मोदी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है - कांग्रेस

    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कर्नाटक में भाजपा के 55 घंटे के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के इस्तीफ़े के साथ ही शनिवार का दिन भारत के राजनीतिक इतिहास में दर्ज़ हो गया.

येदियुरप्पा के इस्तीफ़े के आधे घंटे बाद ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मुस्कुराते हुए मीडिया के सामने आए.

राहुल गांधी ने भाजपा, आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ज़ोरदार हमला किया. लेकिन उनके वक्तव्य का कीवर्ड रहा 'विपक्ष की एकजुटता'.

तो क्या कांग्रेस विपक्ष को एकजुट कर पाएगी? क्या वो इसके दम पर 2019 के आम चुनावों में बेहद मज़बूत स्थिति में चल रही भाजपा को चुनौती दे पाएगी?

क्या एकजुट होगा विपक्ष?

कांग्रेस जहां कर्नाटक में मिली सियासी जीत को अपनी नई ताकत के रूप में देख रही है वहीं बीजेपी अपनी हार के तकनीकी कारण तलाश रही है.

वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण मानते हैं कि कर्नाटक के नतीजों से कांग्रेस को मदद मिलेगी और इससे आने वाले वक्त में विपक्ष भी एकजुट होगा.

भूषण कहते हैं, "कर्नाटक में भाजपा को सिर्फ़ 104 सीटें मिलने और अब कांग्रेस और जेडीएस की साझा सरकार बनने से देश में ये संदेश गया है कि कहीं ऐसा ही साल 2019 में भी न हो जाए कि बीजेपी बहुमत से पीछे छूट जाए. यदि ये संदेश देश में जाता है तो विपक्ष ये कोशिश करेगा कि हम ऐसा ही करें और बीजेपी को बहुमत से कम पर सीमित कर दें."

हालांकि भारत भूषण का मानना है कि देश के मुद्दे कर्नाटक के चुनाव नतीजों से कहीं बड़े हैं. वो कहते हैं, "कर्नाटक से अलग कई अहम मुद्दे हैं जो 2019 के नतीजों को प्रभावित करेंगे. बेरोज़गारी बढ़ी हुई है, जीएसटी से लोग परेशान हैं, नोटबंदी से व्यापार बंद हुए हैं, देश के किसान परेशान हैं, आत्महत्या कर रहे हैं. आगामी चुनाव में ये ही बड़े मुद्दे बनेंगे."

कैसे बन पाएगा राष्ट्रीय गठबंधन?

भारत भूषण मानते हैं कि कर्नाटक के घटनाक्रम के बाद विपक्ष में एक नया उत्साह पैदा हुआ है और 2019 में पूरी ताकत के साथ बीजेपी का मुक़ाबला करने की उम्मीद बंधी हैं.

लेकिन उनका ये भी कहना है कि राष्ट्रीय गठबंधन बनाने के लिए कांग्रेस को अपनी वास्तविक स्थिति को भी समझना होगा.

भूषण कहते हैं, "अब तक एकजुट होने का कांग्रेस का तरीका ये था कि कांग्रेस बीच में हो और बाक़ी पार्टियां उसके इर्द-गिर्द जुट जाएं. लेकिन ऐसा जमावड़ा अब कांग्रेस के इर्द-गिर्द नहीं लगेगा. अब एकजुट होने का तरीका ये होगा कि जो पार्टी जहां मज़बूत है वो वहां की प्रमुख पार्टी मानी जाएगी और ये दल कांग्रेस को साथ लेकर अपना एक गठबंधन बनाएं."

भूषण कहते हैं, "आज भी कई राज्यों में कांग्रेस बेहद मज़बूत स्थिति में हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब ऐसे राज्य हैं जहां मुक़ाबला सीधा कांग्रेस और भाजपा के बीच है. यहां गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस के ही हाथ में रहे लेकिन बाकी दलों को भी सीटों के बंटवारे में जगह मिले."

"गठबंधन जब बीजेपी से सीधा वन-टू-वन मुक़ाबल करेगा तब ही 2019 में कांग्रेस गठबंधन का कुछ हो सकेगा."

