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पीएम मोदी ने क्यों की असम के डॉ. प्रियांग्षु की तारीफ़
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
"भारत की प्रयोगशालाओं (लैब) में कई तरह की तकनीकें विकसित की जाती है. इन नई तकनीकों के बारे में बड़े-बड़े सेमिनारों में चर्चाएं होती हैं. लेकिन अगर वो तकनीक केवल लैब तक सीमित रहें तो समाज को उसका कोई फ़ायदा नहीं मिल पाता."
ये कहना है नई दिल्ली के ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टेरी) के साथ लंबे समय तक काम कर चुके असम के युवा वैज्ञानिक डॉ. प्रियांग्षु मानव शर्मा का.
दरअसल प्रियांग्षु और उनकी टीम इन दिनों अपने काम और कई तरह की नई तकनीक विकसित करने को लेकर चर्चा में है.
हेमेंद्र दास और डॉ. प्रियांग्षु मानव शर्मा ने साल 2016 में इनोटेक इंटरवेंशंस प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी बनाई और अब वे समाज को फायदा पहुंचाने के लिए नई तकनीक विकसित करने के इरादे से कई क्षेत्रों में काम कर रहें हैं.
अपने कार्यक्षेत्र के तौर पर असम का चयन करने के पीछे इन उद्यमियों का तर्क है कि असम और पूर्वोत्तर राज्यों में संसाधन काफ़ी अधिक हैं.
पिछले बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हेमेंद्र दास और संस्थापक निदेशक डॉ. प्रियांग्षु के काम की प्रशंसा की और उन्हें शुभाकामनाएं दी थीं.
समाज को फ़ायदा पहुँचाने की कोशिश
डॉ. प्रियांग्षु मानव शर्मा ने बीबीसी को बताया, "मैं टेरी में काफ़ी अच्छा काम कर रहा था. वहाँ मैंने बहुत कुछ सीखा. अक्सर लोग अपने प्रदेश से बाहर बड़े शहरों में जाकर कुछ करना चाहते हैं लेकिन मैंने असम में आकर अपना काम शुरू किया. मेरे सहयोगी हेमेंद्र दास के साथ मिलकर मैंने एक टीम बनाई."
"मुझे एक बार तो ऐसा लगा था कि शायद यहाँ काम करने के लिए वो सारी सुविधाएं नहीं मिलेगी. मैंने अपना सेटअप गुवाहाटी आईआईटी में किया. क्योंकि ये लैब देश की कई एडवांस प्रयोगशालाओं के टक्कर की है."
सामाज के लिए नई टेक्नोलॉजी को लैब से ला उसका उपयोग करने के बारे में डॉ. प्रियांगषु कहते हैं, "भारत में तकनीक को कई बनती है लेकिन उसका एक छोटा-सा हिस्सा ही लैब से बाहर आ पाता है. अगर समाज को फ़ायदा पहुंचाना है तो हमें तकनीक को आम लोगों तक लाना ही होगा."
स्टार्ट-अप इंडिया के तहत फ़ंडिंग
उन्होंने बताया, "हम इस समय हम ऑयल इंडिया लिमिटेड के साथ काम कर रहें हैं. यहाँ पर्यावरण संरक्षण बड़ी चुनौती है. जब ज़मीन के अंदर से कच्चा तेल निकाला जाता है, उस समय तेल के साथ भारी मात्रा में पानी भी बाहर निकल आता है. यह पूरी तरह दूषित पानी होता है. इससे पर्यावरण को नुक़सान पहुंचता है."
"असम की ऑयल फ़ील्ड काफ़ी पुरानी है और वैज्ञानिक साहित्य में ऐसा कहा जाता है कि ऑयल फ़ील्ड जितनी पुरानी होगी, पानी उतना ही ज़्यादा बाहर निकलेगा. हम माइक्रोबियल प्रक्रिया के ज़रिए दूषित इस्तेमाल के लायक बनाते हैं."
डॉ. प्रियांगषु का दावा है कि ऑयल इंडिया ने स्टार्ट-अप फ़ंड के तहत ही उनकी इस तकनीक पर निवेश किया है.
अपनी नई तकनीक के बारे में डॉ. प्रियांग्षु कहते हैं कि ज़मीन के नीचे से एक बैरल कच्चा तेल निकालते वक़्त क़रीब 70 से 80 बैरल पानी भी निकलता है. इतनी तादाद में दूषित पानी को वापिस ज़मीन में नहीं डाल सकते. असम भूकंप संभावित ज़ोन में आता है और यहां तो ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकते. इसीलिए हम दूषित इस्तेमाल लायक बनाते हैं जिसके बाद इसका इस्तेमाल खेती में हो सकता."
पिछले साल स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत इंडो-इसराइल सरकार ने एक विशेष इनोवेशन चुनौती का प्रोग्राम आयोजित किया था. उसमें तीन थीम रखी गई थीं.
पहला कृषि, दूसरा जल प्रौद्योगिकी और तीसरी थीम थी डिजिटल स्वास्थ्य. इस प्रोग्राम में डॉ. प्रियांग्षु ने भी हिस्सा लिया था.
इस खुली चुनौती वाले प्रोग्राम में भारत और इसराइल, दोनों देशों के प्रतिभागियों ने भाग लिया था और डॉ. प्रियांग्षु की इनोटेक इंटरवेंशंस इसमें विजेता रही.
विजेता के तौर पर डॉ. प्रियांग्षु को नगद पुरस्कार मिला और एक इसराइली कंपनी के साथ काम करने का मौक़ा भी मिला.
इसराइल के साथ प्रोजेक्ट
डॉ. प्रियांग्षु के अनुसार, वो इसी महीने 16 जून को इसराइल के रवाना होंगे.
हालांकि जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी कंपनी को इस जीत के लिए शुभकामनाएं देने के लिए फ़ोन किया था, उस दिन वो अपनी पत्नी की सेहत ख़राब होने के कारण वीडियो कॉन्फ़्रेंस में शामिल नहीं हो पाये थे.
डॉ. प्रियांग्षु कहते हैं, "असम में योग्य कामगार मिलना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन हमें उम्मीद है कि अब यहां इको-सिस्टम विकसित हो रहा है और लोग वापस लौटेंगे."
डॉ. प्रियांग्षु ने माइक्रोबायोलॉजी में पुणे विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में वो कहते हैं कि, "हम कोशिश कर रहे हैं कि मशरूम में विटामिन-डी की मात्रा को बढ़ाया जा सके."
"भारत में क़रीब 80 फ़ीसदी लोगों में विटामिन-डी की कमी होती है. यह मशरूम पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण होगा."
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