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ग्राउंड रिपोर्ट: 'कैराना से हिंदुओं का पलायन तब भी मुद्दा था, अब भी मुद्दा है'
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, कैराना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
साल 2016 में कैराना से तत्कालीन भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने जब हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाया था तब राजनीतिक हलकों में मानो भूचाल आ गया था.
ज़मीनी स्तर पर तमाम पड़तालें हुईं, दावे पर संदेह जताए गए, कई मामले ग़लत भी पाए गए, मामले को उठाने वाले हुकुम सिंह ख़ुद एक साल बाद इस मुद्दे पर सफ़ाई देने लगे थे.
लेकिन जानकारों के मुताबिक़, साल 2017 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस मुद्दे ने 'आग में घी' का काम किया और उसका सीधा फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला.
'मकान बिकाऊ है'
हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई इस लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के वक़्त ये मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक सुर्खियों में आ गया है.
शामली ज़िले में पड़ने वाले कैराना क़स्बे में इस समय 'मकान बिकाऊ है' के बोर्ड तो अब नहीं मिलते हैं लेकिन जब ये बोर्ड लगे थे तब भी इन मकानों के बिकाऊ होने की वजह 'पलायन' ही है.
इस पर लोग तब भी संदेह करते थे और आज भी.
कैराना के चौक बाज़ार में इस बारे में लोगों से बात करने पर पता चलता है कैराना क़स्बे और आस-पास के गांवों से भी बहुत से लोग दूसरे शहरों में गए हैं.
लेकिन इनके जाने की वजह किसी ख़ास समुदाय का डर नहीं बल्कि रोज़ी-रोटी, व्यापार और शिक्षा है जैसा कि देश के दूसरे शहरों में भी आमतौर पर होता है.
'किसी ख़ास समुदाय का डर नहीं'
चौक बाज़ार में ही जनरल स्टोर चलाने वाले राजेंद्र सिंह कहते हैं, "अब बहुत सुकून है. पहले कुछ आपराधिक तत्व थे जिनकी वजह से व्यापारी वर्ग डरा रहता था. रंगदारी मांगते थे, न देने पर जान से मारने की धमकी देते थे और कई बार ऐसा कर भी देते थे. एक साल के भीतर तीन व्यापारियों की हत्या हुई थी."
लेकिन क्या उसकी वजह से सैकड़ों परिवार अपने घरों को छोड़कर बाहर चले गए? इस सवाल के जवाब में राजेंद्र सिंह साफ़ जवाब नहीं देते.
वो कहते हैं कि इसका जवाब तो घर छोड़ने वाले ही बता सकते हैं.
हालांकि वो इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनकी जानकारी में या उनके किसी जानने वाले ने 'डर के चलते पलायन' नहीं किया है.
पलायन पर लोगों के जवाब
कैराना के ही रहने वाले स्थानीय पत्रकार संदीप इंसां भी राजेंद्र सिंह की बात का समर्थन करते हैं. चौक बाज़ार चौराहे के एक ओर मस्जिद है और दूसरी ओर मंदिर है.
यहां जितनी दुकानें आस-पास दिखती हैं वो भी हिंदुओं और मुसलमानों की हैं. इक्का-दुक्का सिख भी हैं.
फल की दुकान चलाने वाले जावेद कहते हैं कि यहां लोग हमेशा भाई-चारे के साथ रहते रहे हैं और अभी भी हैं.
पलायन के मुद्दे को जावेद सीधे तौर पर नकारते हैं, लेकिन राजेंद्र सिंह की बात का समर्थन भी करते हैं.
जावेद कहते हैं, "आपराधिक तत्वों से तो सभी परेशान थे, चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान."
लेकिन इसी चौराहे पर कुछ लोग मुखर होकर पलायन की बात को नकारते हैं और स्वीकारते हैं.
'ज़बरन राजनीतिकरण'
अब्दुल लईक काफी ग़ुस्से में कहते हैं, "इस मुद्दे को सिर्फ़ राजनीतिक फ़ायदे के लिए उठाया गया था, कोई सच्चाई इसमें नहीं है. उपचुनाव की जब से घोषणा हुई है, कुछ लोग फिर इसे गर्माने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन ज़मीनी सच्चाई यही है कि न तो तब पलायन हुआ था और न ही अब कोई लौटकर आया है."
चौक बाज़ार की तरह क़स्बे के दूसरे मोहल्लों में भी पलायन के मुद्दे पर स्थानीय लोगों की राय लगभग वैसी ही है जैसी कि राजनीतिक दलों की.
इस मुद्दे पर उनसे बातचीत के बाद आसानी से ये पता चल सकता है कि कौन व्यक्ति किस पार्टी का समर्थक है. गांवों में पलायन जैसी बातें सामने नहीं आई थीं.
लेकिन पलायन के मुद्दे पर गांवों में भी लोगों की सोच कुछ इसी तरह से बँटी है.
यानी कुछ लोग दो-तीन साल पहले पलायन होने और अब उसके रुकने की बात करके मौजूदा सरकार का समर्थन करते हैं तो कुछ इसके 'ज़बरन राजनीतिकरण' की बात करके ख़ुद को भाजपा विरोधी दिखाते हैं. या फिर दिख जाते हैं.
एक 'क्रिएटेड इश्यू'
कैराना लोकसभा क्षेत्र में यूं तो पांच विधानसभा सीटें आती हैं लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चा कैराना विधान सभा की ही हो रही है.
मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने भी शामली की जनसभा में पलायन का ज़िक्र किया और अपनी सरकार में उस पर लगाम लगाने की बात कही तो स्थानीय भाजपा नेता आम जनता तक रोज़ इस मुद्दे को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.
कैराना लोकसभा सीट से भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह हुकुम सिंह की बेटी हैं.
बीबीसी से बातचीत में पलायन के मुद्दे पर वो साफ़तौर पर कहती हैं, "लोगों ने डर कर पलायन किया था और कई परिवार ऐसे हैं जो कि क़ानून-व्यवस्था सही होने के चलते वापस लौट आए हैं."
लेकिन पलायन करने वालों और और वापस लौटने वालों की उनके पास कोई आधिकारिक सूची नहीं है. यहां तक शामली और कैराना के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी इस मामले में कुछ भी बात करने से बच रहे हैं.
वहीं दूसरी ओर, विपक्ष इसे एक 'क्रिएटेड इश्यू' कहकर इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में लाने का विरोध कर रहा है.
हिंदू और मुसलमान
कैराना लोकसभा सीट से राष्ट्रीय लोकदल और गठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन कहती हैं, "पहली बात तो यह है कि कैराना से कोई पलायन नहीं हुआ. हिंदू और मुसलमान दोनों यहां कई पीढ़ियों से सद्भावपूर्ण तरीके से एक साथ रह रहे हैं. अहम मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उछाला गया था ताकि चुनावों को सांप्रदायिक रंग देकर मतदाताओं को बांटा जा सके."
बहरहाल, पलायन को लेकर मौजूदा स्थिति ये है कि जो लोग पहले होने वाले पलायन का समर्थन कर रहे थे, पलायन अब उनकी निग़ाह में भी रुक गया है और जो लोग पलायन को स्वीकार ही नहीं करते थे.
उनके लिए तो पलायन कभी हुआ ही नहीं.
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