अब तक अयोध्या क्यों नहीं गए नरेंद्र मोदी?

नरेंद्र मोदी, अयोध्या, उत्तर प्रदेश, बीजेपी, योगी आदित्यनाथ

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, अयोध्या से, बीबीसी हिंदी के लिए

"मोदी जी बनारस से लेकर मगहर तक चले गए. दुनिया भर में घूम-घूम कर मंदिर, मस्जिद और मज़ार पर जा रहे हैं लेकिन अयोध्या से पता नहीं क्या बेरुख़ी है उन्हें?"

अयोध्या में चाय की दुकान पर अख़बार पढ़ रहे संन्यासी वेश में एक सज्जन ने बातचीत के दौरान बड़ी निराशा और शिकायत के साथ ये बात कही.

हम मगहर से प्रधानमंत्री की रैली कवर करके लखनऊ लौट रहे थे. रास्ते में अयोध्या में रुकते हुए चाय पीने लगे.

वहीं, इनसे मुलाक़ात हुई और बातें शुरू हो गईं. हमने नाम जानना चाहा तो बोले, "साधु का कोई नाम नहीं होता. बस यही दंड और गेरुआ रंग ही उसकी पहचान होती है. नाम पहले जो था, अब उससे हमारी पहचान नहीं है."

ख़ैर, उनका नाम पहले क्या था और अब क्या है, इसमें हमारी बहुत दिलचस्पी भी नहीं थी, इसलिए दोबारा बताने का आग्रह नहीं किया.

लेकिन, एक साधु के रूप में जो पीड़ा उन्होंने व्यक्त की, उसका समर्थन दुकान पर मौजूद अयोध्या के कुछ स्थानीय लोग भी करते मिले.

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बीजेपी की राजनीतिक पहचान

साकेत महाविद्यालय फ़ैज़ाबाद से बीकॉम कर रहे दिनेश श्रीवास्तव अपने दोस्तों के साथ सरयू तट पर घूमने के लिए आए हुए थे.

दिनेश कहने लगे, "यहां आकर बताएंगे क्या? केंद्र में चार साल सरकार में बिता दिए, डेढ़ साल राज्य में भी सरकार बनाए हो रहे हैं, हर जगह बहुमत है, अब कोई बहाना नहीं है, फिर भी मंदिर निर्माण के लिए कोर्ट का बहाना बना रहे हैं."

दरअसल, अयोध्या और भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संबंध भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है.

उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर की कितनी भूमिका रही है, यह किसी से छिपा नहीं है.

यही नहीं, 1991 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की जब पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के तत्काल बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए आया था.

इतना ही नहीं, पिछले साल उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनी है तब से अयोध्या के विकास के लिए न सिर्फ़ तमाम घोषणाएं की गईं बल्कि दीपावली के मौक़े पर भव्य कार्यक्रम और दीपोत्सव का आयोजन भी किया गया.

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योगी का अयोध्या प्रेम

मुख्यमंत्री योगी आए दिन अयोध्या आते रहते हैं.

ऐसे में पहली बार केंद्र में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री चार साल से ज़्यादा समय बिताने के बावजूद अयोध्या न आना, चौंकाता ज़रूर है.

बीजेपी नेता इस बारे में बात करने से थोड़ा परहेज़ करते हैं लेकिन अयोध्या से बीजेपी सांसद लल्लू सिंह इसे सिर्फ़ इत्तेफ़ाक बताकर सवाल को टाल जाते हैं.

लल्लू सिंह कहते हैं, "ये सही है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी अयोध्या नहीं आए. चुनाव के समय भी उन्होंने फ़ैज़ाबाद में रैली को संबोधित किया था. लेकिन इसका कोई ख़ास मतलब नहीं है कि वह यहां क्यों नहीं आए. व्यस्त कार्यक्रम रहता है उनका, समय नहीं मिला होगा. लेकिन आएंगे ज़रूर."

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इमेज कैप्शन, अयोध्या से बीजेपी सांसद लल्लू सिंह

'पहले शौचालय, फिर देवालय'

प्रधानमंत्री का समय काफी व्यस्त होता है, इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता.

लेकिन, ये सवाल तब और मौजूं हो जाता है जब प्रधानमंत्री वाराणसी से ही सांसद हों, वाराणसी की बार-बार यात्रा करते हों, अन्य शहरों में भी जाते हों, कबीर की समाधि स्थली मगहर तक चले गए हों, लेकिन अयोध्या आने का समय न निकाल पाए हों.

