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एनडीए के हरिवंश नारायण दोबारा चुने गए राज्यसभा के उपसभापति
देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में सोमवार को उपसभापति पद का चुनाव हुआ. एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को दूसरी बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया है. उन्हें ध्वनिमत से इस पद के लिए चुना गया.
उपसभापति चुने के जाने के बाद हरिवंश नारायण सिंह ने कहा, ''मैं आपका आभारी हूं कि आपने एक ऐसे व्यक्ति को इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त समझा जो गांव में रहने वाले एक बहुत सामान्य परिवार से आता है और जो कभी अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में नहीं गया.''
इस दौरान सदन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश नारायण को दोबारा उपसभापति चुने जाने पर बधाई दी. उन्होंने कहा कि सदन के हरि, पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए एक जैसे ही रहेंगे.
हरिवंश नारायण सिंह के सामने विपक्ष की ओर से राजद नेता मनोज झा को अपना उम्मीदवार बनाया गया था.
हालांकि, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने घोषणा की था कि बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद राज्यसभा में उपसभापति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार का समर्थन करेंगे. जबकि बीजेडी एनडीए का हिस्सा नहीं है.
उपसभापति के तौर पर हरिवंश नारायण सिंह का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को ख़त्म हो गया था.
कौन हैं हरिवंश नारायण
सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार हरिवंश जेडीयू से राज्यसभा सदस्य हैं. जेडीयू ने 2014 में उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजा.
30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में हरिवंश जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहे थे तभी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनका चयन हो गया. वो साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' में उपसंपादक रहे. लेकिन बाद में कुछ दिनों के लिए बैंक में भी काम किया फिर पत्रकारिता में वापसी की और 1989 तक 'आनंद बाजार पत्रिका' की साप्ताहिक पत्रिका 'रविवार' में सहायक संपादक रहे.
इसके बाद वो 25 सालों से भी अधिक समय के लिए प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक रह चुके हैं.
राज्यसभा में आने से पहले वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (1990-91) भी रह चुके हैं.
62 साल के हरिवंश बिहार और झारखंड में वहां के जाने-माने अखबार 'प्रभात खबर' के एडिटर रहे हैं.
खास बात ये है कि वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के भी काफी करीबी रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में हरिवंश के बारे में कहा, "हरिवंश जी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी थे और चंद्रशेखर के इस्तीफ़ा देने की जानकारी उन्हें पहले से ही थी, लेकिन उन्होंने अखबार की लोकप्रियता के लिए इस ख़बर को लीक नहीं किया."
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