असमः क्या बीजेपी से नाता तोड़ेगी असम गण परिषद

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

असम की सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) पिछले कुछ दिनों से सत्ताधारी बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ने की बात कह रही है लेकिन अब तक वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है.

बीते कुछ सप्ताह से समूचे असम में नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को लेकर कई जातीय संगठन केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

ऐसे में एक क्षेत्रीय पार्टी होने के नाते एजीपी सार्वजनिक तौर पर बीजेपी सरकार के इस कदम का विरोध तो जरूर कर रही है लेकिन वो अपनी 'राजनीतिक मजबूरियों' के कारण अब तक सरकार से अलग नहीं हो सकी है.

एजीपी के गठबंधन तोड़ने वाले बयान पर बीजेपी का कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक का विषय उनकी पार्टी के विज़न डॉक्यूमेंट में साल 2016 के विधानसभा चुनाव के पहले से ही शामिल था.

उनका कहना है कि बांग्लादेश से ही नहीं बल्कि अन्य पड़ोसी देशों से भी आने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने पर पार्टी का रुख स्पष्ट रूप से बताया गया था और एजीपी गठबंधन के दौरान इन बातों से पूरी तरह अवगत थी.

'बयान बदल जाते हैं'

असम की सर्बानंद सोनोवाल सरकार में मंत्री तथा एजीपी के अध्यक्ष अतुल बोरा का कहना है, "बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता प्रदान करने से 1985 में हुए असम समझौते को कमज़ोर करना होगा, जिस पर अवैध आप्रवासियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने के विशिष्ट उद्देश्य से हस्ताक्षर किए गए थे. हम नागरिकता अधिनियम में संशोधन करने के कदम का पुरज़ोर विरोध करेंगे."

एजीपी नेता के इस बयान में और उनके विरोध जताने के तरीके में कितना दम है, इस पर राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर अखिल रंजन दत्ता ने बीबीसी से कहा, "एजीपी अगर सरकार में रहकर इस बिल के ख़िलाफ़ विरोध करती है तो उसका कोई मतलब ही नहीं है. पार्टी के नेता सार्वजनिक रूप से जो बयान देते हैं वो नई दिल्ली में केंद्रीय नेताओं के सामने बदल जाते हैं."

"दरअसल, एजीपी पार्टी में भी इस मुद्दे को लेकर अंतर्विरोध हैं. ऐसे कुछ नेता हैं जो बीजेपी के साथ अब रहना नहीं चाहते. लेकिन, वहीं पार्टी अध्यक्ष जो सरकार में मंत्री भी हैं, वो कहते हैं कि अगर नागरिकता संशोधन विधेयक पास हुआ तो वे बीजेपी के साथ अपना गठबंधन तोड़ लेंगे. इसका क्या मतलब है? अगर एजीपी को विरोध करना है तो उसे गठबंधन से बाहर आना चाहिए."

'फायदा उठा सकती थी असम गण परिषद'

इस मामले में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान विभाग में प्रोफेसर डॉक्टर अखिल रंजन दत्ता कहते हैं, "एजीपी का जन्म ही असम आंदोलन से हुआ है और उस आंदोलन से असम समझौता हासिल हुआ था. बीजेपी सरकार असम समझौते को नहीं मानती. ऐसे में एजीपी की सरकार में कोई अहमियत ही नहीं बचती."

वे कहते हैं, "एजीपी के लिए अच्छा यही रहेगा कि वो बीजेपी सरकार के गठबंधन से जल्दी बाहर आ जाए. लेकिन पार्टी में अंतर्विरोध के कारण वो कोई फ़ैसला नहीं ले पा रही है."

असम की क्षेत्रीय राजनीति में एजीपी के भविष्य पर डॉक्टर दत्ता कहते हैं, "कांग्रेस के बाद राज्य में लोग जिस राजनीतिक विकल्प के बारे में सोच रहे थे, एजीपी उसका फायदा नहीं उठा सकी और बीजेपी के साथ चली गई. बीजेपी के साथ एजीपी का कोई भविष्य नहीं है."

वे कहते हैं, "यह एक अच्छा मौका था, एजीपी को सरकार से बाहर आकर इस पूरे मुद्दे पर एक ठोस कदम उठाने की आवश्कता थी. क्योंकि मुख्यमंत्री सोनोवाल से लेकर एजीपी के कई बड़े नेता पहले ही बीजेपी में जा चुके हैं. पार्टी को अब संभलने की जरूरत है और उसका समर्थन तभी बचेगा जब वो यहां के मूल लोगों की समस्या के साथ मज़बूती से खड़ी होगी."

'छात्र नेताओं की आवाज़ में वो दम नहीं रहा'

साल 1979 से 1985 के बीच हुए असम आंदोलन ने समूचे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा था.

