राजस्थान में आख़िर कहां चूक गई बीजेपी?

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- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान में लोकसभा की दो और विधानसभा की एक सीट के उपचुनाव में अपनी करारी हार से सत्तारूढ़ बीजेपी परेशान और हैरान है.
क्योंकि राज्य में दस माह बाद विधान सभा चुनाव होने वाले है. इन तीनो ही सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार रिकॉर्ड मतो से जीते हैं.
इन परिणामो से आह्लादित कांग्रेस को लगता है अब राजस्थान में उसका वनवास खत्म होने को है.
उपचुनावो में अलवर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के डॉक्टर कर्ण सिंह यादव ने बीजेपी प्रत्याशी और राज्य में मंत्री डॉक्टर जसवंत यादव को वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी है.
अजमेर से कांग्रेस के रघु शर्मा ने बीजेपी उम्मदीवार रामस्वरूप को पराजित कर दिया.

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बीजेपी का भरोसा
भीलवाड़ा ज़िले की मांडलगढ़ विधान सीट से कांग्रेस के विवेक धाकड़ ने बीजेपी के शक्ति सिंह को पराजित किया.
राज्य बीजेपी अध्यक्षक अशोक परिणामी ने कहा वे इन नतीजों की समीक्षा करेंगे और विधान सभा चुनावो में पूरे दमखम से मैदान में उतरेंगे.
पूर्व मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने कहा, "बीजेपी की उलटी गिनती शुरू हो गई है."
प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सचिन पायलट का कहना है, "बीजेपी के प्रति लोगो में काफी गुस्सा है."
इन चुनावों में बीजेपी को अपने संगठन कौशल, बूथ प्रबंधन, जाति समीकरण, विकास कार्य और हिंदुत्व पर भरोसा था.
लेकिन ये सब बीजेपी के विरुद्ध उमड़े जनरोष को रोक नहीं पाए.

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स्वाभाविक दावेदार
कांग्रेस ने इन चुनावो में नेतृत्व की सामूहिकता और व्यवस्था विरोधी रुझान को अपने हक में मोड़ने पर जोर लगाया. उसे इसका लाभ मिला.
दिल्ली में बैठे पार्टी नेताओ ने प्रादेशिक नेताओं को एकजुटता प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था.
यही वजह थी कि पूर्व मुख्य मंत्री गहलोत, पायलट और पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी तीनों ही सीटों पर उम्मीदवारों का पर्चा दाखिल कराने गए.
अलवर के लिए भंवर जीतेंद्र सिंह और अजमेर के लिए पायलट प्रत्याशी के रूप में पहली पसंद और स्वाभाविक दावेदार थे.
लेकिन जब इन दोनो ही स्थानों से दूसरे नाम सामने आए तो राज्य बीजेपी प्रभारी अविनाश खन्ना ने कांग्रेस को यह कह कर घेरने की कोशिश की कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मैदान छोड़ गया है.

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अलवर का चुनाव
मगर जैसे जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ी, बीजेपी खुद घिरती हुई नजर आई. इन चुनावों में अपनी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद कमान संभाल रखी थी.
राजे ने इन स्थानों के बहुतेरे दौरे किए और आम लोगों से मिलीं.
मुख्यमंत्री ने मतदाताओं को साधने के लिए जातिवार समूह बना कर विभिन्न जातियों से अलग-अलग मिलीं. पर यह प्रयोग कोई काम नहीं आया.
पिछले कुछ समय में गोरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर अलवर सुर्खियों में रहा है.
कुछ प्रेक्षकों को लगता था कि यह धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास है और बीजेपी इसका लाभ लेना चाहेगी.

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धर्म के नाम पर...
मगर अलवर में सत्तारूढ़ बीजेपी को वोटों की संख्या के लिहाज से और भी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है.
अलवर के स्थानीय पत्रकार देवेंद्र भारद्वाज कहते हैं, "सरकार ने कोई विकास कार्य नहीं किया बल्कि पूर्ववर्ती सरकार ने जो काम शुरू किए थे, उन्हें और रोक दिया. इससे लोग नाराज़ थे.
भारद्वाज कहते हैं, "धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण का सहारा लेने की कोशिश की गई पर इसे लोगों ने ख़ारिज कर दिया. बीजेपी उम्मीदवार ने अलवर में एक मौके पर हिंदू वोटों पर जोर भी दिया. पर लोगो ने इसे अनसुना कर दिया."
बीजेपी सरकार ने अपने पक्ष में माहौल पुख्ता करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बाड़मेर दौरा करवाया और ऑयल रिफ़ाइनरी की स्थापना के लिए 'कार्य प्रारम्भ' समारोह आयोजित किया.

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विधानसभा चुनावों पर असर
इस समारोह में मोदी ने राजे के कामकाज की तारीफ की. लेकिन जनता ने इसे महत्व नहीं दिया.
बीजेपी के राज्य प्रवक्ता मुकेश चेलावत कहते हैं, "हार से झटका जरूर लगा है. मगर इसका विधानसभा चुनावों पर कोई असर नहीं होगा."
चेलावत कहते हैं, "क्यों हारे, इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है. कारणों का पता लगा रहे हैं."
कांग्रेस नेता मुमताज मसीह कहते हैं, "ये नतीजे केंद्र की मोदी सरकार और राज्य बीजेपी सरकार दोनों के खिलाफ जनादेश है."
सतह पर कोई दमदार विपक्ष दिखाई नहीं देता था न ही पिछले चार साल में सरकार को किसी बड़े आंदोलन का समाना करना पड़ा.

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केंद्र की चिंता
लेकिन प्रेक्षक कहते हैं, "बेरोज़गारी, क़ानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास कार्यो में अनदेखी ने एक बड़ा व्यवस्था विरोधी माहौल खड़ा कर दिया. इसके साथ ही सरकारी उपक्रमों में निजीकरण ने कर्मचारियों को खफा कर दिया."
इन नतीजों से सत्तारूढ़ बीजेपी में राजे के विरुद्ध चुनौतियां बढ़ सकती हैं. केंद्र की चिंता में भी इजाफा होगा. क्योंकि राज्य में लोकसभा की 25 सीटें हैं.
उधर, इतनी बड़ी जीत से विपक्ष में बैठी कांग्रेस में मुख्यमंत्री का ख्वाब लेकर चलने वालों में वर्चस्व की होड़ बढ़ जाएगी.
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