ब्लॉग: बलात्कार का फ़ैसला कौन करेगा, मीडिया या अदालत

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नवंबर 2013 की उस 'काली रात' के 'राज़' खोलने का दावा करता एक टेलीविज़न न्यूज़ चैनल. स्क्रीन पर सीसीटीवी की धुंधली फुटेज और हर सेकेंड का हिसाब रखती घड़ी.

देखने वालों से आग्रह कि ध्यान से समझें कि कौन, कब, किस हाव-भाव के साथ लिफ्ट के अंदर गया और बाहर आया.

किसके कपड़े किस हालत में थे, किसके हाथ कहां थे, ऐसी निजी जानकारियों का बार-बार ज़िक्र. जो सीसीटीवी में दिख रहा है उसके बारे में पीड़िता और अभियुक्त के परस्पर-विरोधी बयानों की बारीक़ पड़ताल.

दो-तीन मिनट लंबी फुटेज को क़रीब दो घंटे तक लगातार दिखाना और फिर जनता से सवाल पूछना कि "किसका बयान सच्चा है?"

क़ानून का मक़सद ख़त्म कर रहे हैं चैनल

गोवा के एक होटल में क़रीब पांच साल पहले, 'तहलका' पत्रिका के एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व संपादक तरुण तेजपाल पर एक लिफ़्ट में अपनी सहयोगी के बलात्कार का आरोप है.

चैनल पर उसी व़क्त की सीसीटीवी फुटेज दिखाई जा रही थी. ये फुटेज सबूत के तौर पर गोवा पुलिस ने अदालत में दाख़िल की है.

मामले की सुनवाई अदालत में बंद कमरे में चल रही है. भारतीय दंड संहिता की धारा 327(2) के मुताबिक बलात्कार के मुक़दमे की सुनवाई खुली अदालत में नहीं, बल्कि सिर्फ़ जज, दोनों पक्षों, गवाह और व़कीलों के बीच होती है.

इसका मक़सद पीड़िता की निजता सुरक्षित रखना है. भारतीय दंड संहिता की धारा 327(3) के तहत अदालत की लिखित सहमति के बिना सुनवाई के बारे में जानकारी सार्वजनिक करना और छापना ग़ैर-क़ानूनी है.

आम जनता, मीडिया और कोई भी लोग जिनका केस से सीधा ताल्लुक नहीं हो, उन्हें सुनवाई के दौरान मौजूद रहने की इजाज़त नहीं होती.

इस क़ानून का उल्लंघन, बंद कमरे की सुनवाई का पूरा मक़सद ही ख़त्म कर देता है. ये अदालत की अवमानना है जो एक दंडनीय अपराध है.

नैतिकता का सवाल

इसके बावजूद ये अहम सबूत टेलीविज़न पर था. साथ ही उसका आकलन और किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए प्रेरित करते सवाल पूछे जा रहे थे.

वो सवाल जो अदालत में उठने चाहिए, जिन पर क़ानून की समझ रखनेवाले व़क़ीलों को जिरह करनी चाहिए, उन पर स्टूडियो में बहस करना ख़तरे से ख़ाली नहीं.

पूर्व मंत्री और सांसद शशि थरूर की पत्नी की मौत भी ऐसा मामला है जहां तहक़ीक़ात अभी जारी है पर उसके सबूतों की बारीक़ पड़ताल टीवी चैनलों की 'अदालतों' में हो रही है.

दिल्ली से सटे नोएडा में साल 2008 में आरुषि तलवार और हेमराज की हत्या के मामले में भी मीडिया ने कई सबूत और गवाहों से बातचीत कर अपने-अपने आकलन पेश किए थे. तब भी मीडिया के सवाल पूछने की आज़ादी और अदालत के बाहर गवाहों और सबूतों की पड़ताल के बीच की लकीर धुंधली हुई थी.

क़ानूनी पहलू से अलग, ये सवाल नैतिकता का भी है.

क्या इस तरह की पड़ताल सही है? क्या ये सुनवाई के निष्पक्ष रहने पर असर नहीं डालेगी? मीडिया का कार्यक्षेत्र क्या है? जिस मामले में सुनवाई जारी है, उसके सबूत की समीक्षा टेलीविज़न पर करना क्या अदालत की मानहानि नहीं है?

प्रसारण का विरोध

जब मामला यौन हिंसा का है तब तो ये ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि पीड़ित महिला के आगे का जीवन भी मुश्किल में पड़ सकता है.

ये सुनकर उस पीड़ित पर क्या गुज़रेगी जब वो टीवी पर ऐसे सवाल सुनेगी कि 'कहीं वो झूठ तो नहीं बोल रही है?' पर उससे भी ज़्यादा उसे ये परेशान करेगा कि उस यौन हमले के पहले और बाद की तस्वीरें दुनिया को दिखाई जाएँ.

उसके चेहरे को चाहे चैनल धुंधला कर दे पर वाक़ये की वो झलक सार्वजनिक हो गई है. प्रसारण के चौबीस घंटे बाद चैनल ने अपने शो की रिकॉर्डिंग सोशल वेबसाइट, यूट्यूब, से हटा दी है.

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उस चैनल से नैतिकता के सवाल भी उठाए हैं. महिला पत्रकारों के समूह, 'नेटवर्क ऑफ़ वुमेन इन मीडिया', ने भी चिट्ठी लिख कर चैनल के प्रसारण को ग़ैर-क़ानूनी बताया है और माफ़ी की मांग की है.

मीडिया का दबाव

ये इस तरह की पहली घटना नहीं है, शायद याद हो आपको साल 2004 में एक और चैनल ने एक गांव में पंचायत बैठाई थी.

गुड़िया नाम की एक औरत के पति जब सरहद पार चले गए और लौटकर नहीं आए तो दोबारा प्यार कर उसने दूसरी शादी कर ली.

फिर अचानक पहले पति के लौटने पर सवाल उठा कि वो किसकी पत्नी है और फ़ैसला कराने के लिए चैनल ने ये अदालत बनाई.

सुनवाई हुई. टेलीविज़न चैनल पर दिखाई गई. गुड़िया से पूछा गया कि वो किसे चुनेंगी और घबराई हुई उस औरत ने अपने पहले पति को चुना पर इसके बाद कई रिपोर्टर उनसे मिले और गुड़िया ने ये ज़ाहिर किया कि उन पर तब बहुत दबाव था और वो सही फ़ैसला नहीं ले पाईं.

वो अदालत आयोजित करने का अधिकार क्या मीडिया को था? और पिछले क़रीब 15 सालों में हालात और बुरे ही हुए हैं.

सवाल पूछने के हक़ की आड़ में आरोप, शक़ और अनुमानों का जाल बुन देना, सच और झूठ को साफ़ करने की जगह उसे और धुंधला कर देना आम हो चुका है, कम शब्दों में कहें तो मीडिया और बीमार हो गया है.

धुंधला वीडियो फुटेज दिखाने वाले न जाने इससे क्या हासिल करना चाहते हैं, लेकिन देखने वालों को सोचना चाहिए कि इसमें उनका या समाज का कौन सा हित है?

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