क्या दिल्ली के सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूल को टक्कर दे रहे हैं?

शिक्षा, प्राइवेट स्कूल, रिजल्ट
    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सीबीएसई के 10वीं और 12वीं के नतीजे आ गए हैं. हर बार की तरह लड़कियों ने फिर बाजी मारी.

12वीं में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चों ने प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वालों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है.

वैसे 12वीं के नतीजों के बाद दिल्ली सरकार के स्कूलों का गुणगान शुरू हो गया. ऐसा दावा किया जा रहा है कि पिछले 20 सालों में ये उनका सबसे बेहतर प्रदर्शन है.

लेकिन तीन दिन के अंदर जब 10वीं के नतीजे आए तो पता चला दिल्ली के सरकारी स्कूल अपना 12वीं वाला प्रदर्शन नहीं दोहरा पाए.

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दिल्ली के सरकारी स्कूल

10वीं के नतीजों में प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूलों का पास प्रतिशत 20 फीसदी कम रहा.

12वीं के नतीजों के बाद कुछ लोग ये पूछने लगे कि क्या दिल्ली के सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूल से बेहतर हो गए हैं?

क्या है इसकी जमीनी हकीकत? इसी की पड़ताल करती है हमारी ये रिपोर्ट.

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इमेज स्रोत, BBC/ Prince Kumar

इमेज कैप्शन, प्रिंस कुमार ने 12वीं में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में टॉप किया है.

प्रिंस दिल्ली के सरकारी स्कूल के पोस्टर बॉय

क्या वाकई में दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प हुआ है? इस सवाल का जवाब तलाशने हम पहुंचे दिल्ली के सरकारी स्कूल के 12वीं के साइंस के टॉपर प्रिंस के घर.

प्रिंस के 12वीं में 97 फीसदी नंबर आए हैं. उससे भी बड़ी बात ये कि गणित में 100 में से 100 नंबर मिले हैं.

अपनी कामयाबी के बारे में बीबीसी से बातचीत में प्रिंस बताते हैं, "11वीं में जब मैंने राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय द्वारका में दाखिला लिया, तो स्कूल का महौल पिछले सरकारी विद्यालय से बिल्कुल अलग था."

अपने नए स्कूल के बारे में बात करते हुए प्रिंस कहते है, "मेरे पुराने स्कूल में एक क्लास में 65 बच्चे हुआ करते थे. लेकिन नए स्कूल में एक क्लास में सिर्फ 35 बच्चे ही थे. इसलिए यहां स्कूल में टीचर बच्चों पर ज्यादा ध्यान दे सकते थे."

इतना ही नहीं प्रिंस के मुताबिक राजकीय विद्यालय में स्कूल में टीचर ज्यादा प्रशिक्षित हैं, एनसीआरटी की किताबों के आलावा स्टडी मेटेरियल भी स्कूल की तरफ से मिलता था, स्कूल ड्रेस से लेकर स्टेशनरी तक के पैसे भी स्कूल की जिम्मेदारी थी. उस पर प्रतिभावान होने की वजह से वजीफ़ा मिला सो अलग.

प्रिंस के दावों में कितनी सच्चाई है उसके हकीकत जानने के लिए उसके स्कूल जाना भी जरूरी था.

वीडियो कैप्शन, दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने तोड़ा 20 साल का रिकॉर्ड

कैसा दिखता है दिल्ली का सरकारी स्कूल?

बीबीसी की टीम दिल्ली के द्वारका में प्रिंस के स्कूल पहुंची, एक औचक निरीक्षण के लिए, बिना दिल्ली सरकार को बताए.

पहली नज़र में तो हमें विश्वास नहीं हुआ कि ये एक सरकारी स्कूल है. इतना साफ सुथरा की किसी प्राइवेट स्कूल को टक्कर दे सकता है.

ख़ासियत ये कि ये स्कूल 'ज़ीरो डस्टबीन' पॉलिसी मानता है. सीबीएसई के 12वीं के नतीजे शनिवार को आए इसलिए सोमवार को स्कूल में कुछ शिक्षक मिले.

