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बिहार में एनडीए का चेहरा कौन मोदी या नीतीश
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड का कहना है कि राज्य में वह बड़े भाई की भूमिका में ही रहेगी. रविवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर हुई अहम बैठक के बाद पार्टी की ओर से कहा गया कि बिहार में एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार होंगे और गठबंधन में जदयू ही बड़ी पार्टी रहेगी.
जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी और पवन कुमार वर्मा मंगलवार को होने वाली अहम बैठक में शामिल होने खासतौर पर दिल्ली से पटना आए थे. बीबीसी ने पवन कुमार वर्मा से पूछा कि क्या जदयू का बयान लोकसभा चुनाव में ज़्यादा-से-ज़्यादा सीटें हासिल करने के लिए दवाब बनाने की रणनीति का हिस्सा है?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''जहां तक बड़े भाई-छोटे भाई का सवाल है तो हमने सिर्फ़ इतना कहा है कि बिहार में जब सीट बंटवारे को लेकर बात होगी तो यह इस आधार पर होनी चाहिए कि जदयू बिहार में बड़ी पार्टी है. इस पार्टी के नेता नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री हैं.''
वे आगे कहते हैं, ''पहले फॉर्मूला था पच्चीस और पंद्रह का. अभी भी हम विधानसभा में बड़ी पार्टी हैं. इस पर किसी विवाद की गुंजाइश नहीं है. और अभी हमने तो सिर्फ़ इस बात को रखा है. अभी कोई बातचीत शुरू नहीं हुई है. हमें उम्मीद है कि जब यह शुरू होगी तो इसका सकारात्मक समाधान होगा. सीटों का बंटवारा कोई चुनौती नहीं है.''
''कोई बताशा के लिए मंदिर नहीं तोड़ेगा.''
एनडीए में वापसी के बाद क्या जदयू फिर से बड़ी पार्टी वाली भूमिका में आने के लिए दबाव बना रही है? इस सवाल के जवाब में पूर्व विधायक और भाजपा प्रवक्ता संजय सिंह टाइगर कहते हैं, ''एनडीए के फोरम पर सीटों का बंटवारा होगा. इसमें बयानों का कोई मतलब नहीं रहेगा. लोग अपने हिसाब से बयान देते हैं. लीडरशिप जब परिपक्व होती है तो ये बयान किसी निर्णय में बाधक नहीं बनते हैं. कोई बताशा के लिए मंदिर नहीं तोड़ेगा.''
संजय सिंह के मुताबिक महत्त्वपूर्ण यह है कि ज़्यादा- से-ज़्यादा सीटों पर कैसे जीत दर्ज की जाए न कि कौन ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़े.
वहीं गठबंधन का चेहरा कौन होगा इसके जवाब में संजय कहते हैं, ''बिहार में नीतीश कुमार एनडीए का चेहरा हैं लेकिन 2019 का चुनाव एनडीए नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ेगा. राज्यों में जो चेहरें हैं उसका भी लाभ इस चुनाव में मिलेगा.''
बिहार में लागू होगा तमिलनाडु मॉडल?
2009 में जब जदयू और भाजपा ने साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था तब जदयू बड़ी पार्टी की भूमिका में थी. तब जदयू ने पच्चीस तो भाजपा ने पंद्रह सीटों पर चुनाव लड़ा था. दूसरी ओर 2014 में जब एनडीए ने बिहार की चालीस में से इकतीस लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी तब जदयू एनडीए में शामिल नहीं थी. ऐसे में एनडीए अगर अपनी सभी हारी हुई नौ सीटें जदयू को दे भी देता है तो भी जदयू अपनी ख्वाहिश के मुताबिक बड़े भाई वाली भूमिका में नहीं आ पाएगी.
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन का मानना है जदयू का बयान दवाब बनाने का हिस्सा ही है मगर ये दवाब स्वाभाविक है. लेकिन उनका ये भी कहना है कि हालात अब 2009 के लोकसभा चुनावों जैसे नहीं हैं.
सुमन कहते हैं, ''जदयू पहले की तरह मज़बूत नहीं है और भाजपा पहले की तरह कमज़ोर नहीं. लेकिन बिहार एक बड़ा और अहम राज्य है और भाजपा को सूबे में बड़े एलायंस पार्टनर की ज़रुरत है. दोनों दल पुराने गठबंधन सहयोगी रहे हैं तो कोई-न-कोई रास्ता वे निकाल लेंगे.''
सुमन के मुताबिक एक रास्ता ये हो सकता है कि भाजपा की प्राथमिकता केंद्र में सरकार बनाने की है तो लोकसभा चुनाव में भाजपा ज्यादा सीटों पर लड़े और विधानसभा में जदयू ज्यादा उम्मीदवार उतारे. भारत की राजनीति में पहले तमिलनाडु जैसे राज्य ऐसे उदाहरण पेश कर चुके हैं.
तो क्या जदयू 2020 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ये दवाब की राजनीति कर रही हैं? इसके जवाब में सुमन कहते हैं, ''जदयू की तैयारी आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर ही है. हां वे इतना ज़रुर चाहेंगे कि 2019 के चुनाव में उन्हें सम्मानजनक सीटें मिलें.''
अभी जिस ढंग से उपचुनावों में उलटफेर हुए हैं, भाजपा से टीडीपी, शिवसेना जैसे सहयोगी दल अलग हुए हैं, उसके कुछ अन्य सहयोगी दलों के बीच भी सुगबुगाहट है. सुमन के मुताबिक ऐसे में भाजपा भी दवाब में है और जदयू की दवाब की रणनीति कामयाब हो सकती है.
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