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नज़रिया: कठुआ रेप केस पर क्यों बंटा मीडिया
- Author, शुज़ात बुख़ारी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
कठुआ ज़िले में एक आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के मुद्दे पर जम्मू-कश्मीर के समाज में छुपी दरारें सामने आ गई हैं.
इस मुद्दे ने मीडिया समूहों को भी दो हिस्सों में बांटकर उन्हें पक्षकार की भूमिका में ला दिया है.
पीड़िता के साथ बलात्कार एक सच
बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या एक असलियत है.
जम्मू एवं कश्मीर राज्य पुलिस की क्राइम ब्रांच टीम की चार्जशीट ने एक नाबालिग समेत आठों अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं.
लेकिन बीते कुछ समय से जम्मू क्षेत्र के कुछ अख़बारों (ज़्यादातर हिंदी) ने इस मामले में बलात्कार पर सवाल उठाने के साथ ही ऐसी ख़बरों को प्रमुखता दी है.
उदाहरण के लिए, 20 अप्रैल को एक हिंदी अख़बार दैनिक जागरण ने अपने यहां एक हेडलाइन "कठुआ में बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर्फ जख्मों की बात" लगाई.
क्या कहती है पोस्टमार्टम रिपोर्ट?
लेकिन अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखें तो वह कहती है कि ये चोटें यौन संबंधों के दौरान लगी हैं.
कठुआ अस्पताल में डॉक्टरों ने पुष्टि की है कि "ये चोटें किसी भी तरह के यौन हमले से पैदा हो सकती हैं".
लेकिन अख़बारों ने अपनी रिपोर्ट उचित ठहराने के लिए लिखा कि पीड़िता को कई और वजहों से भी चोटें लग सकती हैं.
ये साफतौर पर बस इसलिए था ताकि अभियुक्तों को बचाने वाले पक्ष को तार्किक ठहराया जा सके.
इस मसले पर ये अख़बार ही नहीं बल्कि हिंदी मीडिया ने इस मुद्दे को ज़्यादा तरजीह नहीं दी. कुछ दूसरे अख़बारों ने ये माना कि बलात्कार हुआ लेकिन सामुहिक बलात्कार के मुद्दे पर सवाल उठाया.
ये अख़बार लगातार क्राइम ब्रांच की जांच पर सवाल उठा रहे हैं. इसके साथ ही अपनी ख़बरों को अभियुक्तों को फंसाने की बात करने वाले समाज की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिख रहे हैं.
अंग्रेजी अख़बारों का कैसा रहा रुख?
अंग्रेजी अख़बारों ने क्राइम ब्रांच और चार्जशीट पर सीधे सवाल नहीं उठाया लेकिन उनके तेवरों में भी एक तरह की नर्मी थी.
9 अप्रैल को कठुआ के वकीलों ने जब क्राइम ब्रांच को चार्जशीट जमा करने में अवरोध पैदा किया तो ये ख़बर अख़बारों में उतनी प्रमुखता से नहीं दिखाई दी.
इसी तरह जम्मू के मीडिया में बलात्कार और हत्या के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को भी ठीक से जगह नहीं दी गई.
कश्मीरी प्रेस के लिए अहम था ये मुद्दा
इसकी जगह कश्मीर की प्रेस ने इस मुद्दे को अच्छी-खासी अहमियत दी. अलग-अलग मीडिया समूहों और पत्रकारों ने इस मुद्दे पर चार्जशीट से जुड़ी बातों और इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनेताओं के बयानों को प्रमुखता से छापा.
इसके साथ ही छात्रों और पार्टियों के विरोध प्रदर्शन को भी अख़बारों में ठीक से जगह मिली.
एक तरह से कश्मीर ने इस मामले में अभियुक्तों को जेल की सलाखों की पीछे पहुंचाने के संघर्ष को आगे बढ़ाया.
इसी वजह से प्रोफेसर हरि ओम जैसी दक्षिण पंथी आवाजें कश्मीरी मीडिया को कश्मीर में इस्लामिक आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बताती हैं.
इसके साथ ही कई अन्य लोग भी कश्मीर की मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाते हैं क्योंकि लड़की मुस्लिम थी और कश्मीरी मीडिया पीड़िता और उसके परिवार के साथ खड़ी हुई.
सोशल और राजनीतिक हलकों की तरह मीडिया भी इस मुद्दे पर बंटी हुई है. एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो जम्मू की मीडिया एक तरह की शैली में काम किया.
शायद इसकी वजह ये थी कि हिंदू एकता मंच, जिसे दो बीजेपी मंत्रियों चंद्र प्रकाश गंगा और लाल सिंह का समर्थन हासिल हुआ, के बैनर तले कई लोग एकजुट हो गए. इस समूह ने अभियुक्तों का समर्थन किया.
'असली कहानी आएगी सामने'
हाई कोर्ट बार एसोशिएसन समेत समाज के कई तबकों ने इस मामले की जांच को सीबीआई को सौंपने की मांग उठाई और इस तरह क्राइम ब्रांच की जांच पर सवाल उठाया गया. इस वजह से मीडिया को भी यही पक्ष लेने के लिए ताक़त दी.
लेकिन कई लोगों को ये रास नहीं आया कि जम्मू को सांप्रदायिक क़रार दिया जाए. इन लोगों ने उन आरोपों का खंडन किया जिनमें बताया गया कि जम्मू के लोगों ने बिना किसी तर्क के बलात्कारियों और हत्यारों का पक्ष लिया.
जम्मू के एक ऐसे ही एक पत्रकार अरुण जोशी ने फेसबुक पर लिखा है, "असली कहानी सामने आएगी, अगर ये अभी तक सामने नहीं आई है लेकिन हम पत्रकारों को ज़िम्मेदारी से पेश आना चाहिए और उकसावे वाले बयानों से बचना चाहिए, इससे एक दिन हमें बाय-लाइन मिल सकती है लेकिन इससे होने वाले नुकसान की गणना नहीं की जा सकती.और अगर हम संस्थानों और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का सम्मान नहीं कर सकते हैं, चाहें कोई कुछ कहे या नहीं लेकिन हम अनचाहे नैरेटिव के तरफ जा रहे हैं. जम्मू-कश्मीर वैसे भी तबाही के मुहाने पर बैठा है."
जोशी जम्मू-कश्मीर राज्य के सामने आने वाले संकट की ओर भी इशारा करते हैं.
चूंकि जम्मू-कश्मीर में धार्मिक स्तर पर समाज के सभी तबके बंटे हुए हैं जिनमें मीडिया भी शामिल है.
ऐसे में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2008 की तरह अमरनाथ जमीन विवाद खड़ा हो सकता है.
इसके साथ ही बीजेपी जम्मू में अपने वोट बैंक की ओर से दबाव में हैं क्योंकि दो मंत्रियों के इस्तीफ़े को जम्मू के लोगों ने कश्मीर के सामने आत्मसमर्पण की तरह लिया है. ऐसे में जिस संकट की बात की जा रही है वो सच में सामने आ सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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