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वो चेहरे जो सैनिटरी नैपकिन से जीएसटी हटवाने के पीछे हैं
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैं बहुत ख़ुश हूं. अपने लिए तो ख़ुश हूं ही, उन लाखों औरतों के लिए ज़्यादा ख़ुश हूं जो महंगे सैनिटरी नैपकिन नहीं खरीद सकतीं."
बीबीसी से फ़ोन पर बात करती ज़रमीना इसरार ख़ान की आवाज़ ख़ुशी से खनखनाती हुई लगती है.
यह ख़ुशी सैनिटरी नैपकिन्स के जीएसटी के दायरे से बाहर होने की है.
केंद्र सरकार ने शनिवार को हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद सैनिटरी नैपकिन्स से जीएसटी हटाने का फ़ैसला लिया है.
इससे पहले सैनिटरी पैड्स पर 12% का जीएसटी लगाया जा रहा था.
जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से पीएचडी कर रहीं 27 साल की ज़रमीना ने दिल्ली हाईकोर्ट में सैनिटरी नैपकिन्स से जीएसटी हटाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी.
सस्ते सैनिटरी नैपकिन्स के लिए अदालत का रुख़ क्यों?
इसके जवाब में ज़रमीना कहती हैं, "मैं उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जैसी छोटी जगह से आती हूं. मैंने देखा है कि ग़रीब औरतें कैसे मासिक धर्म के दौरान अख़बार की कतरनों, राख और रेत का इस्तेमाल करती हैं."
"मैं उनका दर्द समझती हूं. मैं ख़ुद एक लड़की हूं और समाजशास्त्र की छात्रा हूं. मैं समाज में औरतों के हालात से अच्छी तरह वाकिफ़ हूं. मुझे मालूम है कि ग़रीब तबके की औरतें कैसी तकलीफ़ों का सामना करती हैं. यही वजह है कि मैंने अदालत जाने का फ़ैसला किया."
ज़रमीना ने बताया जेएनयू में भी इस मुद्दे पर काफ़ी चर्चा होती थी लेकिन कोई आगे बढ़कर पहल नहीं कर रहा था और आख़िरकार उन्होंने पहल की.
अदालत में क्या तर्क पेश किया था?
ज़रमीना ने बताया, "मैंने कहा था कि अगर सिंदूर, बिंदी, काजल और कॉन्डोम जैसी चीजों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा जा सकता है तो सैनिटरी नैपकिन्स को क्यों नहीं?"
दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से सवाल भी किए थे. कोर्ट ने 31 सदस्यों वाली जीएसटी काउंसिल में एक भी महिला के न होने पर हैरानी जताई और पूछा कि क्या सरकार ने सैनिटरी नैपकिन्स को जीएसटी के दायरे में रखने से पहले महिला और बाल कल्याण मंत्रालय से सलाह-मशविरा किया था.
हाईकोर्ट की बेंच ने यह भी कहा था कि सैनिटरी नैपकिन्स औरतों के लिए बेहद ज़रूरी चीजों में से एक है और इस पर इतना ज़्यादा टैक्स लगाने के पीछे कोई दलील नहीं हो सकती.
ज़रमीना का मानना है कि सरकार को यह फ़ैसला लेने में इतनी देर लगानी ही नहीं चाहिए थी.
हालांकि, वो ख़ुश हैं कि देर से ही सही, सरकार ने सही फ़ैसला लिया.
दिल्ली हाईकोर्ट में ज़रमीना का पक्ष रखने वाले वकील अमित जॉर्ज का मानना है कि केंद्र सरकार ने ताज़ा फ़ैसले के पीछे न्यायपालिका की बड़ी भूमिका है.
ज़रमीना ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अदालतों में इतनी याचिकाएं आईं तो ज़ाहिर है मामला न्यायपालिका की नज़रों में आ गया था. कोर्ट ने भले ही इस पर कोई फ़ैसला नहीं दिया था लेकिन सरकार से कड़े सवाल पूछे थे."
"कोर्ट ने इस पर दोबारा विचार करने को कहा था. जिसका नतीज़ा आज हमारे सामने है."
