विवेचनाः आख़िर क्या है सुब्रमणियन स्वामी और वाजपेयी की तल्ख़ी का राज़

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ऐसा बहुत कम ही होता है कि बीबीसी किसी शख़्स की आत्मकथा लिखने का कारण बने, लेकिन मशहूर वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमणियन स्वामी की पत्नी रौक्शना स्वामी के साथ ऐसा ही हुआ.

उन्होंने इसका ज़िक्र अपनी किताब "इवॉल्विंग विद सुब्रमणियन स्वामीः अ रोलर कोस्टर राइड" में तो किया ही है, पिछले दिनों जब वो बीबीसी स्टूडियो आईं तो उन्होंने इस पर विस्तार से चर्चा की.

रौक्शना ने बताया, "दो साल पहले बीबीसी ने मुझे फ़ोन कर इमरजेंसी के दौरान मेरे जीवन पर इंटरव्यू करने की पेशकश की थी. शुरू में मैंने मना कर दिया. लेकिन जब बीबीसी ने ज़ोर दिया तो मैं इस शर्त पर इंटरव्यू देने के लिए राज़ी हो गई कि इमरजेंसी के दौरान मेरी अटल बिहारी वाजपेई से हुई मुलाकात की कहानी प्रसारित की जाएगी."

उन्होंने कहा, "लेकिन बीबीसी ने उस वादे को पूरा नहीं किया. वो शायद अपने श्रोताओं को पूर्व प्रधानमंत्री का अच्छा रूप ही दिखाना चाहते थे. मुझे तभी विचार आया कि अगर मुझे उस कहानी को लोगों के सामने रखनी है, तो मुझे अपनी किताब खुद लिखनी होगी. उसी का नतीजा है ये किताब."

इत्तेफ़ाक से बीबीसी की ओर से उन दिनों रौक्शना से संपर्क करने वाला शख़्स मैं ही था. अब आप कहेंगे कि मैंने ऐसा क्यों किया.

पहले तो ये कि वो कहानी इंमरजेंसी के दौरान सुब्रमणियन स्वामी के अंडरग्राउंड होने की कहानी थी और उस समय रौक्शना जिसे ज़ोर दे कर कह रही थीं, वो मुख्य कहानी का एक छोटा हिस्सा भर था और दूसरे बीबीसी के पास हमेशा समय की कमी की दिक्कत तो होती ही है.

बहरहाल अब मौका भी है और दस्तूर भी. रौक्शना स्वामी वो कहानी बताएंगी जिसको दो साल पहले सुब्रमणियन स्वामी पर की गई विवेचना में जगह नहीं मिल पाई थी.... लेकिन उस पर थोड़ी देर बाद...

प्रोफ़ेसर सेमुअलसन के कैल्कुलेशन को सही किया

सुब्रमणियन स्वामी की तरफ़ लोगों का ध्यान पहली बार तब गया जब उन्होंने हारवर्ड विश्वविद्यालय में जाने माने प्रोफ़ेसर पॉल सेमुअलसन को, जो कि ब्लैक बोर्ड पर गणित का एक कैल्कुलेशन कर रहे थे, बताया कि वो ग़लत हैं.

रौक्शना बताती हैं, "स्वामी मुझसे कहते थे कि जब हम भारत में गणित सीखते हैं, तो बहुत गहराई से सीखते हैं. फ़ार्मूले वगैरह तो हम एक तरह से रट जाते हैं. अमरीकी लोग विश्लेषण अधिक करते हैं और फ़ार्मूलों को अपनी याददाश्त में रखने की ज़रूरत नहीं समझते.

जब सेमुअलसन ने वो फ़ार्मूला बोर्ड पर लिखा तो स्वामी ने उनकी ग़लती तुरंत पकड़ ली और उन्हें बताया कि अगर जो उन्होंने लिखा है, वो सही है तो उसका उत्तर दूसरा निकलेगा.

