BUDGET SPECIAL: इस आम बजट के सियासी मायने क्या हैं?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अगले साल आम चुनाव के पहले का मोदी सरकार का आख़िरी पूर्ण बजट सियासी भी था और आर्थिक भी.
इसमें बीच के रस्ते को अपनाते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 का बजट पेश किया.
उनका झुकाव किसानों और ग्रामीण इलाक़ों को राहत देने की तरफ़ था जहाँ देश के मतदाताओं की अक्सरियत रहती है.
इस में कोई दो राय नहीं कि बदहाल कृषि छेत्र को समर्थन देना एक आर्थिक और नैतिक ज़रूरत थी.
लेकिन सवाल ये है कि बीते सालों में उन्हें नज़रअंदाज़ ही क्यों किया गया? और अब जब कि आम चुनाव इतना नज़दीक है तो उनकी याद क्यों आई?

किसानों पर ध्यान क्यों?
शायद मोदी सरकार ने 2004 के लोकसभा चुनाव से सबक़ सीखा है.
उस चुनाव से पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता में वापसी यक़ीनी समझी जा रही थी.
मुझे याद है चुनाव से ठीक पहले हमारी मुलाक़ात वाजपेयी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद से हुई थी.
मैंने उनसे जब ये पूछा कि एफ़एम रेडियो पर सरकार प्राइवेट प्लेयर को समाचार के प्रसारण की इजाज़त कब देगी तो उन्हों कहा था, "बस हमें चुनाव जीत कर आने दो हम इसकी इजाज़त दे देंगे. इस सम्बन्ध में एक बिल भी तैयार है."
उस समय पार्टी 'इंडिया शाइनिंग' के नशे में चूर थी. लेकिन ग्रामीण इलाक़े चमक नहीं रहे थे. किसान परेशान थे. वो आए दिन आत्महत्या कर रहे थे.
कांग्रेस सरकार
भाजपा सरकार ने उन्हें बुरी तरह से नज़र अंदाज़ कर रखा था.
नतीजा ये हुआ कि 2004 के चुनाव में किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों ने पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंका.
कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी. दस साल चली. लेकिन कांग्रेस सरकार ने भी किसानों को नज़र अंदाज़ किया.
कांग्रेस सरकार 2014 के चुनाव में मोदी लहर का शिकार तो हुई ही साथ ही किसानों ने भी कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट दिया. आज भी किसान बुरे हाल में हैं.
विशेषज्ञों ने मोदी सरकार पर भी किसानों को नज़र अंदाज़ करने का इलज़ाम लगाया है.
आर्थिक नहीं सियासी मायने
लेकिन इस बार के सालाना बजट के प्रस्तावों से लगता है कि मोदी सरकार पिछले दो-तीन चुनावों के नतीजों को नज़र अंदाज़ नहीं कर रही है.
सरकार ने किसानों की भारी मदद करने का वादा किया है.
सरकार अब ख़रीफ़ फ़सलों के उपज की लागत का न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत डेढ़ गुना अधिक दाम देने का वादा कर रही है.
दिलचस्प बात ये है कि ये सुनिश्चित करने के लिए कि अगले साल आम चुनावों को देखते हुए पैग़ाम सही दर्शक तक पहुंच जाए, वित्त मंत्री ने कृषि संबंधित वादों का एलान हिंदी भाषा में किया.
मध्यम वर्ग और नौकर-पेशा वालों को बड़ी आशा थी कि उन्हें आय कर में कुछ छूट मिलेगी.

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हर वर्ग का ध्यान रखा गया है?
वोटरों की संख्या के हिसाब से ज़ाहिर है ये वर्ग किसानों से काफ़ी छोटा है.
इस वर्ग को वित्त मंत्री ने 40,000 रुपये की एक स्टैण्डर्ड छूट दिया है लेकिन दूसरी तरफ़ शिक्षा या स्वास्थ्य पर उपकर तीन प्रतिशत से बढ़ा कर चार प्रतिशत कर दिया है.
यानी एक हाथ से दिया तो दूसरे हाथ से वापस ले लिया. मध्यम वर्ग बजट से संतुष्ट नहीं नज़र आता.
उधर, म्यूचुअल फंड से एक साल से ज्यादा समय के बाद और एक लाख रुपये से अधिक रकम पर 10 फ़ीसदी टैक्स लगाया गया है. यानी पैसा निकालना महंगा हो गया है.
ये प्रस्ताव छोटे निवेशकों और शेयर बाजारों के लिए एक बुरी ख़बर थी.

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राजकोषीय घाटा
टैक्स और पर्सनल फिनांस के विशेषज्ञ डीके मिश्रा के अनुसार इस क्षेत्र में वो वित्त मंत्री को 10 में से केवल 5 अंक देंगे.
लेकिन मिश्रा दूसरे सभी क्षेत्रों में इस बजट को आठ अंक देने को तैयार थे.
अगर किसानों की तरफ़ झुकाव और मध्यम वर्ग के असंतोष को अलग रखें तो ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री ने सभी वर्गों को कुछ न कुछ देने की कोशिश की है और साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखा है कि राजकोषीय घाटा 3. 3 फीसदी से अधिक न हो.
कुछ विशेषज्ञ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि ताज़ा बजट सियासी अधिक और आर्थिक कम है.
बजट में छूट
इन छूट पर ज़रा ग़ौर करें: आठ करोड़ ग़रीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन.
दस करोड़ परिवारों के लिए स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली जिसमे प्रति व्यक्ति के लिए 5 लाख रुपये का बीमा. 70 लाख नई नौकरियां बनाने का लक्ष्य.
इन सभी प्रस्तावों से सियासत नज़र आती है.
सरकार का तर्क अलग हो सकता है लेकिन वित्त मंत्री के पूरे भाषण को सुनकर मुझे ऐसा लगा कि अगले साल होने वाले आम चुनाव को सामने रख कर ये बजट तैयार किया गया है.
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