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BBC SPECIAL: ग्वालियर की पिस्तौल वाली वायरल तस्वीर का पूरा सच ये है
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) से
राजा चौहान को 'क्रिकेट, गिटार और डांस का शौक था'और हथियारों का भी.
उनके आख़िरी शौक ने उनके लिए फ़िलहाल दिक्कतें पैदा कर दी हैं. कुछ लोग टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर बार-बार दिखाई जा रही है.
इस तस्वीर को कई लोगों ने हिंसक दलित प्रदर्शनकारी बताते हुए शेयर किया था.
दो अप्रैल को हुई हिंसा के मद्देनज़र ग्वालियर में जो 40 एफ़आईआर दर्ज हुई हैं उनमें एक राजा चौहान के ख़िलाफ़ भी है.
पुलिस अधीक्षक डॉक्टर आशीष के मुताबिक़, उनके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है, 308 का मतलब है कि ग़ैर-इरादतन हत्या का प्रयास.
राजा चौहान अभी पुलिस की गिरफ़्त से फ़रार हैं.
परिजनों ने लगाया साज़िश का आरोप
एक केस बॉबी तोमर नाम के दूसरे सवर्ण युवक पर भी दर्ज हुआ है. यह मुक़दमा 22 साल के दलित युवक दीपक की हत्या का है.
दीपक की मौत दो अप्रैल को गोली लगने से हो गई थी.
बॉबी तोमर के चचेरे भाई राजेश सिंह तोमर, अपने भतीजे के ख़िलाफ़ हुए एफ़आईआर के पीछे राजनीति बताते हैं क्योंकि 'स्थानीय चुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार का साथ दिया था.'
पिछली तीन पीढ़ियों से गांधी रोड के एक किनारे पर रहने वाले लगभग 450 सदस्यों वाले कुनबे के सभी लोग बड़ी-सी तोमर बिल्डिंग के अहाते में रहते हैं और होटल और कंसट्रक्शन के कारोबार में लगे हुए हैं.
जिन दो दलितों की दो अप्रैल की हिंसा में मौत हुई है, वो भी पास के ही गल्लाकोटार और कुम्हारपुरा में रहते थे. तोमर बिल्डिंग के बिल्कुल रोड के दूसरी ओर है चौहान पियाऊ जो राजा चौहान का घर है.
राजा चौहान के पिता सुरेंद्र चौहान कहते हैं कि दो अप्रैल को उनका बेटा ग्वालियर में मौजूद ही नहीं था.
सुरेंद्र सिंह चौहान कहते हैं, "मेरे बेटे ने बीई किया है और 'स्किल इंडिया' का काम करता है जिसके सिलसिले में वो कुछ दिनों से बाहर था."
अब बात तमंचे वाली तस्वीर की, सुरेंद्र सिंह चौहान मानते हैं कि तस्वीर उनके बेटे की ही है, लेकिन वे बताते हैं कि ये तस्वीर पुरानी है, उस दिन की नहीं है जिस दिन ग्वालियर में हिंसा भड़की.
'आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी'
राजा के ताऊ नरेंद्र सिंह चौहान कुछ और ही बताते हैं, वे फ़ायरिंग की बात को स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि 'राजा फ़ायरिंग में मौजूद नहीं था.'
घनी सफ़ेद नोकदार मूंछों वाले बॉर्डर सिक्यॉरिटी फ़ोर्स से रिटायर हो चुके नरेंद्र सिंह चौहान का दावा है कि 'उस दिन मुँह पर कपड़े से लपेटे, कट्टे (देसी पिस्तौल) और लाठियां लिए लोग उनकी तरफ़ से (दलितों की ओर से) प्रदर्शन में शामिल थे और लोगों के साथ मार-पीट और तोड़-फोड़ कर रहे थे.'
वो कहते हैं, "जब उस तरफ़ से गोलियां चलीं तो हमें आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी."
ग्वालियर स्थित जीवाजी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र विभाग के प्रमुख एपी चौहान कहते हैं कि दलितों के प्रदर्शन के दौरान किसी तरह के हथियार होने की बात कहना सरासर ग़लत है.
एपी सिंह के मुताबिक़, कुछ लोगों ने जबरन इस पूरे बंद को काउंटर करने की कोशिश की जिसके बाद वही हुआ जो भीड़ में होता है और हिंसा की शुरुआत हुई.
हिंसा में मारे गए दलित युवक दीपक के भाई राजन का कहना है कि जब उधर से गोलियां चलने लगीं तो हमें बचाव में पत्थर फेंकने पड़े.
दलित कार्यकर्ता सुधीर मण्डेलिया का कहना है कि 'दो अप्रैल को हुए प्रदर्शनों को कुछ लोगों ने जातीय हिंसा की शक्ल देने की पूरी कोशिश की और इसकी तैयारी योजनाबद्ध तरीक़े से की गई थी.'
कल पास के ज़िले भिंड में सवर्ण समाज से जुड़े लोगों ने दो अप्रैल को दलितों की रैली के विरोध में प्रदर्शन निकालने की कोशिश की.
उस दौरान सूबे के मंत्री लाल सिंह आर्य के घर पर पथराव भी किया गया.
कुछ लोग सोशल मीडिया के ज़रिए ये बात फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि दलितों ने विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसक हमले किए, लेकिन प्रदेश में दलित हिंसा में मारे गए सात में से छह लोग दलित हैं.