पूरी क्लास को थोड़ा अजीब सा लगा कि पहले वर्ष का छात्र दुनिया के नामी गिरामी प्रोफ़ेसर के फ़ार्मूले में ग़लती निकाल रहा है.

लेकिन प्रोफ़ेसर को अपनी ग़लती का अहसास हो गया. उन्होंने अपने को सही किया और स्वामी का धन्यवाद दिया. उसके बाद से उनकी स्वामी से दोस्ती हो गई जो 2009 में उनकी मृत्यु तक ताउम्र चली."

रविशंकर बने मुलाकात का कारण

रौक्शना की स्वामी से मुलाक़ात, अमरीका में उसी पढ़ाई के दौरान हुई. अपनी किताब में तो उन्होंने उसका ज़िक्र नहीं किया है, लेकिन हमारे बहुत इसरार पर उन्होंने उन ख़ास पलों को याद किया जब उनकी स्वामी से पहली मुलाकात हुई थी.

रौक्शना याद करती हैं, "उन दिनों डाक्टर स्वामी 'ग्रेटर बॉस्टन इंडियन एसोसिएशन' के सदस्य हुआ करते थे. एक बार उन्होंने पंडित रवि शंकर का संगीत सम्मेलन आयोजित किया था और स्वामी उसके लिए कैंटीन में बैठे टिकट बेच रहे थे."

उन्होंने कहा, "जब वो मुझे साड़ी पहने अंदर आते देखा तो उन्होंने मुझे रोक कर कहा कि आप ये टिकट ज़रूर ख़रीदिए. मेरी पृष्ठभूमि ऐसी थी कि मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानती थी. मुझे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की थोड़ी बहुत समझ ज़रूर थी. मैंने उनसे ये कहते हुए माफ़ी मांगी कि मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए हार्वर्ड नहीं आई हूँ. हाँ पश्चिमी संगीत होता तो मैं ज़रूर सोचती."

रौक्शना ने बताया, "फिर स्वामी ने अपने पैसे से मेरे लिए न सिर्फ़ रविशंकर के कॉनसर्ट का टिकट ख़रीदा बल्कि बॉस्टन सिंफ़नी ऑर्केस्ट्रा के एक परफ़ार्मेंस का टिकट भी खरीदा. यहाँ आपको ये बता दें ये टिकट बहुत महंगे होते हैं. इस तरह स्वामी से मेरी पहली मुलाकात हुई."

अमरीका में सिविल मैरेज

रौक्शना ने सुब्रमणियन स्वामी से अमरीका में ही विवाह किया. उनकी सिविल मैरेज हुई, क्योंकि रौक्शना पारसी हैं और उनकी माँ नहीं चाहती थीं कि उनका हिंदू रीति रिवाज़ से विवाह हो.

पढ़ाई के बाद ये दोनों भारत लौटे और स्वामी आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे. उन्होंने राजनीति में भी कदम बढ़ाया और वो भारतीय जनसंघ के उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हो गए. 1975 में जब इंमरजेंसी लगी तो सुब्रमणियन स्वामी भूमिगत हो गए.

उन्होंने नानाजी देशमुख के साथ मिल कर महीनों तक तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ अंडरग्राउंड गतिविधियों का संचालन किया.

सुब्रमणियन स्वामी याद करते हैं, "नानाजी ड्राइवर नहीं रख सकते थे, क्योंकि उससे हमेशा ये डर बना रहता था कि कहीं वो उनकी जानकारी सरकार को न दे दे. तो मैं उनका ड्राइवर बन गया. एक दिन नानाजी ने मुझे किसी काम से भेजा, लेकिन इस बीच वो खुद पकड़ लिए गए."

नरेंद्र मोदी ने भूमिगत स्वामी को मदद दी

भूमिगत रहते हुए ही स्वामी ने पगड़ी और कड़ा पहन कर एक सिख का वेश धारण कर लिया ताकि पुलिस उन्हें पहचान न सके. उनका अधिकतर समय गुजरात और तमिलनाडु में बीता, क्योंकि वहाँ कांग्रेस का शासन नहीं था.