स्कूल की छुट्टियां चल रही थीं, इसलिए दूसरे छात्र नहीं मिले.

स्कूल की एक टीचर ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "उनके स्कूल में 60 फीसदी डिजिटलाइजेशन हो गया है. हम स्मार्ट बोर्ड के जरिए पढ़ाते हैं. छात्र अगर पढ़ने में कमजोर हो तो हम एक्सट्रा क्लास लेते हैं. बच्चों के लिए काउंसिलर भी हैं."

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क्या कहते हैं अभिभावक?

छात्र खुश, टीचर खुश लेकिन क्या अभिभावक भी सरकारी स्कूलों से खुश हैं?

इसलिए प्रिंस और सरकारी स्कूल के दावों के बारे में हमने ऑल इंडिया पैरेन्ट्स एसोशिएशन के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल से बात की.

अशोक अग्रवाल सरकारी स्कूलों मे आधारभूत सुविधाएं बेहतर हुई हैं, इस पर दिल्ली सरकार को बधाई देते हैं, लेकिन साथ ही कई आरोप भी लगाते हैं.

उनका कहना है, "स्कूलों में टेबल चेयर, बेंच और स्मार्ट बोर्ड से ही रिजल्ट बेहतर नहीं किया जा सकता. जब स्कूल में केवल अच्छे पढ़ने वाले बच्चों को ही दाखिला मिलेगा, तो रिजल्ट बेहतर ही होगा."

अशोक का आरोप है कि दिल्ली सरकार ने हज़ारों बच्चों को उनके खराब परफॉर्मेंस के आधार पर 11वीं में प्रमोट ही नहीं किया और इस वजह से 12वीं के नतीजों को बेहतर दिखा पाई.

लेकिन 10वीं में उनकी पोल खुल गई. उनका आरोप है कि स्कूल में स्थाई टीचर नहीं है और सरकार गेस्ट टीचर से काम चला रही है.

उनके मुताबिक दिल्ली सरकार के स्कूलों में 28,000 शिक्षकों की वेकेंसी है.

शिक्षकों की कमी के अशोक अग्रवाल के आरोप को दिल्ली सरकार की पूर्व शिक्षा सलाहकार आतिशी मार्लेना भी सही बताती हैं.

लेकिन उनका कहना है कि गेस्ट टीचर से हम शिक्षकों की कमी को पूरा कर रहे हैं. नियमित टीचर की भर्ती के लिए काम भी साथ में चल रहा है.

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क्या कहते हैं आंकड़े?

सीबीएसई के 12वीं के आंकड़ों की माने तो दिल्ली के सरकारी स्कूल तिरुवनंतपुरम के बाद दूसरे नंबर पर रहे. तीसरे पर चेन्नई और चौथे पर अजमेर रीजन रहा.

लेकिन सीबीएसई के 10वीं के नतीजों में दिल्ली के सरकारी स्कूल वो कमाल नहीं दिखा पाए.

तिरुवनंतपुरम के सरकारी स्कूल 10वीं के नतीजों में भी पहले स्थान पर रहे.

लेकिन दूसरे नंबर पर अजमेर के सरकारी स्कूल रहे, तीसरे पर देहरादून और चौथे पर दिल्ली का नंबर आया.

यानी दसवीं के नतीजों में सरकारी स्कूल पिछड़े जरूर लेकिन टॉप चार में जगह बनाने में फिर भी कामयाब रहे.

दिल्ली में कुल 1029 सरकारी स्कूल हैं और 1700 प्राइवेट स्कूल हैं.

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दिल्ली सरकार का दावा

12वीं में बेहतर प्रदर्शन और 10वीं में उससे थोड़े खराब प्रदर्शन पर हमने दिल्ली सरकार की पूर्व शिक्षा सलाहकार आतिशी मार्लिना से बात की.

आतिशी फिलहाल दिल्ली सरकार में शिक्षा विभाग में किसी पद पर नहीं है, पर सरकार की शिक्षा नीतियों को बनाने और हकीकत में तब्दील करने के लिए बहुत मेहनत की है.

