नज़रिया: डबल इंजन वाली बिहार सरकार की हवा निकली?

    • Author, सुरूर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के गठबंधन की डबल इंजन रेल की एक साल बाद ही हवा निकली नज़र आती है, भले ही ये अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही हो.

विकास, क़ानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा, कृषि विकास, निवेश, मूलभूत ढांचे का निर्माण, सांप्रदायिक सौहार्द और यहां तक भ्रष्टाचार, इन सभी मुद्दों पर बिहार की नई एनडीए सरकार अपने उद्देश्यों के क़रीब भी नज़र नहीं आती.

बीते साल 27 जुलाई को राष्ट्रीय जनता दल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर जब नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग होकर राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल थे तब एनडीए के नेताओं ने नई सरकार को डबल इंजन सरकार कहा था.

लेकिन अब एक साल बाद ऐसा लगता है कि इन दो इंजनों में कोई तारतम्य नहीं हैं और ये दोनों रेल को अलग-अलग रफ़्तार से खींच रहे हैं.

वहीं राष्ट्रीय जनता दल के एक नेता का कहना है कि ये दो इंजन ट्रेन के अलग-अलग छोर पर लगे हैं और इसे विपरीत दिशा में खींच रहे हैं.

बिहार में महिला सुरक्षा की स्थिति का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां की दस बुज़ुर्ग महिलाओं ने इस मुद्दे को उठाने के लिए 48 घंटों का उपवास रखा. इनमें पद्मश्री सुधा वर्गीज़ और कंचन बाला भी शामिल थीं.

मुज़फ़्फ़रपुर में एक सरकार के संरक्षण में चल रहे बालिका गृह में रह रही दर्जनों बच्चियों के साथ रेप और गैंगरेप की रिपोर्टों ने महिला सुरक्षा के सवाल को और गंभीर कर दिया है.

इस बालिका गृह का संचालन सेवा संकल्प नाम की एक एनजीओ कर रही थी. एनजीओ के संचालक ब्रजेश ठाकुर समेत कुल दस लोगों को इस मामले में गिरफ़्तार किया गया है. इनमें सात महिलाएं भी शामिल हैं.

गैर सरकारी संगठनों का घोटाला

ब्रजेश ठाकुर को सत्ताधारी नेताओं का क़रीबी माना जाता है और वो एक स्थानीय अख़बार भी चलाते हैं. यहां रह रही बच्चियों ने मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइसेंज़ के दल को अपनी आपबीती बताई थी. अब इसकी पुलिस जांच में नई-नई जानकारियां सामने आ रही हैं.

पीड़िताओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें प्रदेश की सत्ता के ताक़तवर लोगों के पास भेजा जाता था और विरोध करने पर एक बच्ची की हत्या तक कर दी गई.

बिहार में एक और एनजीओ के कारनामे सुर्ख़ियों में रहे हैं. भागलपुर ज़िले में सृजन महिला विकास एवं सहयोग समिति नाम की एक एनजीओ पर क़रीब पंद्रह सौ करोड़ रुपए का घोटाला करने के आरोप लगे हैं.

सीबीआई इस घोटाले की जांच कर रही है और अभी तक इसमें कुछ ख़ास निकलकर नहीं आया है. ये अलग बात है कि इस घोटाले में भी सत्ताधारी दल से जुड़े कई लोगों के नाम बार-बार मीडिया रिपोर्टों में लिए गए.

सृजन घोटाले के बाद बिहार में शौचालय घोटाला सामने आया. प्रधानमंत्री मोदी के 'बेटी बचाओ' और 'स्वच्छ भारत' कार्यक्रमों तक इस घोटाले की आंच गई.

सत्ता में आते ही बिहार सरकार ने रेत के खनन पर प्रतिबंध लगा दिया था. वजह बताई गई थी कि रेत माफ़िया पर्यावरण को नुक़सान पहुंचा रहे हैं और पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.