स्वामी बताते हैं, "मुझसे कहा गया कि मुझे मणिनगर रेलवे स्टेशन पर उतरना है. वहाँ मुझे रिसीव करने के लिए आरएसएस का एक प्रचारक आएगा. वो आए और मुझे गाड़ी पर गुजरात के एक मंत्री मकरंद देसाई के घर ले गए."

अक्सर वो तीनों मोटर साइकिल पर बैठ कर अहमदाबाद की मशहूर फ़्रूट आइस क्रीम खाने जाते थे. चालीस साल बाद आरएसएस का वो स्वयंसेवक भारत का प्रधानमंत्री बना.

बैंकॉक का टिकट ले दिल्ली में उतरे

कुछ दिनों बाद इमरजेंसी के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए स्वामी को अमरीका भेजा गया. उन दिनों, बल्कि आज भी ये क़ानून है कि अगर कोई सांसद बिना अनुमति के छह महीने से अधिक समय तक अनुपस्थित रहता है तो उसकी सदस्यता जाती रहती है. इसलिए स्वामी ने भारत वापस लौटने का फ़ैसला किया.

स्वामी बताते हैं, "मैंने पैन-एम की फ़्लाइट से लंदन-बैंकॉक का हॉपिंग टिकट ख़रीदा. चूंकि मैं बैंकॉक जा रहा था, इसलिए दिल्ली उतरने वाले लोगों की सूची में मेरा नाम नहीं था. फ़्लाइट सुबह तीन बजे दिल्ली पहुंची. मेरे पास एक बैग के सिवा कोई सामान नहीं था. उस ज़माने में हवाई अड्डों पर इतनी कड़ी सुरक्षा नहीं होती थी. मैंने ऊंघते हुए सुरक्षा गार्ड को अपना राज्यसभा का परिचय पत्र फ़्लैश किया. उसने मुझे सेल्यूट किया और मैं बाहर आ गया. वहाँ से मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधे राजदूत होटल पहुंचा."

मकैनिक का वेष बदल अपने घर पहुंचे

स्वामी आगे बताते हैं, "वहाँ से मैंने अपनी पत्नी को एक अंग्रेज़ की आवाज़ बनाते हुए फ़ोन किया कि आपकी मौसी ने इंग्लैंड से आपके लिए एक तोहफ़ा भेजा है. इसलिए उसे लेने के लिए एक बड़ा बैग ले कर आइए. पहले से तय इस कोड का मतलब था कि वो उनके लिए सरदार की एक पगड़ी, नकली दाढ़ी और एक शर्ट पैंट लेकर पहुंच जाएं."

उन्होंने कहा, "मेरी पत्नी रौक्शना ने ऐसा ही किया. मैंने उससे कहा कि मैं शाम को एक टेलीविज़न मकैनिक का वेश बना कर घर पर आऊंगा. शाम को मैंने अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटा कर कहा कि मैं आपका टेलीविज़न ठीक करने आया हूँ. जब मैं अपने घर में घुसा तो फिर पांच दिनों तक वहाँ से बाहर ही नहीं निकला. बाहर तैनात पुलिस को पता ही नहीं चला कि मैं अपने घर पहुंच चुका हूं."

राज्यसभा में लगाई हाज़िरी

10 अगस्त, 1976 को स्वामी ने तय किया कि वो संसद भवन जाएंगे और राज्यसभा के उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त करेंगे. रौक्शना ने स्वामी को अपनी फ़िएट कार से संसद के गेट नंबर चार पर छोड़ा और चर्च ऑफ़ रेडेंप्शन के पास अपनी गाड़ी पार्क की.

स्वामी बिना किसा रोकटोक के संसद में घुसे. उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त किए. तभी कम्युनिस्ट सांसद इंद्रजीत गुप्त उनसे टकरा गए. उन्होंने पूछा तुम यहाँ क्या कर रहे हो? स्वामी ज़ोर से हंसे और उनका हाथ पकड़े हुए राज्यसभा में घुसे.