गठबंधन को साथ ले कर चलेगी कांग्रेस

कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी उन सारी ताक़तों के साथ मिलकर चलने को तैयार है जो इस देश के मूलभूत मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होकर मोदी सरकार से लोहा लेने को तैयार हैं. राहुल गांधी ने ये पहली बार नहीं कहा है."

"कांग्रेस हमेशा राष्ट्रहित में ऐसे सभी राजनीतिक दलों के साथ भी चली है जिनसे हमारे वैचारिक मतभेद भी रहे है क्योंकि मोदी जी की तरह सत्ता हमारा एकमात्र लक्ष्य नहीं है. हम ये व्यवस्था बदलना चाहते हैं."

सुरजेवाला कहते हैं, "जहां हम अकेले लड़ सकते हैं वहां अकेले लड़ेंगे और जहां राजनीतिक दलों को साथ लेना होगा वहां साथ भी लेंगे. कांग्रेस हर प्रदेश में हालात के मुताबिक निर्णय करती है. 2004 से पहले कहा जाता था कि कांग्रेस गठबंधन की सरकार नहीं चला सकती लेकिन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने दस साल तक सरकार चलाकर इस बात को ग़लत साबित किया है."

"हम गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चलते हैं, उन्हें छोड़ते नहीं है. हमने मोदी जी की तरह सहयोगियों को खोया नहीं है. मोदी जी 2014 में शिवसेना के साथ चले थे, आज वो अलग-थलग हैं. चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए का गठन किया था, आज वो भी अलग हैं. बीजू जनता दल एनडीए की संस्थापक सदस्य है, आज वो भी अलग-थलग है. अन्य राजनीतिक दल भी उन्हें छोड़ने की तैयारी में हैं क्योंकि मोदी जी और अमित शाह जी का एकमात्र लक्ष्य सत्ता है, सत्ता उनका आख़िरी निशाना है, व्यवस्था बदलने का माध्यम नहीं है."

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी कहते हैं, "2019 में जिस व्यापक गठबंधन के बनने की बात हो रही है उसे कर्नाटक के सियासी घटनाक्रम से मज़बूती मिली है. जेडीएस के रूप में एक नया सहयोगी जुड़ा है. विपक्ष को इससे ऊर्जा भी मिली है."

हफ़ीज़ गांधी कहते हैं, "इस गठबंधन में समाजवादी की भूमिका बेहद अहम रहेगी क्योंकि दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है. समाजवादी पार्टी इस गठबंधन को और मज़बूत होते देखना चाहती है और सभी साझा विचारधारा वाली पार्टियों को साथ लाना चाहती है. हमने गोरखपुर और फूलपुर में गठबंधन की ताक़त दिखा दी है और यही हम 2019 आम चुनावों में भी करेंगे."

मज़बूत सरकार से मज़बूर सरकार

एक तरह भारतीय जनता पार्टी ने देश में कांग्रेस मुक्त अभियान चला रखा है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने आज अस्तित्व का भी संकट है. ऐसे में क्या कांग्रेस मोदी सरकार का मुक़ाबला करने के लिए तैयार है?

सुरजेवाला कहते हैं, "2019 में मोदी सरकार के जाने की उल्टी ग़िनती शुरू हो गई है और ये बात अब इस देश के लोगों की ज़ुबान पर है. राजनीतिक दल अकेले चले तो नरेंद्र मोदी को नहीं हरा सकते. इस देश की जनता की तकलीफ़ें, मोदी जी द्वारा दिए गए जो जुमले, भाजपा आए दिन जो इस देश के किसानों, नौजवानों और अल्पसंख्यक समुदायों का उत्पीड़न कर रही है, उन सबकी वजह से ही मोदी सरकार चलता होगी."

वहीं भाजपा का मानना है कि कांग्रेस संयुक्त विपक्ष का नेतृत्व तो क्या संयोजन करने की स्थिति में भी नहीं है. भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं कि कांग्रेस ने अपने आप को पिछलग्गू के रूप में स्वीकार कर लिया है.