विपक्ष का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि रेत खनन के काम में लगे अधिकतर लोग यादव जाति के हैं. इससे राज्य में निर्माण क्षेत्र पर व्यापक असर हुआ और हज़ारों मज़दूर काम से बाहर हो गए.

बीते साल 26 अगस्त को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित ज़िलों का दौरा करने गए तब इस डबल इंजान सरकार की कार्यप्रणाली सामने आई. प्रधानमंत्री ने बाढ़ राहत कार्यों के लिए 500 करोड़ रुपए की शुरुआती राशि मंज़ूर की. एनडीए के नेताओं की नज़र में भी ये बेहद कम राशि थी. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब साल 2008 में बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने आए थे तब उन्होंने राहत कार्यों के लिए 1100 करोड़ रुपए दिए थे.

14 अक्तूबर 2017 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पटना यूनिवर्सिटी के सौ साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए तब भी नीतीश की नाराज़गी सामने आई. नीतीश कुमार ने यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग उठायी जिसे प्रधानमंत्री ने नज़रअंदाज़ कर दिया.

नीतीश की चमक पर सवाल

उसी दिन मोकामा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने रिकॉर्ड सड़कें बनायी हैं और स्वतंत्रता के बाद से कोई सरकार ऐसा नहीं कर सकी है. अब तक नीतीश कुमार इस तरह के दावे करते रहे थे.

महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर 10 अप्रैल को आयोजित कार्यक्रम में भी नीतीश कुमार प्रधानमंत्री मोदी की चमक में खो से गए.

लेकिन वो मार्च का महीना था जब नीतीश कुमार का असली क़द सबके सामने आ गया. राज्य के अलग-अलग ज़िलों में रामनवमी के मौके पर निकले जुलुसों में तलवारों और हथियारों के प्रदर्शनों को बीजेपी नेताओं की सहमति हासिल थी. इस मौके पर दर्जनों जगह सांप्रदायिक हिंसा की वारदातें हुईं लेकिन नीतीश कुछ नहीं कर सके.

केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे पर दंगे करवाने के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया गया. लेकिन उनके पिता और एक और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सरकार को उन पर कार्रवाई करने की खुली चुनौती दे दी.

लेकिन 31 मई को जब कई राज्यों में हुए उपचुनावों में बीजेपी को हार मिली तो नीतीश को कुछ सांस लेने का मौका मिला.

नीतीश कुमार ने बीजेपी को भुजाएं दिखाने की कोशिश की तो अमित शाह दौड़कर उनसे बात करने पटना पहुंचे और एनडीए सरकार को व्यवस्थित किया.

बिहार जहां राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में जा रहा है, सरकार अपनी नाकामियों को छुपा नहीं पा रही है.

एनडीए सरकार का एक साल पूरा होने से तीन दिन पहले नीतीश कुमार ने शराबबंदी के कठोर नियमों में कुछ ढील दी. अब पहली बार उल्लंघन करने वालों पर पचास हज़ार रुपए तक का जुर्माना या तीन महीने तक की सज़ा होगी. ये पुरानी सज़ा के मुक़ाबले में काफ़ी हल्की है.

आलोचकों का कहना है कि नीतीश कुमार ने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि बीते दो सालों में शराबबंदी के तहत पकड़े गए सवा लाख लोगों में से अधिकतर या तो ग़रीब हैं या दलित हैं. नीतीश सरकार के इस क़दम में विश्वास की कमी ही नज़र आती है.

उलझे हुए नीतीश कुमार ने एक बार फिर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का मुद्दा उठा दिया है. वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनके पास विकास, क़ानून व्यवस्था या महिला सुरक्षा के नाम पर बोलने के लिए कुछ नहीं बचा है. पिछली बार जब वो बीजेपी के साथ सत्ता में थे तो इन्हीं बातों का श्रेय लेते रहते थे.

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