क्या कांग्रेस राहुल को बनाएगी पीएम पद का उम्मीदवार?

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, प्रमोद जोशी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

पहली नज़र में लगता नहीं कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के बारे में बहुत सोच-विचार करके कुछ बोला है.

लेकिन दूसरी नज़र में लगता है कि उन्होंने मौके का फ़ायदा उठाते हुए सोच-समझकर यह बात कही है. अपना दावा पेश किया है. औपचारिकताओं में फँसे रहते, तो तमाम पचड़े होते.

ऐसा है तो यकीनन राहुल ने तेजी से राजनीति का पहाड़ा सीख लिया है. और वे भी घाघ नेताओं की तरह मुहावरों में बातें करने लगे हैं.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

राहुल का प्रोफाइल बनाने के लिए भी ऐसी घोषणाओं की जरूरत है. इस घोषणा का झटका बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के सहयोगी दलों को भी लगेगा.

सहयोगी दल क्या कहेंगे?

राहुल गांधी ने जो भी कहा है, उसके राजनीतिक निहितार्थ उनके सहयोगी और विरोधी अब निकालेंगे.

उनकी पार्टी के भीतर से उनके समर्थन में बयान आने भी लगे हैं. हैरत नहीं कि देखते ही देखते पोस्टर लगने लगें.

लेकिन ज़्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी अपने प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी का नाम घोषित करके 2019 के चुनाव में उतरेगी? इसकी जरूरत भी है क्या?

पार्टी में राहुल गांधी के अलावा और कौन है, जो प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी हो?

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

जब राहुल गांधी ने कहा कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने वाले नहीं हैं, तब उनसे सवाल किया गया कि क्या आप प्रधानमंत्री बनेंगे? इसपर राहुल ने कहा, यह निर्भर करता है.

किसने तय किया राहुल का नाम?

इसके बाद सवाल था कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, तब क्या आप प्रधानमंत्री बनेंगे? इसपर उन्होंने कहा, क्यों नहीं?

राहुल के इस जवाब में पेच है. वे कह सकते थे कि यह तो संसदीय दल तय करेगा. और यदि सरकार गठबंधन की बनेगी तो राहुल तय भी कैसे कर सकते हैं?

अभी यह भी तय नहीं है कि उसके सहयोगी दल कौन से हैं. तो क्या इसे 'सूत न कपास' वाला मामला मानें?

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि एनडीए के खिलाफ विरोधी दलों का एक गठबंधन बनने वाला है या दो गठबंधन बनेंगे?

इस लिहाज से यह बयान अपरिपक्व है. सम्भव है कि इसपर कुछ दलों की प्रतिक्रिया भी आए.

अलबत्ता इस बात की सम्भावना है कि उन्होंने सोच-समझकर उन्होंने बोला हो.

राहुल गांधी अब कोशिश कर रहे हैं कि वे नरेन्द्र मोदी के मुक़ाबले में खड़े नज़र आएं.

घोषणा की जरूरत भी क्या है?

बातें कयासों और चिमगोइयों पर आधारित हैं, पर उनके निहितार्थ वास्तविक हैं.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

एक बड़ा सच है कि पिछले चार-पाँच दशक में हमारी राजनीति अनिश्चय के हिंडोलों पर सवार रही है, और नेता अचानक प्रकट हुए हैं.

राहुल गांधी यदि खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर रहे हैं, तो यह घोषणा पार्टी के लिए नहीं वोटर के लिए है.

कांग्रेस पार्टी का चलन प्रधानमंत्री घोषित करने का नहीं है.

उसकी जरूरत भी नहीं रही, क्योंकि नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के नेतृत्व में जब चुनाव लड़े गए, तब घोषणा की जरूरत नहीं थी.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

अलबत्ता 2009 में जरूर पार्टी ने मनमोहन सिंह को नेता घोषित किया था, जिसकी तब जरूरत थी.

अटल बिहारी के रहते बीजेपी को इसकी जरूरत नहीं पड़ी, पर नरेन्द्र मोदी ने पार्टी के भीतर लड़ाई लड़ते हुए अपने आपको प्रत्याशी घोषित करवाया.

लेकिन जबतक पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी घोषित नहीं किया, मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी नहीं बताया.

बेशक 2014 में वे पवन वेग से प्रधानमंत्री बने, पर चुनाव के छह महीने पहले तक कयास थे कि बीजेपी जीतेगी भी या नहीं.

क्षेत्रीय क्षत्रपों की मनोकामनाएं

ये कयास अब भी हैं. 2019 के चुनाव में भी कई तरह के 'किंग' और 'किंग मेकर' साइड-लाइन में बैठे इंतज़ार करेंगे कि शायद अपना मौका भी आए.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

यह हमारी राजनीति का नया यथार्थ है. तमाम राजनेताओं के पास प्रधानमंत्री बनने के 'वैलिड' कारण होते हैं.

त्रिशंकु संसद की सम्भावनाओं ने क्षेत्रीय क्षत्रपों के इस विश्वास को बल प्रदान किया है.

सन 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की जबर्दस्त जीत के बावजूद मुलायम सिंह मुख्यमंत्री नहीं बने.

उन्हें लगा था कि शायद दिल्ली में ज्यादा बड़ी सेवा करने का मौका मिले.

मुलायम सिंह को वह मौका नहीं मिला, पर राहुल गांधी के अलावा राष्ट्रीय राजनीति में कम से कम आधा दर्जन नेता अब भी ऐसे हैं, जिनके भीतर प्रधानमंत्री बनने की मनोकामना छिपी हो सकती है.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

शरद पवार, ममता बनर्जी, मायावती, नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के पास अनुभव है और वह राजनीतिक आधार भी, जो कुर्सी दिलाने में सहायक हो सकता है.

महत्वपूर्ण होंगे हालात

महत्वपूर्ण हैं वे परिस्थितियाँ, जो नेतृत्व की कुर्सी तक ले जाती हैं. ऐसे हालात किसी भी चुनाव में बन सकते हैं.

ज्यादातर मौकों पर हमारे राष्ट्रीय नेता किसी खास परिस्थिति में उभरे हैं.

राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Getty Images

सन 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और उनके फौरन बाद इंदिरा गांधी, 1984 में राजीव गांधी, 1989 में वीपी सिंह, 1991 में पीवी नरसिंहराव और उनके बाद एचडी देवेगौडा और इंद्र कुमार गुजराल विपरीत परिस्थितियों में उभरे थे.

मनमोहन सिंह के पहली बार प्रधानमंत्री बनने का अनुमान किसे था?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)