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ब्लॉग: भगवान पर भरोसा करें या भगवान भरोसे चलती सरकारों पर?
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
इसी साल फ़रवरी-मार्च महीने में बड़े धूम से शुरू हुआ 'राष्ट्र रक्षा महायज्ञ' याद है आपको?
उससे यही आभास मिला कि राष्ट्र की रक्षा करना सरकार का काम नहीं है या ये उसके बस की बात नहीं है, उसके लिए तो ईश्वरीय कृपा चाहिए.
बीजेपी से जुड़े नेताओं का संकल्प ये था कि देश की सीमाओं से मिट्टी लाई जाएगी, घर-घर से घी माँगा जाएगा, जो घी नहीं दे सकते वे पेटीएम से 11 रुपए दान कर सकते हैं.
इसके बाद मुग़लिया दौर में बने लाल क़िले में हवन कुंड बनाकर समिधा डाली जानी थी जिससे राष्ट्र के शत्रुओं का नाश होना था. इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने के लिए आपको बस मिस्ड कॉल देना था. ऐसा सुंदर प्रावधान किस वेद-पुराण में है?
राष्ट्र रक्षा महायज्ञ की पूजन विधि और महात्म्य आप यहाँ विस्तार से पढ़ सकते हैं.
बीजेपी के पूर्वी दिल्ली के सांसद महेश गिरी ने बीबीसी को बताया था कि डोकलाम और जम्मू-कश्मीर से मिट्टी लाने के लिए रथ रवाना किए गए हैं.
इस हवन के लिए भारत-चीन सीमा से इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आइटीबीपी) की मदद से डोकलाम की मिट्टी लाई जानी थी.
अगर ईश्वर में आस्था है तो फिर पता नहीं क्यों, देश के प्रधानमंत्री इस हवन की घोषणा के बाद से चीनी राष्ट्रपति से कई बार बिना किसी एजेंडा के मिल चुके हैं, शायद हवन की विभूति साथ लेकर जाते रहे हों?
इस यज्ञ की शुरूआत धूम से हुई थी अगर पूर्णाहुति धूम से नहीं हुई तो ये ईश्वर और भक्तों, दोनों के साथ छल है.
मिस्ड कॉल देने वाले ही बता पाएँगे कि उन्हें प्रसाद मिला या नहीं? लोकतंत्र के साथ जो छल हो रहा उसकी बात बाद में करते हैं.
देश में बहुत सारे धार्मिक अनुष्ठान चल रहे हैं, 2019 के चुनाव तक पुण्यकार्यों का सिलसिला और तेज़ होता जाएगा.
देश में आम चुनाव से पहले राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए वहाँ ईश्वर की गुहार ज्यादा ज़ोर से लगाई जा रही है.
राजस्थान की मुख्यमंत्री जिन्हें उनकी पार्टी के ही लोग 'महारानी' कहते हैं, वे इसका बुरा नहीं मानतीं, कितना बड़प्पन है! वे ख़ुद को कभी राजपूत, कभी गूजर और कभी हिंदुत्व की सेनानी बताती रही हैं. ईश्वर की अराधना करते हुए दिखकर वे बहुसंख्यक हिंदू जनता को तुष्ट करने की कोशिश कर रही हैं.
मगर नहीं, इसे तुष्टीकरण कैसे कह सकते हैं? तुष्टीकरण तो सिर्फ़ मुसलमानों का होता है, तुष्टीकरण तो सिर्फ़ काँग्रेस करती है!
टैक्स देने वाली जनता के ख़र्चे पर राजस्थान के अख़बारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपे हैं कि सावन महीने में सोमवार को राज्य के हर ज़िले में जनकल्याण के लिए रुद्राभिषेक होगा. आयोजक राजस्थान सरकार है, यानी यजमान मुख्यमंत्री ख़ुद हैं.
जिनके पैसों से ये आयोजन हो रहा वो जनता अख़बार में छपी तस्वीरें और टीवी देखकर धन्य होगी, आरती लेने के बाद थाली में वोट डाल देगी. कितनी सुंदर बात है न!
साल-दर-साल बदलता सुर
धर्म और आस्था में कोई बुराई नहीं है लेकिन उसका राजनीतिक इस्तेमाल बुरा है, ऊपर से तब जबकि धर्म का दोहन करके वोट बटोरने के लिए भी जनता के ही पैसों का इस्तेमाल किया जाए.
भारत के संविधान की दुहाई देकर सरकार के धार्मिक आयोजनों से दूर रहने की बात करने वाले हिंदू विरोधी और सिकुलर क़रार दिए जाएँगे.
