20 सालों से पालिसी ये रही है कि विदेशी सहायता की बजाय स्वयं प्रभावित क्षेत्र को सहायता दी जाए. इसलिए सरकार सशस्त्र बल को राहत के काम में लगाती है जैसा कि इस समय केरल में दिख रहा है.
दो हज़ार करोड़ का नुकसान
प्राकृतिक आपदा विशेषज्ञ संजय श्रीवास्तव अभी केरल से लौटे हैं. वो कहते हैं कि केंद्र सरकार नक़द विदेशी पैसे लेने का फ़ैसला अभी नहीं कर पाई है. लेकिन उनके अनुसार केरल में राहत और बचाव के काम में कई विदेशी संस्थाएं जुटी हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र का विश्व स्वास्थ्य संगठन और रेड क्रॉस जैसी संस्थाएं शामिल हैं.
उनके अनुसार किसी भी आपदा से निपटने के लिए पहले राहत का काम होता है, ताकि लोगों को सुरक्षित इलाक़ों में लाया जा सके और उन्हें खाना और कपड़ा दिया जाए. इसके बाद बीमारियों के फैलने की रोकथाम के लिए क़दम उठाए जाते हैं. इसके बाद नुक़सान का जायज़ा लिया जाता है जिसमें एक महीना लग सकता है.
केरल सरकार ने 2,000 करोड़ रुपए की राशि की अपील की है लेकिन नुकसान का सही अंदाज़ा लगाए जाने के बाद ही केंद्र सरकार ये फ़ैसला कर सकेगी कि केरल को और कितनी राशि चाहिए. ऐसा भी संभव है कि उस समय विदेशी सहायता लेने पर सरकार राज़ी भी हो जाए.
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