'हिंदी-रूसी भाई-भाई' अब बीते दिनों की बात?

    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मॉस्को से

शाम का समय है और मॉस्को शहर के एक ख़ूबसूरत से फ़्लैट में हम शाम की चाय पी रहे हैं. घर अभिषेक सिंह का है जो अब रूस में रम चुके है.

पत्नी साशा यहीं की हैं और इनका बेटा छह महीने का है. दोनों का रोमांस यूक्रेन में हुआ था और शादी हुई उत्तर प्रदेश के हरदोई शहर में जहाँ अभिषेक के माता-पिता रहते हैं.

पेशे से आईटी प्रोफेशनल, अभिषेक, का मानना है कि भारतीयों का रूस से लगाव पुराना है. लेकिन एक ही कसक है.

उन्होंने कहा, "सब अच्छा है लेकिन एक ही दिक्कत है. अपने रिश्तेदारों या दोस्तों को आसानी से यहाँ बुलाना मुश्किल है क्योंकि वीज़ा के नियम बहुत कड़े हैं. पूरा प्लान बताइए, होटल में बुकिंग के कागज़ात वगैरह पहले से भेजने पड़ते हैं. हाँ, रूसियों को भारत जाने के लिए वीज़ा बेहद आसानी से मिलता है."

आज भी भारत की सामरिक निर्भरता रूस पर ही

भारत और रूस के बीच एक लंबे समय से दोस्ती के रिश्ते रहे हैं. जग-ज़ाहिर है कि आज़ादी के बाद से रूस ने आगे बढ़ कर भारत की आर्थिक और सामरिक मदद भी की है.

भारतीय फ़र्टिलाइज़र उद्योग से लेकर सेना के टैंक और मिग या सुखोई विमानों तक, हर चीज़ पर रूसी छाप रही है. आज भी भारतीय हथियार उद्योग की बड़ी निर्भरता रूस पर है.

इसके अलावा तमाम भारतीय ऐसे भी थे जिन्होंने उस 'घनी दोस्ती' के दौर में यहाँ आकर अपनी एक जगह भी बना ली थी.

1990 में जब सैमी कोटवानी यहाँ आए तब हालात मुश्किल थे और लोग दूसरी जगहें तलाश रहे थे. सोवियत यूनियन की जगह एक नया रूस जन्म लेने की तैयारी कर रहा था लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत ख़स्ताहाल थी.

खुद को गर्व से 'दर्ज़ी' बताने वाले सैमी कोटवानी की टेलरिंग कंपनी अब पूरे यूरोप में फैल चुकी है.

सैमी ने बताया, "एक दौर सोवियत यूनियन का था जिस समय हमारे व्यापारियों ने बहुत पैसा कमाया और चले गए. लेकिन अब ये देश वन टाइम मेकिंग मनी वाला नहीं रह गया, ये बहुत ही जटिल है और बिज़नेस करना उतना सरल भी नहीं. मगर आज भी आप लॉन्ग टर्म स्ट्रेटेजी बनाकर आइए तो इससे अच्छा देश नहीं."

सैमी कोटवानी जैसे लोगों ने तो रूस में 'कड़ी मेहनत' कर अपनी एक जगह बना ली है. आज की तारीख़ में उनकी कंपनी में तमाम रूसी नागरिकों को भी रोज़गार मिला हुआ है. चेन्नई के रहने वाले कासी विश्वनाथन भी ऐसी ही एक मिसाल हैं.

रूसी नागरिकता मिलनी बहुत जटिल

करीब दो दशक पहले रूस में पढ़ाई करने आए कासी के आज पांच बड़े रेस्टोरेंट हैं जो मॉस्को से लेकर सेंत पीटसबर्ग तक फैले हुए हैं.

कासी के मुताबिक़, "रूस में भारतीय वैसे तो बहुत कम हैं लेकिन काफ़ी एकजुट हो कर रहते हैं. मेरे अपने रेस्टोरेंट बिज़नेस में बहुत से रूसी भी काम करते हैं. साथ ही हम लोगों का एक कोटा होता है जिसके तहत हम हर साल भारत से काम करने वालों को वीज़ा दिलवा कर यहाँ लाते हैं."

लेकिन रूस में इस तरह की मिसालें ज़्यादा नहीं मिलतीं. सच्चाई यही है कि मौजूदा रूस में भारतीय मूल के करीब 14,000 लोग ही रह रहे हैं.

इसमें से अगर लगभग 5,000 छात्रों की संख्या घटा दी जाए तो आंकड़े बेहद कम हो जाते हैं.

वैसे रूस में रहने वाले तमाम भारतीय लोगों में से बहुतों के विवाह भी रूसी नागरिकों से हुए हैं जिसके चलते उन्हें यहाँ की नागरिकता आसानी से मिल सकी, वरना रूसी नागरिकता मिलना बहुत जटिल है.

