नज़रिया: क्या भारत में फिर इमरजेंसी लगना संभव है?

आज़ाद भारत के इतिहास में 25 जून का दिन बेहद अहम है. आज ही के दिन 43 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी यानी आपातकाल लगा दिया था. इस दौरान कई नेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को जेल में भर दिया गया और प्रेस की आज़ादी पर भी अंकुश लगा दिया गया था.

जिन पत्रकारों को इस दौरान गिरफ्तार किया गया था उनमें से एक थे वीरेंद्र कपूर जिन्हें अरुण जेटली के साथ गिरफ्तार किया गया था. डिफेंस इंडिया रूल्स के तहत गिरफ्तार किए गए वीरेंद्र उस वक्त 'द इंडियन एक्सप्रेस' के लिए काम करते थे. वो कहते हैं कि उस वक्त कांग्रेस नेता अंबिका सोनी के साथ उनका विवाद हो गया था.

2015 में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और मार्गदर्शक मंडल के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वो ये नहीं मानते कि भारत में दोबारा इमरजेंसी नहीं लगेगी.

बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने इमरजेंसी के गवाह रहे वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर से पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि आज के हालात में भारत में फिर इमरजेंसी लगाई जा सकती है. पढ़िए वीरेंद्र कपूर का नज़रिया-

क्या फिर लग सकती है इमरजेंसी?

मुझे नहीं लगता कि उस तरह की इमरजेंसी दोबारा लग सकती है. वो इसलिए कि जनता बहुत जागरुक है. 40 साल के बाद आज आम आदमी को उसके अधिकारों का पता है.

दूसरा ये कि आज के वक्त में मीडिया, सोशल मीडिया और इंटरनेट इतना बढ़ गया है कि आज 1975 के जैसी इमरजेंसी नहीं लग सकती.

इमरजेंसी के कई रूप हो सकते हैं. ऐसा नहीं है कि आपको जेल में ही डालना है. सरकारें आज के दिन भी लोगों को या अपने विरोधियों को ऑथोरिटेरियन तरीके से संभाल सकती हैं.

लेकिन जिस तरह की इमरजेंसी इंदिरा गांधी और संजय गांधी ने लगाई थी वो आज मुमकिन नहीं है.

क्या ख़ास था उस वक्त की इमरजेंसी में?

उस वक्त देश में एक ही व्यक्ति का राज था. विपक्ष काफ़ी कमज़ोर और बिखरा हुआ था.

दूसरा ये कि मीडिया उस वक्त मज़बूत नहीं थी. अधिकांश मीडिया कांग्रेस और सत्ताधारी पार्टी का समर्थक थी और डर के मारे अधिक नहीं बोलती थी. मीडिया की चाबी उन मालिकों के हाथों में थी जो सत्ताधारी पार्टी से लाइसेंस लेने के लिए निर्भर करते थे.

आज के दौर में मीडिया का काफ़ी विस्तार हो गया है और मीडिया में भिन्नता आ गई है.

आज़ादी के बाद से लेकर जब तक इमरजेंसी लगी थी तब तक देश में सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी का राज था. इमरजेंसी के बाद लोगों को लगा कि हम कांग्रेस को या फिर एक पार्टी के राज को हटा सकते हैं.

राजनीति में एक विकल्प भी हो सकता है, ये इमरजेंसी ने जनता को सिखाया. जनता को लगा कि इंदिरा गांधी को हराना संभव है.

ये पहले नहीं था जो आज है. इमरजेंसी की ये बहुत बड़ी देन है कि उसने जनता को जागरुक किया कि जो शासक जनता पर अधिक ज़्यादती करे तो उसे जनता ही उखाड़ कर फेंक सकती है.

प्रेस, राजनीति और नियंत्रण

आज के दौर को देखें तो सत्ताधारी पार्टी का नेतृत्व काफ़ी मज़बूत है और मीडिया की आज़ादी को लेकर ख़तरा भी है. अगर हम ये मान भी लें कि आज मीडिया कई गुना फैल चुकी है, लेकिन मीडिया पर जिन कंपनियों का मालिकाना हक़ है, उनमें से कुछ के संबंध सत्ताधारी पार्टी के साथ हैं. तो क्या ऐसे में कहा जा सकता है कि प्रेस पर अब भी राजनीतिक नियंत्रण होता है?

कुछ लोग ये फैलाते हैं कि आज प्रेस की आज़ादी को दबाया जा रहा है, लेकिन ऐसा है नहीं. आज कुछ टेलीविज़न चैनल अगर सरकार के पक्ष में हैं तो कुछ उसके विरोध में भी हैं.

हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को किसी ने चुनौती नहीं दी तो ऐसा लगा कि वो बहुत लोकतांत्रिक नेता हैं. उस वक्त मेरे मित्र राजेंद्र पुरी 'हिंदुस्तान टाइम्स' अख़बार के साथ जुड़े थे. वो एक अच्छे कार्टूनिस्ट थे. उन्होंने 1962 के युद्ध के बाद नेहरू की चीन नीति की नाकामी से संबंधित तीन-चार कार्टून बनाए थे. उन्हें 28-29 साल की उम्र में हिंदुस्तान टाइम्स ने निकाला था और ज़िंदगी भर वो फिर नौकरी नहीं कर सके.

कोई नेता नहीं चाहता कि मीडिया पूरी तरह आज़ाद होकर काम करे. नेता चाहता है कि मीडिया वहां तक आज़ाद हो जहां तक वो उसका समर्थन करे.

आज आप देख रहे हैं कि अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप क्या बोल रहे हैं. ये नेता की ताक़त के चरित्र में है कि वो प्रेस को अपना दोस्ताना प्रेस मानते हैं और इसका किसी ख़ास नाम से कोई नाता नहीं है.

ये पत्रकारों पर है कि वो ख़ुद लड़ने में कितना यक़ीन रखते हैं और सक्षम हैं क्योंकि मैं देखता हूं कि कुछ पत्रकार तो ख़ुद ही सेलिब्रिटी बनना चाहते हैं.

मैं ऐसे कई पत्रकारों को जानता हूं जिन्होंने इंदिरा गांधी और नेहरू के दौर में कहा कि वो किसी की चमचागिरी करना पसंद नहीं करेंगे और उन्हें नौकरी नहीं मिली. लेकिन आज के वक्त में वो मुश्किल नहीं है. आपके पास इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने का विकल्प है. लेकिन उन दिनों कोई विकल्प भी नहीं था पत्रकारों के पास.

सच कहूं तो आज के दौर में ज़रूरत से अधिक आज़ादी है और उसकी ज़िम्मेदारी भी तय नहीं है. मेरा लेख कहीं नहीं छपे तो मैं उसे इंटरनेट पर डाल सकता हूं.

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