पूर्वोत्तर में 'कांग्रेस का अंत' करने में लगे हिमंत

    • Author, रविशंकर रवि
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

असम में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आती है. अरुणाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पेमा खांडु समेत 33 विधायक कांग्रेस छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल में शामिल होते हैं.

फिर ये लोग भाजपा में शामिल हो जाते हैं और अरुणाचल में भाजपा सरकार बनती है. मणिपुर में अल्पमत में होने के बावजूद भाजपा आज गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही है.

ये सारी 'सियासी उपलब्धियां' डॉक्टर हिमंत बिस्वा सरमा के नाम हैं. उन्होंने ये साबित कर दिया है कि पूर्वोत्तर की राजनीति की नब्ज़ उनकी पकड़ में आ चुकी है.

कांग्रेस उन्हें राजनीति में लेकर आई और वहीं पर हिमंत बिस्वा सरमा ने जोड़तोड़ और जुगाड़ की राजनीति का प्रशिक्षण लिया लेकिन अब वे पूर्वोत्तर में कांग्रेस का ही बड़ा नुक़सान कर रहे हैं.

वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान की तरह पूर्वोत्तर को कांग्रेस से मुक्त करने के अभियान पर हैं और कांग्रेस के क़िले पर एक के बाद एक फ़तह करते जा रहे हैं.

अब उनका अगला निशाना मेघालय है, जहां पर अगले साल चुनाव हैं. उनकी रणनीति और सफलता को देखकर अब तो उन्हें 'पूर्वोत्तर का अमित शाह' माना जा रहा है.

असम में भाजपा को जीत दिलाने में उनकी अहम भूमिका को देखते हुए उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) का संयोजक उसी दिन बना दिया गया, जिस दिन सोनोवाल सरकार ने शपथ ली थी.

उसके बाद से हिमंत भाजपा के अश्‍वमेध यज्ञ के घोड़े पर सवार होकर पूर्वोत्तर विजय की कामना पर निकल पड़े और एक के बाद एक राज्य पर भाजपा का राज क़ायम करते जा रहे हैं.

जोड़तोड़ की रणनीति में माहिर

60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में भाजपा को मात्र 21 सीटें मिलीं. सरकार बनाने की रणनीति हिमंत ने पहले से बना ली थी और छोटी पार्टियों के संपर्क में थे.

वे नगा पीपुल्स पार्टी (एनपीएफ़) और नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के संपर्क में चुनाव के दौरान से थे.

क्योंकि उन्होंने भांप लिया था कि नगा संगठन किसी भी हाल में निर्वतमान मुख्यमंत्री इबोबी सिंह का समर्थन नहीं कर सकते हैं, जबकि एनपीपी नेता और सांसद कर्नाड संगमा काफ़ी दिनों से उनके संपर्क में थे.

कर्नाड पूर्व लोकसभा स्पीकर पीए संगमा के पुत्र तथा मेघालय के तुरा से सांसद हैं. अरुणाचल प्रदेश में भी उन्होंने कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों की मदद की.

और जब पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल से मुख्यमंत्री पेमा खांडु को निकाल दिया तो इन्होंने पेमा खांडु को भाजपा में शामिल करवाकर सरकार बनाने का प्रस्ताव दिया.

हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस में रहते हुए असम से राज्यसभा के चुनाव में कई बार भाजपा समेत दूसरे दलों के विधायकों को कांग्रेस के पक्ष में मतदान करवाने को राज़ी कर लिया था.

पर्याप्त विधायक नहीं होने के बाद भी कांग्रेस के उम्मीदवार राज्यसभा के लिए जीतते रहे.

स्कूली जीवन से प्रखर वक्ता

हिमंत बिस्वा सरमा कई वर्षों तक कॉटन कॉलेज छात्र संघ के महासचिव थे.

उनके कॉलेज के दिनों के मित्र और गुवाहाटी विश्‍वविद्यालय के सीनियर लेक्चरर ननीगोपाल महंत कहते हैं, "हिमंत स्कूल-कॉलेज के ज़माने से अच्छे वक्ता हैं. वे एक अच्छे संगठक और रणनीतिकार हैं. योजना बनाने के बाद उसे ज़मीन पर उतारने की रणनीति उनसे सीखनी चाहिए. अपने कॉलेज के छात्र नेता के रूप में वे काफ़ी लोकप्रिय रहे. लिखने-पढ़ने में भी गहरी रुचि है. अभी वे जब मौक़ा मिलता है, लिखते हैं."

राजनीति में रहते हुए उन्होंने गुवाहाटी विश्‍वविद्यालय से पीएचडी किया. हाल ही में उनके राजनीतिक अनुभव पर आधारित असमिया पुस्तक 'अनन्य दृष्टिकोण' आई जिसके कई संस्करण बिक चुके हैं.

