ब्लॉग: भारत के मुसलमानों को आज क्या करना चाहिए

    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता

भारत में केंद्र में शासन करनेवाली पार्टी बीजेपी ने इन दिनों राजनीतिक बहस का रुख हिंदुत्व की तरफ़ मोड़ दिया है. एक वक़्त था जब वह राजनीतिक विरोधियों और उसके ख़िलाफ़ वाली विचारधाराओं को 'देश का दुश्मन' क़रार देती थी.

अब वह विपक्ष के बयानों को 'हिंदू विरोधी' क़रार देने लगी है. बीते दिनों कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने एक बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि 'बीजेपी अगर दोबारा सत्ता में आती है तो वह भारत को 'हिंदू पाकिस्तान' बना देगी.'

हिंदू पाकिस्तान से उनका मतलब ये था कि वह भारतीय लोकतंत्र को एक हिंदू राष्ट्र में बदल देगी जिसमें बहुसंख्यकों के धर्म का राज होगा और जिसमें अल्पसंख्यकों को बराबर के अधिकार हासिल नहीं होंगे.

बीजेपी ने उनके इस बयान को हिंदुओं पर हमला बताया और कहा कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता हमेशा से ही हिंदुओं के विरोधी रहे हैं.

क्या कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनावों की तैयारी के तौर पर अलग-अलग समुदायों के विचार जानने की कोशिश के तहत बीते दोनों मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाक़ात की थी.

बीजेपी ने इस मुलाक़ात पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वो राहुल गांधी से जानना चाहती है कि क्या कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है?

दरअसल, बीजेपी आगामी चुनावों में हिंदुत्व का सहारा लेना चाहती है और वह धीरे-धीरे इसकी तरफ़ बढ़ रही है. चुनावों में विकास और सरकार के काम के एजेंडे से ज़्यादा हिंदुत्व का प्रभाव होगा.

इधर बीजेपी की सरकार ने मुसलमानों में एक ही बार में तीन तलाक़ ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने के बाद अब निकाह हलाला और एक बार में एक से ज़्यादा शादियां करने को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने की तरफ़ क़दम बढ़ाया है. मुसलमानों के इस तरह के पारिवारिक या निजी मामलों की ज़िम्मेदारी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की हुआ करती थी.

पर्सनल लॉ बोर्ड ने इन मसलों पर अस्पष्ट रवैया रखकर अप्रत्यक्ष रूप से इन परंपराओं का समर्थन किया. इसके नतीजे में शादी, तलाक़ और देखभाल के लिए दिए जाने वाले मेंटेनेंस जैसे मामलों में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हो सका.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की खोती साख

अब जब अचानक सरकार ने अदालत में इन प्रथाओं को ख़त्म करने की कोशिश शुरू कर दी है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड घबरा उठा है. पहले उसने अपने समर्थन में राय बनवाने की कोशिश की, लेकिन क़ानून में बदलाव की बढ़ती मांग से उसकी हालत पेचीदा हो गई. पर्सनल लॉ बोर्ड को महसूस होने लगा कि मुसलमानों में उसकी हैसियत कमज़ोर पड़ने लगी है और उसके फ़ैसले अब सरकारों और अदालतों के हाथों की तरफ़ फिसल रहे हैं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुसलमानों में अपनी खोती हुई साख बहाल करने के लिए देश के सभी ज़िलों में शरीया अदालत क़ायम करने का ऐलान कर दिया.

इन मनोनीत अदालतों में जमाते इस्लामी, जमीयत उलेमा ए हिंद, देवबंद, नदवा इस जैसे संस्थानों के काज़ी और मुफ़्ती मुसलमानों के मसले का इस्लामी दृष्टिकोण से फ़ैसला सुनाएंगे.

दिलचस्प पहलू ये है कि पर्सनल लॉ बोर्ड इस तरह की मनोनीत अदालतें पहले भी क़ायम कर चुका है, लेकिन उसकी ये कोशिश पूरी तरह नाकाम साबित हुई. एक लोकतांत्रिक देश में एक वैकल्पिक न्याय प्रणाली स्थापित करने का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं है.

शरीया अदालतें स्थापित करने के ऐलान को कई लोग लोकतंत्र में इस्लामी राष्ट्र स्थापित करने की मौलवियों की कल्पना मानते हैं. संवैधानिक विशेषज्ञ इसे खाप पंचायत क़रार दे रहे हैं.

लोकतंत्र लोगों की आज़ादी और बराबरी के अधिकारों पर क़ायम हैं. कोई भी क़ानून और परंपरा जो लोगों की आज़ादी, मानवाधिकार और पुरुषों एवं महिलाओं की समानता के विचार से उलझन में हैं, उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में जगह नहीं मिलती है.

देश के धार्मिक नेता शरीया अदालत स्थापित करने की जगह अगर अपने बनाए नियम को आधुनिक और लोकतंत्र के साथ मिलाने की कोशिश करें तो यह देश के मुसलमानों और लोकतंत्र दोनों के लिए बेहतर होगा.

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