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औरतों का जिस्म काटकर निकालने का ये धंधा
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मेडक, तेलंगाना से
महज़ 24 की उम्र और लक्ष्मी की बच्चेदानी उसके जिस्म से काटकर निकाल दी गई.
लक्ष्मी को 'साल भर से माहवारी के दौरान ख़ून का ज़्यादा रिसाव होता था'. इसके इलाज के लिए वो एक डॉक्टर के पास गई जिसने उससे कहा कि उसमें 'कैंसर के लक्ष्ण मौजूद हैं' और उसे 'ऑपरेशन करवाना पड़ेगा वरना वो मर जाएगी.'
गद्दा अनुषा को भी कैंसर का भय दिखाया गया. आदिवासी पतलोम शांति से कहा गया कि उनके पेट में गढ्ढा बन रहा है. कुछ को तो सीधे ये कहा गया कि ऑपरेशन नहीं करवाओगी तो मर जाओगी.
तेलंगाना के कई इलाक़ों में तो अगर ये पूछें कि किसके-किसके बच्चेदानी का आपरेशन हुआ है तो ज़्यादातर औरतें ये कहते हुए हाथ उठा देती हैं - मेरा, मेरा, मेरा.
लक्ष्मी और उन सभी को बच्चेदानी के आपरेशन की सलाह प्राइवेट डॉक्टरों से मिली थी और उनका ऑपरेशन भी प्राइवेट अस्पतालों में ही हुआ. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ बच्चेदानी के तक़रीबन 67 फ़ीसद आपरेशन प्राइवेट अस्पतालों में किये जा रहे हैं.
क्यों किये जाते हैं?
इन ऑपरेशनों का, जिन्हें सामाजिक कार्यकर्ता 'ग़ैर-ज़रूरी क़रार देते हैं. वो कहते हैं "इनका मक़सद है मरीज़ों से मोटी फ़ीस वसूल करना."
मरीज़ या उसके परिवार वाले इन ऑपरेशनों के लिए सीधे अपनी जेब से पैसा भर रहे हैं. काफ़ी मामले वैसे होते हैं जिसमें ग़रीब जनता को सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत मुफ़्त अस्पताल की सेवा मुहैया होती है.
सामाजिक कार्यकर्ता भारत भूषण कहते हैं, ये एक ऐसा घोटाला है "जिसमें डॉक्टर, क्वैक्स, आरएमपीज़, डायगनोस्टिक सेंटर्स सभी शामिल हैं."
कौड़ीपल्ली में हम उस अस्पताल में गए जिसका नाम कुछ दूसरे नामों के साथ बच्चेदानी निकालने के ऑपरेशन के सिलसिले में बार-बार आ रहा था.
इतने ज़्यादा बच्चेदानी के ऑपरेशन और वो भी इतनी कम उम्र के औरतों के क्यों? ये सवाल पूछे जाने पर उस नर्सिंग अस्पताल के मालिक 'डा.' प्रभाकर हमारे सवाल का मुश्किल से ही जवाब दे पाये.
हां उन्होंने ये ज़रूर कहा कि "इन ऑपरेशनों के लिए हैदराबाद से डॉक्टर आते हैं".
प्रभाकर आयुर्वेद के चिकित्सक हैं लेकिन उनका पीरा नर्सिंग होम शहर में मौजूद है.
न रसीद, न रिपोर्ट्स
रमम्मा को तो बच्चेदानी के ऑपरेशन के बाद तक़रीबन 45 दिनों तक अस्पताल में ही भर्ती रहना पड़ा.
एक छोटे से टीले पर मौजूद कन्नारम गांव के अपने घर में बैठी वो हमें बताती हैं कि पहली बार के बाद "फिर से ऑपरेशन हुआ लेकिन फिर भी इंफेक्शन को जाने में 45 दिन लग गये."
वो कहती हैं, "सर्जरी में बहुत सारे पैसे ख़र्च हुए, सब उनके पति ने दिए."
लेकिन रमम्मा के पति सत्या के पास न तो किसी भी टेस्ट की कॉपी है, न ही डॉक्टर को ऑपरेशन के लिए दिए गए फ़ीस की रसीद. वो कहते हैं, "हमको डा. ..... पर यक़ीन है", उन्हें वो सालों से जानते हैं.
कुछ यही हाल है ज़्यादादर उन सभी लोगों को जिनका इतना बड़ा ऑपरेशन कर दिया गया लेकिन उनके पास तो न तो दी गई फ़ीस की रसीद है, कुछ के पास तो डॉयगनोस्टिक सेंटर्स की रिपोर्ट्स तक नहीं हैं.
निज़ामाबाद के सरायपल्ली सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में काम कर रही जेएस राजेश्वरी कहती हैं, "इन अस्पतालों में प्रशिक्षित चिकत्सक मौजूद नहीं होते हैं, पहले तो वो पेशेंट को बताते हैं कि यहां से दूसरे डाक्टर आएंगे, वहां से आएंगे लेकिन ऐसा नहीं होता. एक प्रशिक्षित सर्जन आ भी गई तो क्या, न एनेस्थिसिया के लिए टेक्नीशियन न ऑपरेशन के बाद की देखभाल की साफ-सुथरी सेवा."
