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एक दशक से अटल बिहारी वाजपेयी का एकांतवास
- Author, सिद्धनाथ गानू
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
13 मई 2004. अटल बिहारी वाजपेयी अपनी कैबिनेट की आख़िरी बैठक ख़त्म कर राष्ट्रपति भवन के लिए चल दिए थे.
एनडीए चुनाव हार चुका था. पास ही में कांग्रेस के दफ़्तर में पार्टी के कार्यकर्ता जश्न मना रहे थे. कांग्रेस अगले प्रधानमंत्री के रूप में सोनिया गांधी की ताजपोशी को लेकर उत्साहित थे.
इस्तीफ़ा देने के बाद वाजपेयी ने टीवी पर दिए भाषण में कहा, "मेरी पार्टी और गठबंधन हार गया, लेकिन भारत की जीत हुई है."
वाजपेयी को अगला विपक्ष का नेता बनना था, सुषमा स्वराज ने कैबिनेट की बैठक के बाद इस बाबत घोषणा भी की थी, लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि वाजपेयी राजनीति छोड़ने की ओर बढ़ रहे हैं.
जिसने देश को अपने भाषणों से मोह लिया था वो अब संन्यास लेने को तैयार था.
भाषण देने की कला के माहिर, कवि और एक बड़े राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी पिछले 14 सालों से बीमार हैं. सोनिया गांधी ने महमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया और लोकसभा में लाल कृष्ण आडवाणी ने विपक्ष के नेता की ज़िम्मेदारी संभाली.
वाजपेयी धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से ग़ायब हो रहे थे. हालांकि, सुषमा स्वराज ने कहा था कि बीजेपी के कद्दावर नेता वाजपेयी सार्वजनिक जीवन से रिटायर नहीं होंगे, लेकिन इसे लेकर राय अलग-अलग थी.
2005 में मुंबई के शिवाजी पार्क में भाजपा की रजत जयंती समारोह के दौरान एक रैली को संबोधित करते हुए वाजपेयी ने घोषणा की कि वो चुनावी राजनीति से रिटायर होंगे.
वाजपेयी ने इस रैली में सबसे छोटा भाषण दिया था. उन्होंने पार्टी में आडवाणी और प्रमोद महाजन को राम-लक्ष्मण की जोड़ी क़रार दिया था.
वाजपेयी उस वक़्त भी लखनऊ से सांसद थे. हालांकि ख़राब तबीयत की वजह से वो लोकसभा में नियमित रूप से शामिल नहीं हो पा रहे थे.
उन्होंने 2007 के उपराष्ट्रपति चुनाव में वोट दिया था. अटल व्हील चेयर पर वोट देने पहुंचे थे और उनकी इस तस्वीर को देखकर प्रशंसकों को भारी निराशा हुई थी.
वाजपेयी 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार करेंगे या नहीं, इस पर भी बहुत सी अटकलें थीं. आख़िर में वो लखनऊ में एक चुनावी रैली में शामिल हुए.
आरएसएस के मुखपत्र पाञ्चजन्य ने बताया था कि वाजपेयी ने पहले ही राजनीति से संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की थी. वो उस साल वोट नहीं डाल सके.
2007 में वाजपेयी ने नागपुर के रेशिमबाग में आरएसएस एक कार्यक्रम में भाग लिया.
बीबीसी मराठी के रोहन नामजोशी याद करते हैं, "भारी भीड़ जुटी थी. व्हील चेयर से चलने वाले वाजपेयी को मंच पर लाने की ख़ास लिफ़्ट की व्यवस्था की गई थी. जब वो मंच पर पहुंचे तो लोग जबर्दस्त रूप से उत्साहित हो गए. मैंने देखा कि कई लोग अपने पैरों से चप्पल उतार कर उन्हें प्रणाम कर रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे वो देवी-देवताओं को करते हैं."
2009 में उन्होंने एक सांसद के रूप में अपना अंतिम कार्यकाल पूरा किया और फिर कभी चुनाव नहीं लड़े.
वाजपेयी की बीमारी क्या है?
2000 में प्रधानमंत्री रहते हुए मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उनके दाहिने घुटने की सर्जरी हुई थी. इससे 2004 के बाद उनका घूमना फिरना सीमित हो गया.
लंबे समय से उनके दोस्त रहे एनएम घाटे कहते हैं, "2009 में वाजपेयी को स्ट्रोक पड़ा था, जिसके बाद से वो ठीक से बात नहीं कर सकते."
उन्हें एम्स में भर्ती किया गया जहां वो वेंटिलेटर पर रखे गए.
हमेशा इस पर अटकलें लगती हैं कि वाजपेयी अल्जाइमर या डिमेंशिया से पीड़ित हैं. हालांकि कोई इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहता है. 15 सालों से वाजपेयी का इलाज कर रहे डॉक्टर रणदीप गुलरिया ने भी वाजपेयी की डिमेंशिया की रिपोर्टों से इनकार किया था.
वाजपेयी को मीठा खाने का भी बहुत शौक है, लेकिन मधुमेह, गुर्दे की समस्या और मूत्रमार्ग के संक्रमण की वजह से इन व्यंजनों को उन्हें केवल ख़ास मौकों पर ही परोसा जाता है और वो भी बहुत कम मात्रा में.
जब लोगों ने भारत रत्न वाजपेयी को देखा
मार्च 2015 में वाजपेयी को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों दिल्ली स्थित उनके घर पर भारत रत्न से सम्मानित किया गया.
लोगों को एक बार फिर व्हीलचेयर पर बैठे, बीमार वाजपेयी की एक झलक मिली. लेकिन ये तस्वीर भी कुछ इस तरह से खींची गई कि इसमें उनका पूरा चेहरा नहीं दिखा.
वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की लंबे समय से मांग उठ रही थी. कई लोगों ने टिप्पणी की कि यह सम्मान उन्हें तब दिया जाना चाहिए था जब उनकी सेहत ठीक थी.
वाजपेयी कहां हैं?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वाजपेयी सालों से कृष्ण मेनन मार्ग स्थित आवास में अपनी दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य के साथ रहते हैं. 2014 में निधन से पहले तक श्रीमती राजकुमारी कौल भी यहीं रहती थीं.
कुछ नेता हर साल 25 दिसंबर को उनके जन्मदिन पर मिलने जाते हैं. इनमें एक नाम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भी है.
एनएम घाटते ने एक दिलचस्प घटना का ज़िक्र किया है, "1991 में नरसिम्हा राव ने वाजपेयी को फ़ोन किया और कहा कि आपने बजट की इतनी कठोर आलोचना की है कि मेरे वित्त मंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह इस्तीफ़ा देना चाहते हैं. यह सुनकर वाजपेयी जी ने डॉक्टर मनमोहन सिंह को बुलाया और कहा कि आलोचना को व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह एक राजनीतिक भाषण था. उस दिन से ही दोनों के बीच एक ख़ास संबंध बन गया."
नियमित रूप से उनसे मिलने आने वालों में उनके डॉक्टर, उनके दोस्त और सुप्रीम कोर्ट के वकील एनएम घाटते, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी और लंबे समय तक उनके सहयोगी रहे लाल कृष्ण आडवाणी हैं.
आडवाणी वाजपेयी की जोड़ी को बीजेपी की राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहा जाता था.
इस जोड़ी के लक्ष्मण यानी आडवाणी बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल में हैं जबकि राम यानी वाजपेयी एकांतवास में चले गए.
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