46 वर्षीय डॉक्टर सरमा ने एमए और लॉ करने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट में कुछ वर्षों तक प्रैक्टिस भी की. उनका यह अनुभव आज उनकी राजनीति में काम आ रहा है.

हितेश्‍वर सैकिया राजनीति में लेकर आए

उनकी सक्रियता और कर्मठता को तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व हितेश्‍वर सैकिया ने परख लिया. सैकिया उन्हें कांग्रेस में लेकर आ गए और असम आंदोलन के दूसरे शीर्ष नेता भृगु फूकन के ख़िलाफ़ 1996 में जालुकबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से कॉग्रेस का टिकट दिया.

पहली बार वे चुनाव हार गए, लेकिन 2001 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भृगु फूकन जैसे दिग्गज नेता को हरा दिया. इसके बाद हिमंत को असम की राजनीति में एक नई पहचान मिली. उसके बाद वे हमेशा जालुकबाड़ी से जीतते रहे. इस बार वे चौथी बार विधायक बने हैं.

उनकी पत्नी रिनिकी भूयां सरमा न्यूज़ चैनल और एक असमिया अख़बार की सीएमडी हैं और वही उनकी विधानसभा के अधिकतर काम देखती हैं. हिमंत सरमा अपने क्षेत्र में काफ़ी लोकप्रिय हैं और यही वजह है कि वो बिना अपने क्षेत्र में प्रचार किए ही चुनाव जीत गए थे.

कभी तरुण गोगोई के आंखों के तारे थे

आज भले ही पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और हिमंत बिस्वा सरमा एक-दूसरे को देखना तक नहीं चाहते, लेकिन कभी वे तरुण गोगोई की आंखों के तारे थे. गोगोई ने ही उन्हें जून 2002 में कृषि तथा योजना व विकास राज्यमंत्री के रूप में अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया था. इसके बाद सितंबर 2004 में उन्हें वित्त, योजना व विकास, गुवाहाटी विकास विभाग के राज्यमंत्री की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई.

तरुण गोगोई जब दूसरी बार 2006 में मुख्यमंत्री बने तो हेमंत को कैबिनेट मंत्री बना दिया और कई अहम विभागों की ज़िम्मेदारी सौंप दी. वे धीरे-धीरे गोगोई के दाहिने हाथ बन गए थे.

उन्हें असम का शैडो सीएम कहा जाने लगा. उन्हें अपनी राजनीतिक क्षमता और प्रशासनिक क्षमता दिखाने का स्वतंत्र अवसर मिल गया था. उन्होंने बोडोलैंड पीपुल्स पार्टी को सरकार का साझीदार बनाकर सरकार को स्थिर बनाने में योगदान किया.

2011 में कांग्रेस के विधानसभा चुनाव प्रचार प्रबंधन की ज़िम्मेदारी पूरी तरह हिमंत के पास थी. 2011 में गोगोई तीसरी बार मुख्यमंत्री बने.

गोगोई के तीसरे कार्यकाल में हिमंत सबसे ताक़तवर मंत्री थे. मुख्यमंत्री गोगोई से अनबन होने के बाद गोगोई ने ख़ुद पत्रकारों से कहा था कि हिमंत पर मैं आंख मूंदकर विश्‍वास करता था. वह मेरी आंखों का तारा ( माई ब्लू आई) था.

लेकिन 2015 आते-आते तरुण गोगोई और हिमंत के बीच अनबन आरंभ हो गई. इसकी एक वजह तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई को राजनीति में मिलता महत्व था. जबकि हिमंत बिस्वा सरमा ख़ुद को अगला दावेदार मानते थे.

इसी दौरान वे भाजपा के संपर्क में आ गए और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. अगस्त, 2015 में उहोंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के घर पर भाजपा की सदस्यता ली.

उन्हें भाजपा में शामिल कराने में प्रदेश भाजपा के तात्कालिक अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य की बड़ी भूमिका थी. सिद्धार्थ भट्टाचार्य कहते हैं कि वह एक बड़ा राजनीतिक फ़ैसला था, लेकिन उन्हें लगा कि कांग्रेस को झटका देने के लिए हिमंत को भाजपा में लाना ज़रूरी है, तभी पार्टी सत्ता तक पहुंच सकती है.

हालांकि उनके इस फ़ैसले पर पार्टी के अंदर भी काफ़ी विरोध हुआ था, लेकिन भट्टाचार्य मानते हैं कि उनका फ़ैसला बिल्कुल सही साबित हुआ. वो कहते हैं, ''आज वे हमारे कोहिनूर हैं.''

असम में भाजपा सरकार के गठन के बाद मैंने उनसे जाना चाहा- अगला लक्ष्य क्या है, उन्होंने जवाब दिया- कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर.

(लेखक पूर्वोत्तर मामले के जानकार और दैनिक पूर्वोदय के संपादक हैं.)

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