नज़रियाः 'एक भारत, एक चुनाव' क्या ये संभव है?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक भारत, एक चुनाव. ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आइडिया है. मतलब ये कि लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं.

सोमवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद के दोनों सदनों को सम्बोधित करते हुए भी इस विचार को प्रकट किया. उनका तर्क ये था कि इससे ख़र्च कम होगा.

उन्होंने संसद में कहा, "देश के किसी न किसी हिस्से में लगातार हो रहे चुनाव अर्थव्यवस्था और विकास पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव को लेकर चिंता है... इसलिए एक साथ चुनाव कराने के विषय पर चर्चा और संवाद बढ़ना चाहिए तथा सभी राजनैतिक दलों के बीच सहमति बनानी चाहिए."

राष्ट्रपति के इस बयान का इज़हार प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने ज़ोरदार तालियां बजाकर किया. ज़ाहिर है राष्ट्रपति सरकार के विचार को ही प्रकट कर रहे थे.

क्या सरकार को चुनावों की जल्दी है?

लेकिन क्या ये बात इस बात की तरफ़ इशारा है कि सरकार 2019 में होने वाले चुनाव को समय से पहले कराना चाहती है?

क्या लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं? क्या विपक्ष इसके लिए तैयार होगा? क्या ऐसा करने के लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत पड़ेगी?

विशेषज्ञों की राय ये है कि प्रधानमंत्री मोदी का 'एक भारत एक चुनाव' का सपना साकार तो हो सकता है, लेकिन इसमें समय लगेगा.

भाजपा पर नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह के अनुसार आम सहमति से ये संभव नहीं है. उन्होंने कहा, "ये सही बात है कि प्रधानमंत्री काफी समय से इस बात की वकालत कर रहे हैं कि दोनों चुनाव एक साथ हों क्योंकि इससे देश का फ़ायदा है. विकास पर इसका सकारात्मक असर होगा और राजनैतिक दलों के लिए भी खर्च में कटौती होगी. लेकिन बिना राजनैतिक सर्वानुमति के मुझे नहीं लगता है कि ये संभव होगा."

उनका कहना था कि शायद 2024 के आम चुनाव से कुछ पहले इस पर फैसला हो जाए.

हाँ, अगर सभी राज्यों में भाजपा की सरकारें होतीं तो ये संभव था. ये भी मुमकिन है कि लोकसभा का चुनाव और तीन राज्यों, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में, होने चुनाव एक साथ करा दिया जाएं. प्रदीप सिंह कहते हैं, "इस बात की चर्चा है कि नवंबर-दिसंबर में होने वाले तीन राज्यों के चुनाव और लोकसभा के चुनाव एक साथ करा दिए जाएं, लेकिन मुझे लगता नहीं कि ऐसा होगा."

क्या हैं अड़चनें?

विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ कराने के लिए संविधान में संशोधन की ज़रूरत होगी. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और संवैधानिक विशेषज्ञ सूरत सिंह कहते हैं कि अगर सरकार लोकसभा का चुनाव जल्दी कराना चाहे तो इसमें किसी तरह की तब्दीली कराने की ज़रूरत नहीं, लेकिन अगर सभी विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराये जाएं तो संविधान में संशोधन लाना पड़ेगा.

लेकिन उनके विचार में ये आइडिया आर्थिक से अधिक राजनैतिक है. सूरत सिंह कहते हैं, "ये कहना कि इलेक्शन एक साथ नहीं कराये गए तो पैसे ज़्यादा ख़र्च होंगे तो ये कोई ग्राउंड नहीं होता है, ये सारे सियासी फ़ैसले हैं संवैधानिक नहीं. लोकतंत्र में सियासी परंपरा की बड़ी अहमियत होती है. इतने बड़े फ़ैसले के लिए आम सहमति ज़रूरी है."

भारतीय मीडिया में लोकसभा चुनाव जल्दी होने की अटकलें लगाई जा रही हैं. लेकिन क्या मोदी सरकार को इससे सच में कोई फ़ायदा है?

प्रदीप सिंह कहते हैं कि जीएसटी से सरकार को शुरू में परेशानी हुई, लेकिन अब जो आर्थिक सर्वेक्षण आया है उसके अनुसार जीएसटी का फ़ायदा अगले एक साल में पूरी तरह से दिखाई देगा. वो आगे कहते हैं, "जीएसटी सरकार के लिए गेम चेंजर्स हो सकता है. ज़ाहिर है सरकार इसका फ़ायदा उठाना चाहेगी और इंतज़ार करेगी."

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार दिसंबर में गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की असंतुष्ट कामयाबी के कारण केंद्र सरकार आम चुनाव जल्द कराना चाहती है. लेकिन प्रदीप सिंह कहते हैं कि लोकसभा और विधानसभा के चुनावों का पैटर्न एक जैसा नहीं होता.

गुजरात में भाजपा को 49 प्रतिशत वोट मिले थे और कांग्रेस पार्टी को 42 प्रतिशत. गुजरात चुनाव के 20 दिनों के बाद कराये गए एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए प्रदीप सिंह कहते हैं कि इसमें 54 प्रतिशत लोगों ने भाजपा को वोट देने की बात कही जबकि कांग्रेस को 35 प्रतिशत लोगों ने.

क्या चुनाव आयोग एक साथ दोनों तरह के चुनाव करा सकेगा? कुछ लोगों की राय है कि चुनाव आयोग को कठिनाइयां होंगी, लेकिन ये उसके लिए संभव है. कुछ ने इशारा किया 1967 के पहले के हालत के जब दोनों चुनाव एक साथ कराये जाते थे, फिर अब क्यों नहीं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)