रूस में बस चुके एक भारतीय व्यापारी ने मुझसे कहा, "रूस में तक़रीबन पाँच सौ भारतीय व्यापारी अलग-अलग शहरों में रहते हैं जिसमें से कोई दो सौ राजधानी मॉस्को में ही हैं. यक़ीन करिए, इनमे से आधों की पत्नियाँ तो रूसी मूल की ही होंगी."

ज़्यादातर भारतीय रूस में रह कर चाय-कॉफ़ी, दवाओं, अनाज और मसाले, चमड़े का सामान और कपड़ों का व्यापार करते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में हीरे-जवाहरात के व्यापार में भी बढ़ोत्तरी दिखी है लेकिन यूरोप के दूसरे देश जैसे बेल्जियम वगैरह की तुलना में ये बहुत कम है.

"भारत-रूस रिश्ते वो नहीं जो सुना करते थे"

गुजरात के धर्मेंद्र रावल रूस में 1998 में आए थे और कहते हैं दस साल यहाँ रहने के बाद उन्होंने गिनना बंद कर दिया कि रूस में कितने दिन हुए हैं.

फ़ार्मा के व्यापारी धर्मेंद्र ने बताया, "ये सही है कि दूसरे देशों में तुलना में आज भारत-रूस के रिश्ते वे नहीं रहे जो सुनते हुए हम यहाँ पहुंचे थे. लेकिन तमाम चुनौतियों के बावजूद ये देश आगे चल के भारत के लिए एक बड़ी सौगात बन सकता है."

आज की हक़ीक़त यही है दोनों देशों ने अपनी दोस्ती और आपसी सहयोग का दम भरने के अलावा नए दोस्त भी चुन लिए हैं.

पिछले दो दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ी है और देश ने अमरीका और पश्चिमी देशों में दिलचस्पी बढ़ाई है. रूस ने भी यूरोप की तरफ़ हाथ बढ़ाया है. शायद यही वजह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार बेहद कम है.

मिसाल के तौर पर पिछले पांच सालों में भारत-रूस कुल व्यापार छह से सात अरब डॉलर के आस-पास ही रहा है.

अगर अमरीका के साथ भारतीय व्यापार की तुलना करें तो ये चुटकी भर ही कहा जाएगा क्योंकि 2017 में दोनों के बीच का कुल व्यापार क़रीब 67 अरब डॉलर का था.

चीनी कंपनियों ने बना ली है मज़बूत जगह

मॉस्को में पिछले कई दशकों से रहने वाले कुमार वेलांगी आम के व्यापारी हैं. उन्हें भविष्य को लेकर उम्मीद तो है लेकिन एक संशय के साथ.

कुमार ने कहा, "रोडब्लॉक ये है कि बात जब स्थिरता की होती है या समय पर पैसों के भुगतान की होती है तब भारत की कई टॉप कंपनियों रूसी बाज़ार को लेकर थोड़ी असहज रहती हैं. भारतीय कंपनियों को यहाँ आना थोड़ा रिस्की लगता है और ये गैप तभी भरेगा जब भारत की टॉप 100 कंपनियां यहाँ आकर अपने दफ़्तर खोलेंगी और वो करेंगी जो चीन की कंपनियां पहले से कर रही हैं."

रूस में दस दिन बिताने पर कम से कम मुझे तो यही समझ में आया कि चीन की कंपनियों ने यहाँ अपनी एक मज़बूत जगह बना ली है.

अगर इस लिहाज़ से देखें तो मॉस्को या किसी दूसरे बड़े रूसी शहर में भारतीय कंपिनयों या बिज़नेस वगैरह की छाप नहीं दिखती

भारत-रूस के संबंध सांस्कृतिक ज़्यादा

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच तमाम नए समझौतों पर सहमति बनी है.

रूस ने शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय दावेदारी का समर्थन भी किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस की औपचारिक यात्राओं और अनौपचारिक यात्राओं में इस बात पर ज़ोर दिया है कि 'दोनों देश दोस्ती की एक नई मिसाल कायम करेंगे'.

आर्थिक सहयोग की बातें भी हुई हैं और शस्त्रों की खरीदारी को लेकर नए समझौते भी.

लेकिन ये कह पाना अभी भी मुश्किल है कि क्या दोनों देशों के रिश्ते वैसे ही घने हो सकेंगे जैसे शीत-युद्ध के दौरान हुआ करते थे.

मॉस्को में वरिष्ठ रूसी पत्रकार आंद्रेई ने बेहद छोटी लेकिन अहम बात कही.

"भारत-रूस के संबंध सांस्कृतिक ज़्यादा थे और बराबरी के कभी नहीं थे. इसलिए जैसे भी हैं, काफ़ी बेहतर हैं."

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