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अविश्वास प्रस्ताव: कौन फ़ायदे में, किसका नुक़सान
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
आख़िर तीन माह में ऐसा क्या हो गया कि नरेंद्र मोदी हुकूमत उस अविश्वास प्रस्ताव पर बहस को तैयार हो गई जो मार्च में ख़ारिज हो गया था! और विपक्ष, की रणनीति क्या है इस मुद्दे पर जबकि उसे मालूम है कि इसपर होनेवाली वोटिंग के लिए नंबर उसके पक्ष में नहीं हैं.
सरकार और विपक्ष दोनों की कोशिश है एक-दूसरे को घेरने की, एक दूसरे की कमज़ोरियां गिनाकर संसदीय बहस में उसे धवस्त करने की और अंतत: उस संदेश को जनता के बीच पहुंचाने की.
बीजेपी की राजनीति पर पैनी नज़र रखनेवाले अजय सिंह कहते हैं, "सरकार को लगता है कि शुक्रवार को होनेवाली बहस में अपने चार साल के काम-काज का लेखा-जोखा पेश करने के लिए एक बेहतर मौक़ा हो सकता है. ये याद रखने की ज़रूरत है कि आम चुनाव को क़रीब साल भर ही रह गया है."
अजय सिंह का मानना है कि सरकार ये संदेश भी देना चाहती है कि जनता के बीच नरेंद्र मोदी की पकड़ अभी भी मज़बूत है.
आंध्र प्रदेश के रानजीतिक दल तेलगू देशम पार्टी के ज़रिये लाये गए अविश्वास प्रस्ताव के बाद संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने बुधवार को कहा भी, "हम वोटिंग के लिए तैयार हैं. पूरे देश को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में यक़ीन है."
विपक्षी एकता संसद में टेस्ट
राजनीतिक विश्लेषक कल्याणी शंकर मानती हैं, "विपक्ष की रणनीति है कर्नाटक में दिखी एकता को (जब सारे विपक्षी नेता साथ मंच पर दिखे थे), संसद के माध्यम से आगे ले जाने की और सरकार की कमियों को वैसे समय में उजागर करने की जब तीन सूबों के चुनाव बस कुछ ही दूर हैं."
अगले कुछ महीनों में तीन बीजेपी शासित राज्यों - राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने हैं.
राजस्थान में लोग वसुंधरा राजे सरकार से नाराज़ बताए जा रहे हैं, तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 सालों से बीजेपी की सरकारें सत्ता में हैं.
बुधवार को पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव में टीडीपी की अपनी रणनीति है: 2014 में दो हिस्सों - तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बांटे गए राज्य को विशेष दर्जा न दिए जाने की वजह से आंध्र प्रदेश में भारी नाराज़गी है.
टीडीपी चाहती है कि वो विशेष दर्जा न मिल पाने के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष में सबसे आगे दिखे. विशेष राज्य का दर्जा मिलने से सूबे को केंद्र से और अधिक फंडिंग और दूसरी तरह की सहूलियतें हासिल होती हैं.
टीडीपी ने इसी तरह का प्रस्ताव मार्च में बजट सत्र के दौरान भी लाने की कोशिश की थी, लेकिन तब लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इसे ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि पहले ज़रूरी है कि सदन का कामकाज सुचारू रूप से जारी रहे.
इस बार क्यों स्वीकार
लेकिन कल्याणी शंकर मानती हैं कि वजह संसद में उस समय जारी हंगामा नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी थे जो तब तक शायद किसी तरह का सवाल तक सुनने को तैयार नहीं हो पाए थे.
वो सवाल करती हैं, जब बजट इस हंगामे के बीच पास हो सकता था तो प्रस्ताव स्वीकार कर बहस होने में क्या दिक्क़त थी?
प्रधानमंदी मोदी ने बुधवार सुबह को ही कहा, "अगर कोई राजनीतिक दल या सदस्य किसी विषय पर बहस चाहते हैं, तो सरकार तैयार है."
इतना ही नहीं, उन्होंने ये भी कहा कि संसद में बहस देश के लिए बेहतर है और इस दौरान जो सुझाव आएंगे वो सरकार को फ़ैसले लेने में मदद करेंगे.
मार्च से जुलाई के बीच की अवधि को लेकर लोगों का मानना है कि लगातार बढ़ती महंगाई, किसानों की ख़स्ता हालत और जारी आत्महत्याएं, लिंचिंग और क़ानून-व्यवस्था की लचरता को लेकर देश में मोदी-विरोधी जन भावनाएं ज़ोर पकड़ रही हैं.
विपक्ष चाहता है कि वो इसके ज़ोर पर मोदी को सत्ता से उखाड़ने की कोशिश करे, वहीं अजय सिंह के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश होगी कि वो पूरे मामले को मोदी बनाम संपूर्ण विपक्ष के तौर पर पेश कर सकें जिसका फ़ायदा हमेशा उन्हें होता रहा है.
मगर कल्याणी शंकर को आशंका है कि मोदी इस बहस के मौक़े का इस्तेमाल राहुल गांधी के कथित कांग्रेस-मुस्लिम बयान जैसे मुद्दे को उठाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए न करें.
उर्दू अख़बार इंक़लाब ने हाल में कांग्रेस अध्यक्ष के हवाले से ख़बर दी थी कि राहुल गांधी ने मुस्लिमों के साथ हुई एक बैठक में कहा था कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है.
मोदी सरकार के तीन बड़े मंत्रियों के अलावा ख़ुद प्रधानमंत्री इस कथित बयान पर बोलने से नहीं चूके हैं.
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