उनके मुताबिक चार अहम बातें हैं जिनकी मदद से दिल्ली सरकार, सरकारी स्कूलों का कायाकल्प कर पाई हैं.

वीडियो कैप्शन, कैसे हुआ दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बदलाव?

चार अहम वजहें

1. स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर और मेंटेनेंस पर सरकार का सबसे ज्यादा ध्यान. इसके लिए सरकार ने शिक्षा बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की है. दिल्ली सरकार अपने बजट का 26 फ़ीसदी पैसा शिक्षा पर खर्च कर रही है.

2. सरकार ने स्कूल के टीचरों को ट्रेनिंग देने का नयाब तरीका ढूंढा. स्कूल में मौजूद वर्तमान टीचरों में से सबसे पहले एक मेंटर टीचर ढूंढा. ऐसे 200 टीचर की ट्रेनिंग दिल्ली से बाहर ले जा कर करवाया. उसी तरह से स्कूल के 300 प्रिंसिपल को भी ट्रेनिंग दिलवाई गई. दिल्ली के स्कूल के प्रिंसिपल को कैंब्रिज, हॉवर्ड, फिनलैंड और आईआईएम अहमदाबाद जैसी जगह पर भेजा गया था. सरकार के इस कदम से टीचर और प्रिंसिपल में न सिर्फ अलग उत्साह देखने को मिला बल्कि उनके काम पर भी अच्छा असर पड़ा.

3. कमज़ोर बच्चों को और बेहतर बनाने के लिए टीचरों ने स्कूल टाइमिंग की कभी परवाह नहीं की. न सिर्फ गर्मी और सर्दियों की छुट्टियों में बल्कि एक्ज़ाम के बीच में जो छुट्टियां पड़ी उस दौरान भी एक्सट्रा क्लास लगाए गए.

4. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे गरीब होते हैं इसलिए सरकारी स्कूलों में सरकार ने स्टडी मटेरियल अपने खर्चे पर प्रिंट करवा कर बच्चों में बंटवाया.

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एक्सपर्ट की राय

तो क्या वाकई में दिल्ली के सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूल से बेहतर हैं और देश के सबसे बेहतरीन सरकारी स्कूल हैं?

सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली के मुताबिक इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली के सरकारी स्कूल, देश के बाक़ी राज्यों के सरकारी स्कूलों से बेहतर हैं.

दरअसल दिल्ली इकलौता राज्य है जहां के सरकारी स्कूल सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा में बैठते हैं. बाकी राज्य के सरकारी स्कूल राज्य बोर्ड की परीक्षा देते हैं.

अशोक गांगुली के मुताबिक सीबीएसई बोर्ड के मुकाबले राज्यों के बोर्ड कहीं नहीं ठहरते. सीबीएसई देश का सबसे बेहतरीन बोर्ड है.

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अहम सवाल यही है...

अशोक गांगुली इसके पीछे की वजह भी बताते हैं.

उनके मुताबिक जिस तरह का सिलेबस, मार्किंग स्कीम और प्रश्न पत्र सीबीएसई तैयार करता है उस तरह का कोई और बोर्ड नहीं करता.

राष्ट्रीय स्तर का बोर्ड होने के कारण सीबीएसई के पास संसाधन भी है और प्रतिभावान लोग भी.

लेकिन अहम सवाल यही है क्या दिल्ली के सरकारी स्कूल प्राइवेट से बहुत ज्यादा बेहतर हो गए हैं?

इस सवाल पर वो कहतें हैं, "पास प्रतिशत सरकारी स्कूलों का भले ही बेहतर हुआ हो लेकिन बच्चे ज्यादा अच्छा प्राइवेट स्कूल के कर रहे हैं."

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उनके मुताबिक पास प्रतिशत बेहतर होना एक बात है और नम्बर अच्छे लाना दूसरी बात है.

सरकारी स्कूल में बच्चे ज्यादा पास हुए हैं लेकिन नम्बर प्राइवेट स्कूल वालों के ज्यादा आए हैं.

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