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ग्राउंड रिपोर्ट: बाग़पत में किसान की मौत से उपजे कई सवाल
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
रविवार को बाग़पत ज़िले के बड़ौत तहसील मुख्यालय पर दोपहर के एक बजे 40 से 50 किसान बरगद के पेड़ के नीचे ग़ुस्से और शोक में बैठे थे और यहां से क़रीब चार-पांच किमी. दूर बाग़पत में एक बड़ा जलसा हो रहा था.
राजधानी दिल्ली में ईस्टर्न पेरीफ़ेरल एक्सप्रेस-वे का शुभारंभ करने के बाद वहां से क़रीब 40 किमी. दूर बाग़पत ज़िले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा हो रही थी और इसी ज़िले के बड़ौत क़स्बे में एक दिन पहले अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे किसान उदयवीर की धरनास्थल पर ही मौत हो गई थी. वहां मौजूद किसान अपनी मांगों पर अड़े भी थे और अपने साथी की मौत से शोकाकुल भी थे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां जनसभा की वहां से कुछ ही किमी. की दूरी पर कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा की सीमा शुरू हो जाती है, जहां आज यानी सोमवार को मतदान हो रहा है.
इलाक़े में गन्ना और गन्ना किसानों के महत्व को देखते हुए प्रधानमंत्री ने जनसभा में घोषणा की कि अब किसानों का गन्ने का बकाया देने में सरकार सहयोग करेगी और ये धनराशि सीधे उनके खाते में चली जाएगी.
बड़ौत तहसील मुख्यालय में जमा किसान अपने बकाए की मांग को लेकर ही धरना देने को विवश थे. प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा वो सुन चुके थे.
'अब तक घोषणा और आश्वासन ही सुनते आए हैं'
पूछने पर 80 वर्षीय रामपाल बोल पड़े, "अजी घोषणा और आश्वासन ही सुनते आए हैं, मिला क्या? सरकार और प्रशासन के लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि किसान की मौत से भी उनके ऊपर कोई फ़र्क नहीं पड़ता. सारा प्रशासन योगी-मोदी की ख़ातिरदारी में लगा है. किसान धरने पर बैठे-बैठे मर गया उसे कोई देखने तक नहीं आया."
तहसील मुख्यालय पर 21 मई से ही धरना दे रहे किसानों की मांग है कि उनके गन्ने की बकाया राशि का चीनी मिल वाले तुरंत भुगतान करें और बेतहाशा बढ़ाई गईं बिजली की दरें कम की जाएं.
कुलदीप तोमर नाम के युवा किसान भी धरने पर बैठे थे. वो बताने लगे, "पड़ोस में हरियाणा है, जहां बिजली का रेट 35 रुपए प्रति हॉर्स पावर आता है जबकि हमसे 180 रुपए प्रति हॉर्स पावर लिया जा रहा है. एक-एक किसान को हज़ारों रुपए बिल आ रहे हैं. हम कहां से जमा करें."
किसानों का कहना है कि वो बिल देने को तैयार हैं, लेकिन बिजली की क़ीमत कम की जाए. जब तक क़ीमत कम नहीं की जाएगी, किसान धरने पर बैठे रहेंगे.
दो दिन पहले ही शामली में मुख्यमंत्री योगी ने दावा किया था कि ज़्यादातर किसानों को गन्ने का भुगतान किया जा चुका है, जबकि यहां मौजूद एक बुज़ुर्ग किसान का कहना था कि उनके जानने वालों में अभी तक किसी को भी बकाया नहीं मिला है. चीनी मिलों पर ये बकाया एक साल पहले तक का है.
जिमाना गांव के साठ वर्षीय किसान उदयवीर को भी बकाया भुगतान नहीं हुआ था और उनके ऊपर क़रीब दो लाख रुपए का कर्ज़ भी था. उनकी पत्नी बताती हैं, "तीन बच्चे हैं जो प्राइवेट नौकरी करते हैं. घर का ख़र्च पूरा नहीं हो पाता था. कभी परेशानी बताते नहीं थे. धरने पर बैठे थे, इसी सदमे में उनकी मौत हो गई कि कैसे घर का ख़र्च चलेगा और कैसे कर्ज़ उतरेगा."
आत्महत्या के लिए मजबूर किसान
उदयवीर के घर पर भी कई किसान मौजूद थे. लोग बताने लगे कि चीनी मिलों से बकाया पैसा न मिलने के कारण लोग स्कूलों में बच्चों की फ़ीस तक नहीं जमा कर पा रहे हैं.