इससे पहले रौक्शना ने ऑस्ट्रेलिया ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के संवाददाता को पहले से बता दिया था कि वो संसद में एक दिलचस्प घटना देखने के लिए मौजूद रहें. स्वामी की टाइमिंग परफ़ेक्ट थी. उस समय राज्यसभा में दिवंगत हुए सांसदों के शोक प्रस्ताव पढ़े जा रहे थे.

जैसे ही सभापति और उप राष्ट्रपति बासप्पा दानप्पा जत्ती ने अंतिम शोक प्रस्ताव पढ़ा, स्वामी तमक कर उठ खड़े हुए. उन्होंने चिल्लाकर कहा, "प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर सर.... आपने दिवंगत लोगों में भारत के जनतंत्र को शामिल नहीं किया है.." पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया.

गृहराज्य मंत्री घबरा कर मेज़ के नीचे छिपने की कोशिश करने लगे. उन्हें डर था कि स्वामी के हाथ में बम तो नहीं है. हतप्रभ जत्ती ने स्वामी को गिरफ़्तार करने का आदेश देने की बजाए सांसदों को दिवंगत सांसदों के सम्मान में खड़े होकर दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा.

'बुक पब्लिश्ड'

इस अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाते हुए स्वामी चिल्लाए कि वो वॉक आउट कर रहे हैं. वो तेज़ कदमों से संसद भवन के बाहर आए और चर्च के पास पहुंचे जहाँ रौक्शना ने पहले से कार पार्क कर चाबी कार्पेट के नीचे रख दी थी. वहाँ से वो कार चलाकर बिड़ला मंदिर गए, जहां उन्होंने कपड़े बदलकर सफेद कमीज़-पैंट पहनी और अपने सिर पर गांधी टोपी लगाई.

बिड़ला मंदिर से वो ऑटो से स्टेशन पहुंचे और आगरा जाने वाली गाड़ी में बैठ गए. वो मथुरा में ही उतर गए और नज़दीक के टेलीग्राफ़ ऑफ़िस से उन्होंने रौक्शना को तार भेजा, 'बुक पब्लिश्ड.' यह पहले से तय कोड था जिसका अर्थ था कि वो सुरक्षित दिल्ली से बाहर निकल गए हैं.

वाजपेयी ने मदद करने से इंकार किया

इस बीच जैसे ही सरकार को पता चला कि स्वामी बच निकले हैं, उन्हें राज्यसभा की सदस्यता से बर्ख़ास्त कर दिया गया. रौक्शना स्वामी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. उनके घर की तलाशी ली गई. उनकी दो कारें और सारा सामान ज़ब्त कर लिया गया.

रौक्शना बताती हैं कि नौबत यहाँ तक आई कि जब वो अपनी क़ानून की पढ़ाई करने के लिए बस से दिल्ली विश्वविद्यालय जाती थीं, तो दिल्ली पुलिस की गाड़ी उस बस तक का पीछा करती थी. रौक्शना मदद के लिए उस समय भारतीय जनसंघ के बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी के पास गईं, लेकिन वहाँ से उन्हें निराश लौटना पड़ा.

रौक्शना याद करती हैं, "हमें लगा कि राज्यसभा से स्वामी की बर्ख़ास्तगी नाजायज़ है. इसलिए हम रिट पेटीशन फ़ाइल करना चाहते थे. जब हम जनसंघ का क़ानूनी काम देख रहे अप्पा घटाटे के पास गए तो उन्होंने कहा कि वाजपेयी ने उनसे कहा है कि इस मामले को बिल्कुल छूना मत, क्योंकि डॉक्टर स्वामी से हमारी पार्टी का कोई संबंध नहीं है."