वहीं, अयोध्या जिसे राजनीतिक हलकों में बीजेपी की 'प्राणवायु' समझा जाता है.

दरअसल, नरेंद्र मोदी न सिर्फ़ प्रधानमंत्री रहते कभी अयोध्या आए और न ही 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अयोध्या यात्रा की.

यहां तक कि एक बार चुनावी रैली प्रस्तावित भी हुई थी लेकिन बाद में वो किन्हीं कारणों से रद्द कर दी गई. लोकसभा चुनाव के दौरान फ़ैज़ाबाद और आंबेडकरनगर की रैलियों में वो ज़रूर गए थे.

यही नहीं, लोकसभा चुनाव के दौरान और पिछले साल हुए विधान सभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में हुई दर्जनों जनसभाओं में भी उन्होंने कहीं भी अयोध्या या राम मंदिर का कोई ज़िक्र नहीं किया.

लोकसभा चुनाव के दौरान तो एक जनसभा में उन्होंने ये कहकर एक तरह से राम मंदिर को पार्टी की प्राथमिकताओं से ही लगभग ख़ारिज कर दिया कि 'पहले शौचालय, फिर देवालय.'

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सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद

हालांकि इस बीच उन्होंने पिछले दिनों हुए गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राम मंदिर का ज़िक्र ज़रूर किया था.

एक चुनावी जनसभा में उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल अयोध्या में राम मंदिर मामले की सुनवाई को अगले चुनाव तक टालने की सुप्रीम कोर्ट से क्यों मांग कर रहे हैं.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि नरेंद्र मोदी 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ज़रूर अयोध्या जाएंगे.

उनके मुताबिक, "नरेंद्र मोदी अयोध्या एक विजेता के रूप में जाना चाहते हैं. पूरी उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से राम जन्म भूमि और विवादित ढांचे का कोई न कोई फ़ैसला ज़रूर आ जाएगा."

"यदि हाई कोर्ट के फ़ैसले के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट का भी फ़ैसला आता है तो ज़ाहिर है ये हिंदुओं के पक्ष में होगा क्योंकि हाई कोर्ट भी दो तिहाई ज़मीन हिंदू पक्ष को सौंप ही चुका है."

"ऐसा फ़ैसला आने के बाद यदि नरेंद्र मोदी अयोध्या जाते हैं तो ज़ाहिर है, फ़ैसला भले ही कोर्ट का हो, क्रेडिट मोदी जी लेने की पूरी कोशिश करेंगे."

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हिंदू हृदय सम्राट होने का प्रमाण

लेकिन अयोध्या की इस कथित उपेक्षा की चर्चा क्या बीजेपी नेताओं, आरएसएस के आनुषंगिक संगठनों, आस्थावान हिंदुओं के बीच नहीं होती होगी, जो बीजेपी को एक तरह से 'राम मंदिर समर्थक पार्टी' के तौर पर देखते हैं?

योगेश मिश्र कहते हैं, "नरेंद्र मोदी कट्टर हिंदुओं को अपने हिंदू हृदय सम्राट होने का प्रमाण पत्र गुजरात में दे चुके हैं."

"यही कारण है कि अयोध्या की चर्चा कभी ख़ुद न करने और देवालय से पहले शौचालय बनाने की बात करने के बावजूद हिंदुओं का ये वर्ग उनके ख़िलाफ़ आक्रामक नहीं हो पाया. उसे पता है कि ये सब चुनावी सभाओं की विवशता हो सकती है लेकिन मोदी जी हिंदुओं के हितैषी हैं, इसमें वो संदेह की गुंज़ाइश फ़िलहाल नहीं देखता."

योगेश मिश्र कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ख़ुद भले ही अयोध्या न आएं या अयोध्या की चर्चा न करें, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये उनके एजेंडे में नहीं है.

योगेश मिश्र के मुताबिक, "बीजेपी के तमाम नेता जो अपनी आक्रामक शैली में अयोध्या या राम मंदिर की चर्चा करते हैं, तो आपको क्या लगता है कि ये बिना उनकी मौन स्वीकृति के हो रहा है?"

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चुनावी मजबूरियां...

जानकारों का ये भी कहना है कि राम मंदिर का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में होने के चलते प्रधानमंत्री जानबूझकर उसकी चर्चा नहीं करते ताकि उन पर किसी तरह के सवाल न उठें.

दूसरा ये भी कि राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद वो लगातार अपनी उस छवि से बाहर आने की कोशिश करते रहे हैं जो गुजरात में मुख्यमंत्री रहते उनकी बनी थी.