किसानों को इस बात का भी मलाल है कि कांग्रेस के राजबब्बर, लोकदल के जयंत चौधरी और सपा के कई नेता उनके प्रति हमदर्दी और समर्थन जताने आए लेकिन प्रशासन और सरकार का कोई व्यक्ति नहीं आया और न ही भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता.
दरअसल, पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान सबसे ज़्यादा गन्ने की खेती करते हैं और अपना ज़्यादातर गन्ना चीनी मिलों को बेचते हैं. चीनी मिलों और किसानों के बीच बकाया पैसे को लेकर अक़्सर तनाव रहता है और ये मुद्दा हमेशा राजनीतिक बना रहता है.
भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि किसानों को गन्ने का भुगतान दो हफ़्ते के भीतर कराया जाएगा लेकिन तमाम किसानों का आरोप है कि उनके महीनों से बकाया पड़ा है, अभी तक पैसा नहीं मिला.
कैराना और नूरपुर उपचुनाव में भी गन्ना किसानों की समस्या एक बड़ा मुद्दा रहा. राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी ने बाक़ायदा नारा ही दे दिया- "हमें जिन्ना नहीं गन्ना चाहिए."
जयंत चौधरी कहते हैं, "18 मई तक प्राइवेट और सरकारी चीनी मिलों पर किसानों का 13367 करोड़ रुपए बकाया है. अब धीरे-धीरे गन्ना मिल बंद होने का समय भी आ रहा है. लेकिन इसके बाद भी किसानों का पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है. किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है."
पिछले दिनों में बागपत में ही एक युवा किसान ने चीनी मिलों पर तीन लाख रुपए बकाया होने और पैसा काफ़ी दिनों से न मिलने के चलते आत्महत्या कर ली थी.
बाद में अधिकारी युवक का बकाया पैसा जब लेकर गए तो उसके भाई ने ये कहते हुए मना कर दिया, "क्या जो मरेगा उसी का भुगतान होगा? हमें नहीं चाहिए पैसे, हमें सिर्फ़ हमारा भाई चाहिए."
'सरकार ने बहुत निराश किया'
बताया जा रहा है कि मौजूदा सीजन में चीनी मिलों पर किसानों का 12,000 करोड़ रुपया बकाया है. मिल मालिक देश में गन्ने की क़ीमतें गिरने की वजह से हुए नुक़सान की भारपाई के लिए सरकार से राहत पैकेज मांग रहे हैं.
बीते साल जुलाई में जो गन्ना 3721 रुपए प्रति क्विंटल था, उसके दाम इस साल 2700 रुपए प्रति क्विंटल तक गिर गए थे.
कैराना लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें तीन शामली जिले में और दो सहारनपुर में हैं. यहां कुल छह चीनी मिले हैं.
उपचुनाव को देखते राज्य सरकार ने किसानों से ज़्यादा से ज़्यादा गन्ना ख़रीदने और बकाया भुगतान देने का दबाव ज़रूर डाला है लेकिन किसान अभी भी बकाया न मिलने की शिकायत कर रहे हैं.
हालांकि कुछ ऐसे भी किसान हैं जिनका कहना है कि फ़रवरी तक का भुगतान उन्हें मिल चुका है और उन्हें उम्मीद है कि उसके बाद का भी बकाया मिल जाएगा. कैराना के ऊंचागांव के ज़्यादातर किसानों का यही कहना था.
दिलचस्प बात ये है कि राज्य के गन्ना मंत्री सुरेश राणा भी शामली ज़िले से ही आते हैं और थानाभवन से विधायक हैं. गन्ना किसानों को इस बात का ख़ासतौर पर मलाल है.
गन्ना किसान राजबल चौधरी कहते हैं, "गन्ना पट्टी के किसानों ने ये सोचकर बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था कि केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकार आ जाएगी तो गन्ना किसानों की समस्या दूर हो जाएगी लेकिन इस सरकार ने हमें बहुत निराश किया है."
इस बार गन्ने की पैदावार काफ़ी अच्छी हुई है इसलिए किसानों पर अब इसकी दोहरी मार भी पड़ रही है. गन्ना खेतों में खड़ा है लेकिन चीनी मिलें ख़रीद नहीं कर रही हैं, पिछले बकाए का भुगतान नहीं हुआ है, सो अलग.
हालांकि इस बारे में जब गन्ना मंत्री सुरेश राणा से बात की गई तो उन्होंने आश्वासन दिया, "सरकार वादा कर चुकी है कि जब तक खेत में गन्ना है मिलें बंद नहीं होने दी जाएगी. लेकिन इसके बाद भी यदि कोई ऐसी स्थिति है आती है तो हम उस खेत का गन्ना दूसरी मिल में भेजने की व्यवस्था कर रहे हैं."
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