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क्या एकजुट विपक्ष नरेंद्र मोदी के किले को भेद पाएगा?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2019 के आम चुनाव में अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली ताकतवर बीजेपी का सामना करने के लिए कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दलों ने एक साथ आने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं.
सोनिया गांधी ने हाल ही में तमाम क्षेत्रीय विपक्षी दलों के नेताओं को डिनर पार्टी पर बुलाया था जिनमें शरद पवार, रामगोपाल यादव, सतीश चंद्र मिश्रा, जीतनराम मांझी और बाबूलाल मरांडी जैसे तमाम नेता शामिल हुए थे.
सोनिया गांधी के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने स्तर पर तमाम विपक्षी दलों से चर्चाओं का दौर शुरू किया है.
ममता बनर्जी ने मंगलवार को कई क्षेत्रीय दलों से मुलाकात की है और वह जल्द ही कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से मिलने वाली हैं.
लेकिन भारतीय राजनीति में इस तरह बनने वाले तमाम महागठबंधनों के कई उदाहरण हैं. एक वक़्त में कांग्रेस का देश की राजनीति में वो क़द हुआ करता था जो आज भाजपा का है. और तब कांग्रेस का विरोध करने के लिए सभी विपक्षी दलों ने जनता पार्टी का गठन किया था.
लेकिन आख़िर में ये गठबंधन भी सफल नहीं हो सका. और तब से लेकर आज तक इस तरह एकजुट विपक्ष बनने की ये प्रक्रियाएं असफल होती दिखाई दी हैं.
वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी इस मुद्दे पर बताते हैं, "ये जो गठबंधन बनाने की बात हो रही है, ये अंकगणित के आधार पर हो रही है कि बीजेपी के इस समय 31 फ़ीसदी वोट हैं. लोकसभा चुनाव में भी 31 फ़ीसदी वोट बीजेपी को मिले थे तो बाकी 69 फ़ीसदी वोट गैर-बीजेपी वोट हैं. ऐसे में इन सारे वोटों को एक साथ ले आया जाए तो बीजेपी को आसानी से हराया जा सकता है."
"इसके लिए गोरखपुर और फूलपूर उपचुनाव का उदाहरण दिया जा रहा है. लेकिन किसी उपचुनाव से लोकसभा चुनाव की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि दोनों में मुद्दे अलग होते हैं. अगर इसी गणितीय चुनावी गठबंधन से चुनावी नतीजे आते तो बीजेपी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हार जाना चाहिए था. लेकिन हुआ ये कि सपा और कांग्रेस दोनों का ही वोट प्रतिशत घट गया. इसके बाद दोनों पार्टियों में ये रेट्रोस्पेक्शन किया गया कि अगर गठबंधन न होता तो उनको शायद बेहतर सीटें मिलतीं."
"इससे पहले जब कांग्रेस पूरे देश में राज करती थी तब कांग्रेस हटाओ के नारे के तहत समाजवादी खेमा, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी समेत कई दल गठबंधन बनाते थे. फिर 1970 में जनता पार्टी की सरकार बनी. लेकिन इस जीत का कारण गठबंधन से ज़्यादा कांग्रेस के ख़िलाफ़ लोगों का विरोध था जिसकी वजह से लोगों ने विपक्ष को वोट दिया.
"इसकी वजह ये होती है कि शुरुआत उन मुद्दों से होती है जिन पर सबकी सहमति बन सके. इसके बाद धीरे धीरे बड़े मुद्दों की ओर बढ़ा जाता है. ऐसे में होता ये है कि जब तक केंद्रीय सवाल सामने आते हैं तब तक गठबंधनों में तमाम दरारें आ जाती हैं और ये दरारें सीटों के बंटवारे के रूप में सामने आ जाती हैं."
2019 में कौन-सी कमियां झेलेगा विपक्ष
देश के तमाम विपक्षी दल इस समय 'फ़ासीवाद' से लेकर सांप्रदायिकता से लड़ने की बात कह रहे हैं. इस मुद्दे पर सभी दलों में आपसी सहमति दिखाई भी दे रही है.
लेकिन क्या इस सहमति के साथ विपक्ष पूरी ताकत के साथ बीजेपी का सामना करने में सक्षम होगा.