इस ज़बर्दस्त आंदोलन को सफल करने के लिए असमिया जाति के कई लोगों ने अपनी जान खोई. इस दौरान 855 आंदोलनकारी मारे गए.

आज़ादी के बाद असम के इतिहास में इससे बड़ा आंदोलन कभी नहीं हुआ. असमिया जाति की भावनाओं से जुड़ा असम आंदोलन दरअसल घुसपैठियों के ख़िलाफ़ था.

असम में अवैध तरीके से दाख़िल हुए ख़ासकर बांग्लादेशी लोगों को बाहर निकालने के लिए समूची असमिया जाति ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था.

एक बार फिर केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के ख़िलाफ़ असम के जातीय संगठन एकजुट होकर उसी तरह का विरोध कर रहे हैं.

अंतर सिर्फ इतना है कि असम आंदोलन ने जिन छात्र नेताओं को राजनीति के शिखर पर पहुंचाया आज उनकी आवाज़ में वो दम नहीं दिखता.

'असम गण परिषद के पास भी है मौका'

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ गोस्वामी कहते हैं, "एजीपी अगर सरकार से बाहर आ जाती तो नागरिकता संशोधन विधेयक के इस मुद्दे पर बीजेपी पर दबाव बना सकती थी. लेकिन, उसके कुछ नेता अपने फायदे के लिए सरकार में डटे हुए हैं."

"सामने लोकसभा चुनाव है और एजीपी के पास यह एक अच्छा मौका था क्योंकि बीजेपी लोकसभा चुनाव में असम से 10 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है और ऐसे में उसे एजीपी को साथ रखना होगा. लेकिन, एजीपी ने एक तरह से मौका गंवा दिया."

गोस्वामी कहते हैं, "राज्य में दो बार शासन कर चुकी एजीपी एक मजबूत क्षेत्रीय पार्टी है और हम यह नहीं कह सकते कि उसका आगे भविष्य नहीं है. पिछले चुनाव में जिन लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था वो अब नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर उनसे नाराज़ हैं. कांग्रेस की भी स्थिति ठीक नहीं है, ऐसे में एजीपी ही एक विकल्प बन सकती है."

"लेकिन उसके नेताओं को समय पर फैसला करना चाहिए था. एजीपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुसलमान मतदाता का भी अब पार्टी की तरफ सकारात्मक झुकाव दिख रहा है. लेकिन, एजीपी के नेता दो कैंपों में विभाजित हो गए हैं. इसकी वजह से पार्टी कोई निर्णय नहीं ले पा रही है."

असम में कांग्रेस द्वारा वैकल्पिक सरकार के गठन पर बैकुंठ गोस्वामी कहते हैं, "असम में वैकल्पिक सरकार की बात हो रही है लेकिन यहां यह सफल नहीं हो सकती. बीजेपी के पास खुद के 61 विधायक हैं और सरकार बनाने के लिए संख्या भी चाहिए. जबकि सभी को इकट्ठा करने के लिए एक कॉमन पॉइंट होना ज़रूरी है. यह मुझे संभव नहीं लगता."

नागरिकता संशोधन विधेयक पर बोडो-कार्बी जनजाति के नेता खुलकर विरोध नहीं कर रहे हैं. इस पर गोस्वामी कहते हैं, "बोडो - कार्बी नेता इस बिल का सीधा विरोध नहीं करेंगे क्योंकि उनकी यह नीति है कि जो भी सरकार दिल्ली और राज्य की सत्ता में रहेगी वो उनका साथ देंगे. वहां से उन्हें फंड मिलेगा."

"बोडो और कार्बी इलाके में स्वायत्तशासी परिषद को चलाने वाले लोग राज्य के ताकतवर मंत्री डॉक्टर हिमंत विश्व शर्मा के साथ हैं. सरकार में एकमात्र हिमंत ही हैं जो सीधे तौर पर इस बिल का समर्थन कर रहे हैं. वह बोलते रहते हैं कि अगर यह बिल पास नहीं हुआ तो असम में मुसलमान मुख्यमंत्री बन जाएगा."

असम में एक तरफ तो बांग्लादेशी घुसपैठियों की शिनाख़्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अपडेट करने का काम चल रहा है, वहीं राज्य की बीजेपी सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को पास करवाना चाहती है.

अगर ऐसा होता है तो राष्ट्रीय नागरिक पंजी को अपडेट करने का कोई मतलब ही नहीं रहेगा.

अपडेट की जा रही राष्ट्रीय नागरिक पंजी में 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए सभी बांग्लादेशी नागरिकों को यहां से वापस भेजा जाएगा, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.

लेकिन, अगर केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को पास करवा लेती है तो इस बिल के तहत सैकड़ों की तादाद में खासकर हिंदू बांग्लादेशियों के यहां आने का रास्ता साफ हो जाएगा.

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