वो कहते हैं, "कर्नाटक जहां वो वर्षों शासन कर चुके हैं वहां वो अब पिछलग्गू की भूमिका स्वीकर करने को तैयार हैं तो वो पूरे भारत की राजनीति में भी पिछलग्गू बनने को तैयार हैं. जिन लोगों ने कर्नाटक को एक मज़बूत सरकार से महरूम करके एक मजबूर सरकार दी है वो 2019 में देश को एक मज़बूत सरकार से वंचित करके मजबूर सरकार नहीं दे सकेंगे."

सुंधाशु त्रिवेदी कहते हैं, "जब-जब सबसे बड़ी पार्टी को घेरकर सबने रोका है वो और मज़बूत होकर लौटी है. अटल जी को 1996 में रोका वो 98 में मज़बूत होकर लौटे, प्रधानमंत्री बने और सरकार चली. येदियुरप्पा जी को 2008 में इसी ढंग से रोका वो 2013 में और मज़बूत होकर 110 सीटें के साथ आए. जिस छल के साथ येदियुरप्पा जी को रोका गया है उस छल का जवाब जनता देगी."

विपक्ष की एकजुटता के सवाल पर त्रिवेदी कहते हैं, "विपक्ष की एकजुटता जब भी रही है, 1969, 1977, 1989, 1996, 1997 में. 96-97 से पहले भारतीय जनसंघ यानी भाजपा और उस समय की भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी क्योंकि इसमें एक सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी होनी चाहिए. उस समय हम उस स्थिति में थे. लेकिन आज की कांग्रेस व्यवहारिक दृष्टि से उस स्थिति में नहीं है."

"कांग्रेस के पास सिर्फ़ दो राज्यों में मुख्यमंत्री रह गए हैं एक पंजाब और दूसरा पुदुचेरी. कर्नाटक की सरकार में वो शामिल होंगे तो ढाई राज्य वो चला रहे होंगे. आज व्यवहारिक दृष्टि से कांग्रेस आधारशिला की भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं है. ऐसे में जिस गठबंधन का कोई सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी ही न हो उसका स्थायित्व भी नहीं हो सकता."

पैसों का बोलबाला

हाल के सालों में चुनावों में पैसे और अन्य साधनों और संशाधनों की भूमिका भी बढ़ी है. तो क्या कांग्रेस बेहद मज़बूत स्थिति में दिख रही भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में होगी?

सुरजेवाला कहते हैं, "इस देश में चुनाव सिर्फ़ हज़ार दो हज़ार करोड़ खाते में होने से ही नहीं जीते जा सकते हैं. अगर ऐसा होता तो उद्योगपति बड़े राजनेता होते. इस देश में पैसे या छल के दम पर सत्ता प्राप्त नहीं होती बल्कि सच्चाई के पथ पर चलकर हासिल होती है. कांग्रेस आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी सच्चाई के रास्ते पर चली है और जीती है. पैसा न होने हमारी कमज़ोरी हो सकती है लेकिन आज यही हमारी सबसे बड़ी ताक़त भी है."

सुरजेवाला कहते हैं, "हम जनमत के आधार पर सत्ता बनाएंगे. जिस तरह से हम गुजरात में लड़े, कर्नाटक में लड़े और गुजरात के राज्यसभा चुनाव में लड़े हमने दिखाया कि हमने लोहा लिया और सच्चाई के मार्ग पर चलते हुए हम भाजपा से बेहतर हैं."

सुंधाशु त्रिवेदी का कहना है, "हमें 21वीं सदी में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महान भारत बनाना है और कांग्रेस को बस राह में रोढ़े अटकाने हैं. जिस तरह बीसवीं सदी में भारतीय राजनीति कांग्रेस बनाम बाक़ी दलों की थी अब स्पष्ट हो गया है कि 21वीं सदी में भारतीय राजनीति बीजेपी बनाम बाक़ी दलों की है."

"जैसे किसी ज़माने में इंदिरा जी को रोकने के प्रयास किए जाते थे वैसे ही प्रयास आज नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए किए जा रहे हैं."

"ये भाजपा का युग है. सब विरोध करेंगे लेकिन अंततः हम अपनी निष्ठा, कार्यकर्ताओं की मेहनत और लोकप्रियता के दम पर बाज़ी जीत लेंगे."

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