नक़वी बताते हैं, "बीजेपी के ख़िलाफ़ जिस विपक्ष को बनाने की कोशिशें हो रही हैं उसे तीन कमज़ोरियों का सामना करना पड़ेगा. इनमें से पहली कमज़ोरी है एक ऐसे नेता की कमी जिसे पूरा विपक्ष अपना नेता मानने के लिए तैयार हो और जिसे देश भी स्वीकार करे.
"दूसरी कमज़ोरी ये है कि विपक्ष के पास कोई कार्यक्रम नहीं है जिसे वह देश के सामने पेश कर सके. नोटबंदी से लेकर जीएसटी पर सरकार की फ़जीहत होने के बाद भी विपक्ष देश के सामने कोई कार्यक्रम पेश नहीं कर सका. इसके साथ ही तीसरी कमज़ोरी विपक्षी पार्टियों के काडर से जुड़ी हुई है. बीते समय में सभी विपक्षी पार्टियों का काडर कमज़ोर ही हुआ है. वहीं, बीजेपी के पास के मजबूत काडर है."
क्या राहुल गांधी के चलते विपक्ष में पड़ेगी दरार?
इस तरह बनने वाले विपक्ष के साथ एक सवाल भी उठता है कि इसका नेता कौन होगा.
कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी भले ही औपचारिक रूप से अध्यक्ष हों, लेकिन गठबंधन से जुड़ी चर्चाएं सोनिया गांधी ही कर रही हैं.
सोनिया गांधी ने ही हाल ही में डिनर पार्टी का आयोजन किया था. इसके साथ ही विपक्षी दलों को साथ लाने में राहुल गांधी को सक्रिय भूमिका निभाते नहीं देखा जा रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विपक्ष राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने में दिक्कत महसूस कर रहा है?
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार स्मिता गुप्ता बताती हैं, "कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी बन चुके हैं, लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों में उनके प्रति ज़्यादा उत्साह नहीं है. इस समय सबके सामने एक विवशता है कि एकजुट होकर लड़ा जाए नहीं तो सब ख़त्म हो जाएंगे. लेकिन इसका असर क्या होगा, ये आने वाले दिन ही बताएंगे. कांग्रेस में एक तरह से काम का विभाजन हो चुका है कि गठबंधन से जुड़ी चर्चाएं सोनिया गांधी ही करेंगी. कांग्रेस के प्लेनरी सेशन में भी राहुल गांधी ने अपने भाषण में गठबंधन पर बात नहीं की."
महागठबंधन में राहुल गांधी के नेतृत्व पर अभी भी सवाल बना हुआ है और ये सवाल कर्नाटक चुनाव में उनके प्रदर्शन से भी जुड़ा है.
स्मिता गुप्ता बताती हैं, "राजनीतिक हल्कों में ऐसा नहीं है कि लोग राहुल को पसंद नहीं करते हैं. वो ये मानते हैं कि राहुल काबिल नहीं हैं. राहुल अगर आने वाले दिनों में अपने नेतृत्व का असर दिखा पाए तो उनका कद अपने आप बढ़ जाएगा. ऐसे में राहुल के लिए कर्नाटक का चुनाव बेहद अहम है."
क्या तीसरे मोर्चे से होगा बीजेपी को फ़ायदा
बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट विपक्ष बनाने की तैयारियों के बीच विपक्ष की वो दरारें भी सामने आ रही हैं जिनसे तीसरा मोर्चा निकल सकता है.
इनमें कुछ क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ अनमने ढंग से जुड़ना भी शामिल है.
स्मिता गुप्ता बताती हैं, "क्षेत्रीय पार्टियों के सामने एक समस्या है. तृणमूल और एनसीपी को छोड़ दिया जाए तो केसीआर को देख लीजिए. प्रदेश में केसीआर का मुख्य विपक्ष कांग्रेस है. ऐसे में उन्हें दिक्कत तो होती है. यदि कांग्रेस का किसी भी स्टेट में किसी के साथ गठबंधन न हो तो बीजेपी को इसका बड़ा फ़ायदा मिला. मान लीजिए कि अगर महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी साथ चुनाव न लड़कर अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो ये बीजेपी के लिए हितकारी होगा. वहीं, यूपी के मामले में ऐसा नहीं है."
ऐसे में जैसे-जैसे 2019 में होने वाले आम चुनाव नज़दीक आएंगे वैसे-वैसे विपक्षी सरगर्मियां तेज़ होती जाएंगे.
लेकिन बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए इस महागठबंधन को तमाम तरह के राजनीतिक लिटमस टेस्ट से गुज़रना होगा.
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