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समुद्र में जहाज़ों को रास्ता दिखाती है ये लड़की
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समुद्र की लहरों से टकराते हुए जहाज़ को वो पानी में रास्ता दिखाती हैं. समुद्र के बीच संकरे, गहरे, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से वह जहाज़ को निकालकर ले जाती हैं.
हालांकि, वो जहाज़ नहीं चलातीं पर जहाज़ उनके इशारे पर ज़रूर चलता है. ये हैं रेशमा नीलोफर नाहा जो भारत की पहली मरीन पायलट हैं.
रेशमा जहाज़ों को बंदरगाह तक पहुंचाने और फिर समुद्र तक ले जाने का हुनर बखूबी जानती हैं. उनकी पानी में रास्तों से दोस्ती हो चुकी है और मौसम के मिजाज को बारीकी से समझती हैं.
कौन होता है मरीन पायलट
पायलट शब्द से आमतौर पर जहन में हवाई जहाज़ उड़ाने वाले किसी शख़्स की तस्वीर उभर आती है. लेकिन, मरीन पायलट बिल्कुल अलग होता है.
मरीन पायलट बंदरगाह से लेकर समुद्र की एक खास सीमा तक हर रास्ते, स्थितियों और खतरों की जानकारी रखता है.
उसके बिना किसी जहाज़ का बंदरगाह तक पहुंच पाना मुश्किल हो सकता है. ये मालवाहक जहाज़ों को बंदरगाह पर लंगर डालने और वहां से समुद्र में बंदरगाह की सीमा तक छोड़ने का काम करता है.
रेशमा कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर मरीन पायलट के तौर पर काम करती हैं. वह यहां छह साल से अधिक समय से हैं. वह इस साल ट्रेनिंग पूरी करके मरीन पायलट बन गई हैं.
अपने काम के बारे में रेशमा कहती हैं, ''पहली मरीन पायलट होने से खुशी भी होती है और ये काफी चुनौती भरा भी लगता है. मैं यहां कई सालों से प्रशिक्षण ले रही हूं और अपने काम से वाकिफ भी हूं लेकिन जब पूरा जहाज़ आपके भरोसे आगे बढ़ता है तो ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती हैं.''
''एक तरह से जहाज़ में मौजूद लोगों और पूरे सामान को सही सलामत पहुंचाना आपका काम होता है. रास्ते या मौसम को लेकर एक गलत फैसला बहुत बड़ा नुकसान कर सकता है.''
जहाज़ को कैसे रास्तों से गुजरना पड़ता है इसके बारे में रेशमा कहती हैं कि हर बंदरगाह की भौगोलिक स्थितियां अलग-अलग होती हैं. कहीं पर बंदरगाह तक आते-आते समुद्र नदी में बदल जाता है और रास्ते संकरे हो जाते हैं. कहीं पर पानी ज़्यादा तो कहीं कम हो जाता है.
कई बार पानी का प्रवाह बहुत बढ़ जाता है. ऐसे में छोटे जहाज़ों को संभालना बहुत मुश्किल होता है. हर जहाज़ के बारे में भी आपको पता नहीं होता है. जहाज़ के कप्तान को समुद्र की जानकारी तो होती है लेकिन उसे हर बंदरगाह की जानकारी नहीं होती. इसलिए वो भी मरीन पायलट पर निर्भर करते हैं.
रेशमा कहती हैं कि कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर हुगली नदी की स्थितियां भी मुश्किल भरी हैं. यह नदी सागर द्वीप पर समुद्र से मिलती है.
वह बताती हैं कि उन्हें बंदरगाह से सागर द्वीप तक जहाज़ के साथ सफर करना होता है जो करीब 150 नॉटिकल माइल्स (करीब 300 किमी.) का रास्ता है. हुगली नदी पर पानी का प्रवाह बहुत तेज़ होता है. कई बार तो छोटे इंजन वाले जहाज़ों को पानी उल्टी दिशा में बहा ले जाता है.
इस बंदरगाह पर नेवी, कोस्ट गार्ड के जहाज़, कार्गो और निजी कंपनियों के मालवाहक जहाज़ आते-जाते रहते हैं.
काम का समय तय नहीं
रेशमा बाती हैं, ''ये काम इसलिए भी कठिनाई भरा है क्योंकि बंदरगाह से निकलने का कोई तय समय नहीं होता. जहाज़ के आने के बाद हमें मौसम और नदी के प्रवाह को देखना पड़ता है.''
''कभी दोपहर के दो बजे निकलते हैं तो कभी रात के दो बजे. फिर 8-10 घंटे या पूरा दिन भी जहाज़ में रहना होता है. अगर बंदरगाह की सीमा तक पहुंचते हुए रात हो गई तो वहां बने स्टेशंस पर रुकते हैं और यार्ड्स के जरिये वापस आते हैं.''
एक मरीन पायलट का काम बंदरगाह और जहाज़ दोनों पर होता है. कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर रेशमा को दो दिन लगातार काम करना होता है और फिर दो दिन छुट्टी होती है. इसी तरह उनकी शिफ्ट लगती है.
मरीन पायलट मर्चेंट नेवी का हिस्सा है. रेशमा जहाज़रानी मंत्रालय के तहत कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर स्थायी तौर पर नियुक्त हैं.
सेलर से लेकर मरीन पायलट
रेशमा चेन्नई की रहने वाली हैं. उन्होंने बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची से संबद्ध एक संस्थान से बीई मरीन टेक्नोलॉजी की डिग्री ली है.
इसके बाद रेशमा ने एक कंटेनर शिप्स कंपनी 'मर्स्क' में दो साल काम किया और सेलर सेकेंड ऑफिसर का लाइसेंस लिया. फिर कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट पर मरीन पायलट के लिए आवेदन किया.
मरीन पायलट बनने के लिए क्या योग्यता ज़रूरी है इस पर रेशमा बताती हैं, ''आपके पास सेलर सेकेंड ग्रेड के ऑफिसर का लाइसेंस होना चाहिए. पहले जहाज़ के कप्तानों को इस पद पर नियुक्ति दी जाती थी लेकिन कप्तानों के इसमें न आने से मरीन पायलट की काफी कमी हो गई.''
''इसके बाद सेलर को भी इस पद पर नियुक्त किया जाने लगा. दरअसल, मरीन पायलट के लिए एक लंबी ट्रेनिंग होती है और अमूमन कप्तान रहने के बाद लोग ये ट्रेनिंग लेना पसंद नहीं करते.''
वो कहती हैं कि भारतीय नौसेना और मर्चेंट नेवी में महिलाओं की बहुत कमी है. अब धीरे-धीरे वो आगे बढ़ रही हैं. लेकिन, यहां आने के लिए उन्हें शारीरिक मज़बूती के अलावा मानसिक मजबूती की भी सख़्त ज़रूरत है. महिलाओं को लेकर क्षेत्र में अभी स्वीकार्यता नहीं है इसिलए उन्हें मानसिक तौर पर तैयार रहना चाहिए.
रेशमा की शादी हो चुकी है और वो अपने परिवार के साथ कोलकाता में ही रहती हैं. उनके पति मरीन इंजीनियर हैं. वह कहती हैं, ''मैं उस तरह घर नहीं देख पाती जैसे सामान्य तौर पर बहुओं से उम्मीद होती है लेकिन इससे मेरे परिवार को कोई समस्या नहीं. अगर घर में आपसी समझ हो तो महिलाओं को आगे बढ़ने में दिक्कत नहीं आएगी.''
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