इस मामले में ज़रमीना के वकील अमित जॉर्ज कहते हैं, "सैनिटरी पैड्स कोई लग्ज़री आइटम नहीं हैं. ये हर औरत की ज़रूरत है न कि चॉइस. इसके अलावा, इन पर लगे टैक्स का असर सिर्फ़ महिलाओं पर पड़ता है."
"भारतीय संविधान के अनुसार आप कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं बना सकते जिसका बुरा असर सिर्फ़ महिलाओं पर पड़े, फिर चाहे वह कोई टैक्स ही क्यों न हो. सैनिटरी नैपकिन्स औरतों के स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी हैं, इसलिए यह मामला अपने आप में काफ़ी अलग है."
सरकार की क्या दलीलें थीं?
अमित ने बताया, "सरकार की दो दलीलें थीं. एक तो उनका कहना था कि सैनिटरी नैपकिन्स पर पहले से सेल्स टैक्स था और उन्होंने इसे हटाकर इसके दाम घटा दिए थे. यह तर्क तथ्यात्मक रूप से भ्रामक था क्योंकि कई राज्यों में सैनिटरी पैड्स पर लगने वाला सर्विस टैक्स काफ़ी कम था और जीएसटी लगने के बाद इसके दाम और बढ़ गए थे."
अमित के मुताबिक़ सरकार की दूसरी दलील यह थी कि अगर सैनिटरी पैड्स को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया था भारत की छोटी कंपनियों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा और बाज़ार चीनी उत्पादों से भर जाएगा.
अमित का मानना है कि चूंकि अब सरकार ने ख़ुद ही अपना फ़ैसला पलट दिया है तो ज़ाहिर है उन्होंने जो दलीलें पेश कीं उनमें दम नहीं था.
अमित ने बताया कि पिछले एक साल में दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले पर तीन सुनवाइयां हुई थीं. तीन सुनवाइयों के बाद सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफ़र करने की अपील की थी और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कुछ महीनों के लिए स्टे लगा दिया था.
ऐसा इसलिए क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट में भी इसी मुद्दे पर सुनवाई चल रही थी. फिलहाल पिछले कुछ तीन-चार महीने से यह मामला ठंडे बस्ते में था.
अमित ने कहा कि अब सरकार की तरफ़ से फ़ैसला आ ही गया है तो इस मुद्दे पर दायर की गई याचिकाएं अब वापस ले ली जाएंगी.
'सैनिटरी पैड औरतों की जीवनरक्षक दवा जैसी'
कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव भी सैनिटरी नैपकिन पर 12 फीसदी जीएसटी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती आई हैं.
जीएसटी काउंसिल के फ़ैसले के बाद उन्होंने बीबीसी से कहा, "मैं सरकार के फ़ैसले का स्वागत करती हूं. हम तो पिछले एक साल से यही कहते आ रहे हैं कि सैनिटरी नैपकिन्स इतना रेवेन्यू देने वाला प्रोडक्ट है ही नहीं कि इस पर इतना टैक्स लगाया जाए."
उन्होंने कहा, ''सैनिटरी नैपकिन्स महिलाओं के जीवन के अधिकार से जुड़ा है. यह उनके लिए किसी जीवनरक्षक दवा से कम नहीं. इस पर टैक्स लगाना महिलाओं के अधिकारों का हनन है. अब चूंकि इन्हें जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है, ये गावों के बाज़ारों में आसानी से उपलब्ध होंगे."
सुष्मिता कहती हैं, "औरतों से जुड़े मुद्दों पर फ़ैसला करते वक़्त औरतों को ही ध्यान में नहीं रखा जाता. इसकी एक वजह पॉलिसी मेकिंग और राजनीति में औरतों की भागीदारी न होना भी है."
एक साल बाद अचानक अपना ही फ़ैसला पलटने के पीछे सरकार की क्या सोच होगी?
इसके जवाब में सुष्मिता ने कहा, "सरकार ने जीएसटी लागू करने का फ़ैसला ही बिना प्लानिंग के किया था. मुझे लगता है कि सरकार को ऐसे मुद्दों पर खुलकर सोचना चाहिए और सबकी ज़रूरतों पर ध्यान देना चाहिए."
नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (2015-16) की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि शहरों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं. कुल मिलाकर देखा जाए तो 57.6 प्रतिशत महिलाएं इनका इस्तेमाल करती हैं.
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