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ये मसला धर्म का नहीं बल्कि एक तारीख का है: प्रतीक हजेला
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
देश में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मसले को लेकर बहस छिड़ी हुई है.
असम में 30 जुलाई को राष्ट्रीय नागिरकता रजिस्टर जारी किया गया है जिसमें 40 लाख से ज़्यादा लोगों के नाम नहीं है.
अब इन लोगों की नागरिकता पर सवाल उठ रहे हैं. रजिस्टर में नाम न होने की वजह से ये लोग भारत के नागरिकता खो सकते हैं.
एनआरसी में मार्च 1971 के पहले से असम में रह रहे लोगों का नाम दर्ज किया गया है जबकि उसके बाद आए लोगों की नागरिकता को संदिग्ध माना गया है.
हालांकि, जिन लोगों के नाम रजिस्टर में नहीं है उनके पास अपनी नागरिकता का दावा करने का मौक़ा होगा.
वहीं, इन 40 लाख लोगों का क्या होगा इस बारे में भी अभी नीति स्पष्ट नहीं है.
इन पूरे हालातों में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं. जैसे क्या इन सभी लोगों के पास भारत की नागरिकता नहीं रहेगी. अगर ऐसा होता है तो वो कहां जाएंगे.
साथ ही इस मामले में सरकारी मंशा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष दल सरकार पर एनआरसी के जरिए अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का भी आरोप भी लगा रहे हैं.
इन सभी मसलों पर बीबीसी ने असम में सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त एनआरसी के अध्यक्ष प्रतीक हजेला से बात की.
पढ़ें, उन्होंने क्या कहा-
प्रक्रिया धर्म या समुदाय से जुड़ी नहीं
एनआरसी की प्रक्रिया को लेकर प्रतीक हजेला कहते हैं कि असम में असल नागरिकों की सूची बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी है. जिनका नाम इस मसौदे में नहीं है उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त या नए दस्तावेज़ जमा करने का मौका दिया जाएगा.
इस पूरे मामले में सरकार की मंशा और धार्मिक भेदभाव को लेकर उठ रहे सवालों पर उन्होंने कहा, ''जिन 40 लाख लोगों का नाम मसौदा सूची में नहीं है उनमें सभी तरह के और सभी धर्मों के लोग शामिल हैं. ये किसी ख़ास समूह या धर्म से जुड़ी हुई नहीं है.''
''ये प्रक्रिया किसी धर्म, समुदाय या वर्ग के बारे में नहीं बल्कि तारीख के बारे में है और वो तारीख है 24 मार्च 1971.''
उन्होंने कहा कि जो कोई भी यहां रहता है और यहां तक कि जो इस तारीख से पहले बांग्लादेश से भारत में आया है वो यहां की नागरिकता के लिए योग्य है. एनआरसी में 40 लाख से ज़्यादा लोगों को सूची से बाहर किया गया है. लेकिन, उन्हें इसका कारण बताया गया है और उनके पास अपना जवाब देने के लिए 9 सितंबर तक का समय है.
लेकिन, कुछ लोगों में ये डर भी है कि जिन अधिकारियों ने पहले उनकी नागरिकता खारिज की थी अब फिर से उन्हीं अधिकारियों को दस्तावेज़ देने होंगे.
इस बारे में प्रतीक हजेला कहते हैं कि इससे बचने की कोशिश की गई है. उन्होंने बताया, ''हम कई केंद्रों पर अधिकारियों को बदलने की पेशकश करेंगे और इसके लिए अनुमति मांगेंगे.''
उन्होंने बताया, ''सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय से प्रक्रिया शुरू करने के लिए मानक ऑपरेटिंग प्रक्रिया पेश करने के लिए कहा है. इसे लेकर कोर्ट से अनुमति मिल जाने के बाद ही हम इसे लागू कर देंगे.
पहले के मुकाबले आसान होगा काम
प्रतीक हजेला मानते हैं कि 40 लाख लोगों का सूची से बाहर होना बहुत बड़ी संख्या है लेकिन वह कहते हैं, ''ये अंतिम संख्या नहीं है और न ही लोगों को किसी श्रेणी में बांटा जा सकता है.''
''यह एक व्यापक प्रक्रिया है और हम जमा किए गए लाखों दस्तावेजों और सबूतों के जरिए हर एक व्यक्ति की जांच कर रहे हैं. हम किसी और एजेंसी के नतीजों को स्वीकार नहीं कर रहे. हम खुद संपूर्ण सत्यापन के जरिए हर किसी के 1971 से पहले के संबंध का पता लगा रहे हैं.''
उन्होंने कहा कि अब 40 लाख लोगों के दस्तावेजों की जांच करना पहले के तीन करोड़ 30 लाख लोगों के मुकाबले ज़्यादा आसान होगा. ये प्रक्रिया पूरे ध्यान से होगी और ग़लती की आशंका बहुत कम होगी. यहां तक कि इस बार और ज़्यादा अधिकारी दावों व आपत्तियों की जांच करेंगे.
अंतिम तौर पर इस सूची से कितने लोग बाहर होंगे, इस सवाल पर प्रतीक हजेला ने कहा कि किसी भी तरह का अनुमान लगाना ग़लत होगा. अंतिम संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि कितने लोग अपनी नागरिकता का प्रमाण दे पाते हैं.
जवाब देने की आख़िरी तारीख 28 सितंबर है. लेकिन, अंतिम सूची कब तक आएगी ये अभी साफ़ नहीं है.
प्रतीक हजेला ने बताया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई समय सीमा तय नहीं करता है तब तक हम सूची प्रकाशित नहीं कर सकते हैं.
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