आप संविधान की बात करते रहें, संविधान में बदलाव जब होगा तब होगा, हिंदू राष्ट्र की फुल फीलिंग अभी से मिलने लगी है.
राज्य सरकारों के बीच बड़े से बड़ा धार्मिक आयोजन करने की होड़-सी लग गई है, पहले सरकार व्यवस्थापक होती थी न्यू इंडिया में वह आयोजक हो गई है.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सरकारी ख़र्चे पर 'नर्मदा यात्रा' की, झारखंड में रघुबर दास गायों के लिए एंबुलेंस चलवा रहे हैं, और लोग मासूमियत से पूछ रहे हैं कि इसमें क्या बुराई है?
संक्षेप में, पहली बुराई ये है कि ये सरकार का काम नहीं है. दूसरी बुराई ये सरकारी समय और संसाधन उन कामों में लगना चाहिए जो सरकार की ज़िम्मेदारी है. तीसरी बुराई ये है कि भजन-कीर्तन ज़िम्मेदारी से ध्यान हटाने का हथकंडा ही है. चौथी बुराई ये है कि जो लोग धार्मिक या हिंदू नहीं हैं उन्हें सरकार अलग-थलग महसूस करा रही है, और पाँचवी बुराई ये है कि सभी धार्मिक बातें तर्क-तथ्य और आलोचना से परे होती हैं सरकार से सवाल पूछना यज्ञ में विघ्न डालने जैसा पाप माना जाएगा.
कोई एक दल नहीं दोषी
धर्म के नाम पर भीड़ जुटाकर उसे वोट में बदलने की कोशिश करना किसी एक दल की रणनीति नहीं रही है, जिस किसी बाबा के प्रवचन में भीड़ जुटने लगे वहाँ नेता ज़रूर पहुँचते हैं, उन्हें बाबा का आशीर्वाद यानी उनके भक्तों का वोट चाहिए होता है.
छोटे बाबा के पास विधायक, उससे बड़े वाले के पास राज्यों के मंत्री, उससे बड़े बाबा के पास केंद्रीय मंत्री जाते हैं, ये किसी भी पार्टी के हो सकते हैं, ये सामाजिक राजनीतिक तौर पर स्वीकार्य गतिविधि है, जब तक कि बाबा रामरहीम या आसाराम साबित न हो जाए.
मंदिरों में जाना और महंतों से आशीर्वाद लेना इंदिरा गांधी के दौर से चल रहा था, इस धार्मिक गतिविधि से थोड़ा-बहुत सियासी फ़ायदा मिलने की उम्मीद रहती थी लेकिन मौजूदा सरकार इस गेम को अलग ही लेवल पर ले गई है.
हर ज़िले में सावन के हर सोमवार को सरकारी ख़र्च पर रुद्राभिषेक कराने वाली वसुंधरा ने बाक़ी मुख्यमंत्रियों के सामने एक तरह से चुनौती रखी है कि इससे बड़ा कुछ करके दिखाओ.
झारखंड के मुख्यमंत्री टीवी चैनलों पर विज्ञापन चलवा रहे हैं जिसमें वे शिवभक्तों का दिन में बीसियों बार बैजनाथ धाम में स्वागत कर रहे हैं, मानो वे न बुलाते तो लोग न जाते.
यही हाल कुंभ मेले का है, कुंभ मेला धरती पर आस्थावानों के सबसे बड़े जमावड़ों में से एक है, हमेशा से रहा है, इतने बड़े आयोजन सरकारों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है लेकिन नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ इसे राजनीतिक अवसर की तरह देख रहे हैं.
पूरे देश में कुंभ मेले में स्वागत के बहाने मोदी और योगी के पोस्टर सरकारी ख़र्चे पर लगाए गए हैं.
धर्म के मामले में कोई कुछ भी बोलने से घबराता है, ख़ास तौर पर विपक्ष क्योंकि उसे तुरंत हिंदू विरोधी घोषित कर दिया जाएगा.
देश की जनता और इस लेख को पढ़ने वाले शायद समझ सकें कि मामला धर्म का नहीं है, धर्म के नाम पर राजनीति करने का है.
बाक़ी तो कर्नाटक के विजयपुरा से बीजेपी के विधायक बी पाटिल येंताल कह ही चुके हैं बुद्धिजीवी देश की आलोचना करने में लगे रहते हैं, उनकी राय है कि "बुद्धिजीवियों को गोली मार दी जानी चाहिए".
शायद पूजन-हवन से ही देश की जनता को सुबुद्धि आए.
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