यानी, अब वे 'विकास पुरुष' की छवि में ही रहना चाहते हैं.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान के मुताबिक, "चुनावी मजबूरियां उन्हें कब्रिस्तान-शमशान, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों पर बोलने को विवश कर देती हैं और वे ख़ुद अपनी पुरानी छवि में लौट आते हैं."

प्रधानमंत्री के अयोध्या न जाने के पीछे जो भी वजह या मजबूरियां हों लेकिन कुछ हिंदूवादी संगठनों के लोगों से बात करने पर ऐसा लगता है कि मोदी की अयोध्या से ये 'बेरुख़ी' उन्हें न सिर्फ़ हैरान करती है, बल्कि इस बात से उनके भीतर एक क्षोभ भी है.

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अयोध्या को मोदी का इंतज़ार

कुछ लोग तो सीधे तौर पर प्रधानमंत्री पर 'छवि सुधारने की कोशिश' का आरोप लगाते हैं लेकिन कुछ बचाव करते भी नज़र आते हैं.

अयोध्या में रहने वाले आरएसएस के प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, "बिल्कुल, अयोध्यावासियों को इस बात का मलाल है कि मोदी जी अयोध्या क्यों नहीं आए."

"मुश्किल से 150 किमी. दूर मगहर तक आप चले आए, तो कभी अयोध्या भी आ जाइए. अयोध्या आपका इंतज़ार कर रही है."

शरद शर्मा बताते हैं कि महंत नृत्यगोपाल दास के जन्म दिवस पर दो बार प्रधानमंत्री को आमंत्रित भी किया गया लेकिन इस आमंत्रण के बावजूद उन्होंने अयोध्या आने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

जबकि उनके जन्मदिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में तमाम नेता आते हैं. इस बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी गए थे.

यही नहीं, बीजेपी के भी तमाम नेता इस बारे में खुलकर तो कुछ नहीं कहते लेकिन दबी ज़ुबान में वो इससे ख़ुश नज़र नहीं आते.

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अयोध्या से जनकपुर

अयोध्या में एक होटल के मालिक देवेश तिवारी मुस्कुराकर कहते हैं, "अयोध्या से जनकपुर तक के लिए बस सेवा की शुरुआत करने भी मोदी जी अयोध्या नहीं आए बल्कि नेपाल चले गए. आख़िर हरी झंडी तो यहां से भी दिखा सकते थे. जनकपुर उसके बाद चले जाते."

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता को उनके मगहर तक आने के बावजूद अयोध्या न आने और भाषण में उसकी चर्चा तक न करने से बेहद तकलीफ़ है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक़ रखने वाले इन वरिष्ठ नेता से मगहर में ही मुलाक़ात हुई.

नाम न छापने की शर्त पर वह कहते हैं, "सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं लेकिन कौन नहीं देख रहा है कि जाति, धर्म, संप्रदाय, मठ, मज़ार सबकी राजनीति हो रही है."

"मगहर और कबीर के प्रति अचानक जगी आपकी आस्था से क्या मान लिया जाए कि भगवान राम के प्रति आपकी आस्था नहीं है या फिर जिनकी आस्था भगवान राम के प्रति है, उनके वोट की आपको ज़रूरत नहीं है?"

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लोकसभा चुनाव से पहले

धीरे-धीरे ये वरिष्ठ नेता कुछ ज़्यादा ही आक्रामक हो गए और कहने लगे, "अयोध्या और राम मंदिर में तो मोदी जी की रुचि पहले भी कभी नहीं दिखी."

"वो तो केवल आडवाणी जी की रथयात्रा में ही उनके साथ दिखे हैं. न तो कभी उन्होंने कारसेवा की और न ही गुजरात का मुख्यमंत्री रहते यहां कभी आए."

"राम मंदिर का दर्द तो वही जान सकता है जिसने लाठियां खाईं, गोली खाई, जेल गया, जीवन बर्बाद किया और इसके बावजूद वो अपने राम लला को अपनी ही पार्टी की सरकार में तंबुओं में पड़ा देख रहा है."

बहरहाल, अयोध्या के लोगों को अभी भी उम्मीद है कि प्रधानमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी यहां ज़रूर आएंगे.

जानकारों का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले वो यहां आएंगे, लेकिन सबसे अहम सवाल यही है कि ये उनकी आस्था के तहत होगा या फिर चुनावी विवशता के.

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