रौक्शना ने कहती हैं, "मैं वाजपेयी के पास गई. उस समय वो फ़िरोज़ शाह रोड वाले मकान में रहा करते थे और उनकी फ़ौस्टर फ़ैमिली भी उनके साथ रहती थी. जब मैंने वाजपेयी से घटाटे को दी गई सलाह का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि स्वामी ने जो ग़लत काम किए हैं, उससे जनसंघ की बहुत बदनामी हुई है."

उन्होंने आगे कहा, "मैंने जब उनसे विस्तार से बताने के लिए कहा तो उन्होंने बताया कि उनपर तो भ्रष्टाचार के आरोप हैं. उन्होंने संसद से ग़लत टीए डीए क्लेम किया है जबकि वो उस दौरान संसद गए ही नहीं. डॉक्टर स्वामी 25 जून के बाद तो संसद गए ही नहीं."

रौक्शना ने आगे बताया, "जब स्वामी बैंगलोर से आए थे तो उनका संसद जाने का इरादा था. इसलिए उन्होंने पहले ही टीए डीए क्लेम कर लिया था. दरअसल वो फ़ार्म मैंने ही भरा था जिसपर स्वामी ने अपने हस्ताक्षर किए थे. बाद में उनका इरादा बदल गया. इसलिए उनपर झूठे आरोप लगाए गए कि उन्होंने ग़लत टीए डीए क्लेम किया है. मुझे ये बात बहुत ख़राब लगी. लेकिन मुझे साफ़ लग गया कि वाजपेयी स्वामी के लिए कुछ नहीं करना चाह रहे थे. ये तो सिर्फ़ एक बहाना था."

देशमुख और दत्तोपंत भी नापसंद थे वाजपेयी को

मैंने रौक्शना से पूछा कि स्वामी और वाजपेयी के बीच ऐसा क्या था कि उनके बीच कभी बनी नहीं.

रौक्शना का जवाब था, "वाजपेयी शुरू से ही जलनख़ोर शख़्स थे. वो किसी भी दूसरे शख़्स को ऊपर नहीं आने देते थे. सिर्फ़ स्वामी ही नहीं ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें वाजपेयी ने दबा कर रखा था. यहाँ तक कि जब बीजेपी बन गई तो वाजपेयी ने आरएसएस के सामने शर्त रखी कि इन इन लोगों को बीजेपी के संगठन में कोई जगह नहीं दी जाए."

उन्होंने कहा, "इनमें सबसे ऊपर नाम था नानाजी देशमुख का. देशमुख ने जनसंघ के लिए जितना काम किया है, उतना कम लोगों ने किया है. वो बहुत काबिल थे और वाजपेयी से ज़्यादा सीनियर थे, लेकिन वो उनके चमचे नहीं थे. इसी लिस्ट में दूसरा नाम था दत्तोपंत ठेंगड़ी का. उन्होंने अपने बल पर भारतीय मज़दूर संघ को बनाया और बढ़ाया था. वाजपेयी ने उनके बारे में भी कहा था कि बीजेपी में उनके लिए जगह नहीं है. नतीजा ये रहा कि इन दोनों को दिल्ली छोड़नी पड़ी और वो छोटे मोटे गांवों में काम करने लगे."

कभी दोस्त तो कभी दुश्मन

वाजपेयी के साथ स्वामी की दुश्मनी इस हद तक गई कि 1998 में जब जयललिता ने वाजपेई सरकार का समर्थन जारी रखने के लिए सुब्रमणियन स्वामी को वित्त मंत्री बनाए जाने की शर्त रखी, तो उन्होंने उसे मानने के बजाए, अपनी सरकार गंवाना ज़्यादा उचित समझा.

स्वामी की राजनीतिक ज़िंदगी में न तो कोई स्थाई दोस्त था और न ही स्थाई दुश्मन.

एक ज़माने में उनके बहुत करीब रहीं जयललिता बाद में उनकी दुश्मन बन गईं और एक ज़माने में उनको गिरफ़्तार करवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने वाली इंदिरा गाँधी के पुत्र राजीव गांधी उनके सबसे नज़दीकी दोस्त बन गए.

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