राजेश्वरी इस अस्पताल में हेल्थ असिस्टेंट हैं और बताती हैं कि गांव की बहुत सारी ऐसी महिलाओं से उनका पाला पड़ता है जो बच्चेदानी के ऑपरेशन करवा चुकी हैं.
अधिक ऑपरेशन प्राइवेट अस्पतालों में
तेलंगाना के सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना - आरोग्यश्री, के पूर्व कार्यकारी अधिकारी डा. गोपाल राव कहते हैं, "बच्चेदानी के इतने ऑपरेशनों का मामला सरकार की निगाह में है, और महिला रोग चिकत्सक भी सामने आ रही हैं, इसे लेकर जागरुकता अभियान शुरु किया गया है."
हालांकि डा. राव सामाजिक कार्यकर्ताओं के उस आरोप से इंकार करते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना इन कथित ग़ैर-ज़रूरी ऑपरेशनों के पीछे है, क्योंकि उनके मुताबिक़ "आरोग्यश्री में जिन अस्पतालों को शामिल किया गया उसकी पूरी जांच-परख" की गई थी.
लेकिन ये भी सच है कि बच्चेदानी के दो तिहाई ऑपरेशन, ख़ुद भारत सरकार के आंकड़े के मुताबिक़, प्राइवेट अस्पतालों में हो रहे हैं.
साथ ही, भारत सरकार के ताज़ा स्वास्थ सर्वे के मुताबिक़ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बच्चेदानी के ऑपरेशन का प्रतिशत 8.9 और 7.7 फ़ीसद है. जबकि देश में इसका सामान्य प्रतिशत 3.2 है.
औरतों का जिस्म काटकर पैसा कमाने का ये धंधा महज़ तेलंगाना और आंध प्रदेश तक ही सीमित नहीं बल्कि बिहार, गुजरात और दूसरे कई सूबे इसके जाल में आ चुके हैं. बिहार, गुजरात में भी ये आंकड़ा चिंताजनक स्थिति को पहुंच चुका है.
स्वास्थ्य पर असर
माहवारी ख़त्म होने के उम्र के पहले किए जा रहे इन आपरेशनों की इन ग़रीब महिलाओं को भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है.
लक्ष्मी अगर 10 क़दम भी चलती है तो दर्द होने लगता है, सांस उखड़ जाती है. वो कहती हैं, "पिछले माह भर से मुझे बहुत दर्द है. मैं न खड़ी हो सकती हूं, न ही बैठ सकती हूं."
कुछ सालों पहले ऐसे ही हुए ऑपरेशन के बाद से शबाना को "लगातार डाक्टरों के चक्कर लगाने पर रहे हैं, जिसपर लाखों शायद ख़र्च हो चुके हैं."
उदास होकर वो कहती है, "शौहर कहते हैं तुम पर ही पैसे फूंकता रहूं या कुछ और भी करूं ज़िंदगी में."
स्त्री रोग विशेषज्ञ लक्ष्मी रत्ना मेनोपौज़ल सोसाईटी की हैदराबाद में सेक्रेटरी रह चुकी हैं. वो कहती हैं, "क्योंकि बेसिक हार्मोन ओवरीज़ में तैयार होता है तो माहवारी ख़त्म होने की उम्र के पहले बच्चेदानी निकालने से उस हार्मोन की कमी हो जाती है. जिससे मिहला की हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं और दूसरे तरह के असर भी होते हैं."
वो कहती हैं कि एक महिला में माहवारी ख़त्म होने के उम्र 51 से 52 साल होती है.
भारत भूषण कहते हैं, "इन ग़ैर-ज़रूरी ऑपरेशनों का एक नुक़सान इन ग़रीब महिलाओं के लिए उनके लिए भविष्य में किसी तरह के काम करने के लिए सक्षम न रह पाना भी है."
वो कहते हैं, "ग़रीब परिवारों में मर्द और औरत दोनों काम करते हैं फिर घर की गाड़ी किसी तरह खिंच पाती है लेकिन इन ऑपरेशन के बाद एक व्यक्ति की कमाई बंद हो जाती है तो परिवार की आर्थिक रूप से कमर टूट जाती है."
भूषण के मुताबिक़ ये तब होता है जब आर्थिक रूप से कमज़ोर ये ग़रीब लोग पहले ही पत्नी या बेटी - जिसका भी ऑपरेशन हो रहा है, उसे बचाने के लिए क़र्ज़ लेकर, ज़मीन बेच या गिरवी रख पैसे उगाहने को मजबूर होते हैं.
मगर आंकड़ों से परे कमाई के लालच में किए गए इन अंधाधूंध ऑपरेशनों का सबसे दुखद पहलू ये है कि इनमें से कई कम उम्र औरतें जीवन में कभी मां नहीं बन सकेंगी.
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