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क्या केरल की हार का बदला त्रिपुरा में ले पाएगी बीजेपी?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, अगरतला से, बीबीसी हिंदी के लिए
देश के पूर्वोत्तर राज्यों त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में हुए विधानसभा चुनाव के मतों की गिनती शुरू हो गई है.
त्रिपुरा का राजनीतिक माहौल कुछ ज्यादा ही गर्म है. यहां चर्चा है कि बीजेपी केरल में अपनी हार का बदला त्रिपुरा में जीत कर पूरा करना चाहती है. लिहाजा बीजेपी के तमाम शीर्ष नेताओं ने अपनी पूरी ताकत इस छोटे से राज्य में झोंक रखी हैं.
चूंकि अगले साल देश में लोकसभा चुनाव होने हैं लिहाजा इन तीन राज्यों के चुनावी परिणाम का असर देश की राजनीति पर पड़ना तय है.
ऐसे में सबसे ज्यादा नज़रें त्रिपुरा पर टिकी हैं, जहां पिछले 25 सालों से वाम दलों का शासन है. केरल के अलावा लेफ्ट की सरकार बस इसी राज्य में है. अगर त्रिपुरा में वामपंथियों की हार होती है तो उनके लिए यहां एक युग का अंत हो जाएगा.
बीजेपी को जीत का अनुमान
तमाम एग्जिट पोल में बीजेपी की जीत का अनुमान जताया गया है लेकिन सीपीएम के वरिष्ठ नेता पवित्र कर ऐसे एग्जिट पोल को फर्जी बताते हैं.
कर ने बीबीसी से कहा कि 'ये सबकुछ पेड होता है. फर्जी होता है. हमें त्रिपुरा से सही जानकारी आ रही है. हम लोग एक बार फिर सत्ता में वापसी कर रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. राज्य में यही माहौल है.'
सीपीएम नेता ने सीट कितनी मिलेंगी के सवाल पर कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा, 'साल 1978 से लेकर अबतक 50 फ़ीसदी से अधिक वोट शेयर हमारी पार्टी का रहा है. लिहाजा हम निश्चित रूप से सत्ता में वापसी कर रहे हैं.'
लेकिन राजधानी अगरतला में ज़्यादातर लोगों के मुंह से सरकार बदलने की चर्चा सुनाई पड़ रही है.
मंत्रीबाड़ी इलाके के एचजीबी रोड पर घड़ी की दुकान चलाने वाले उत्तम बनिक ने कहा, ''सीपीएम के शासन को 25 साल हो गए हैं. हम लोग ऊब गए हैं. अब त्रिपुरा में नई सरकार को आना चाहिए. माणिक सरकार के शासन में घोटाले भी होने लग गए हैं. अब बीजेपी को मौका मिलना चाहिए.''
वहीं त्रिपुरा में बीजेपी के प्रभारी सुनिल देवधर दावा करते है कि उनकी पार्टी राज्य में दो-तिहाई बहुमत से जीत हासिल करेगी.
देवधर ने कहा, ''शुरुआत में मुझे लगता था कि हम 35 से 38 सीटों पर जीत हासिल करेंगे लेकिन तीन-चार दिन बीतने के बाद पूरे राज्य से मूल्यांकन आया. बूथ वाइज जो हमने 60 मतदाताओं पर एक कैडर रखा था और उनसे हमें जो जानकारी मिली है उसके अनुसार हमें कोई संदेह नहीं है कि कम से कम हम 40 सीटें जीत रहे हैं.''
त्रिपुरा इतना महत्वपूर्ण क्यों?
दो लोकसभा सीटों वाले त्रिपुरा का राष्ट्रीय राजनीति में इतना क्या महत्व है कि पीएम मोदी से लेकर तमाम नेता यहां चुनावी प्रचार करने पहुंचे थे?
इस सवाल का जवाब देते हुए देवधर कहते हैं, ''हमारे लिए एक राजनीतिक चुनाव है, लेकिन यहां एक नीतिगत लड़ाई भी है. कांग्रेस के साथ लड़ना एक अलग बात है और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ लड़ना अलग. ये लोग देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं. जेएनयू से लेकर केरल तक ये लोग जहां भी रहेंगे ना विकास का काम करेंगे ना किसी को करने देंगे. इसलिए इनको इनके ही राज्य में सबक सिखाना बहुत बड़ी चुनौती थी. लिहाजा ये केवल सीटें जीतने की बात नहीं हैं. देश के इतिहास में वामपंथी और दक्षिणपंथी पहली बार आमने सामने राज्य स्तर के चुनाव लड़ रहे हैं.'
राज्य के वरिष्ठ पत्रकार जयंत भट्टाचार्य को लगता है कि सीपीएम और बीजेपी दोनों के बीच में कांटे की टक्कर हैं.
पत्रकार भट्टाचार्य कहते हैं, ''बीजेपी प्रदेश में इतनी ताकतवार कभी नहीं थी. पिछले चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर एक फ़ीसदी से भी कम था लेकिन बीजेपी ने उन तमाम चीजों पर काम किया जो उनको सत्ता तक ले जा सकती हैं.''
वे आगे कहते हैं, ''ज़मीनी स्तर पर खासकर आदिवासी इलाकों में आरएसएस के लोगों ने काम किया. कांग्रेस से 6 विधायकों को तोड़कर पार्टी में शामिल कर लिया. ऐसे में सीपीएम के भी काफी समर्थक बीजेपी की तरफ सरक गए. माणिक सरकार को सत्ता में दो दशक से भी अधिक समय हो चुका है लिहाजा एंटी इंकम्बेंसी फ़ैक्टर भी हैं. इस समय बीजेपी काफी मजबूत है और चुनाव नतीजे कुछ भी हो सकते हैं.''
वो कहते हैं कि माणिक सरकार ने निचले स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार को गंभीरता से नहीं लिया और वाम मोर्चे की सरकार से ऐसी कई ग़लतियां हुई हैं. लिहाजा इस चुनाव को एक तरफा नहीं कह सकते.
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