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वुसत का ब्लॉगः इमरान हों या नवाज़, टीवी पर सब दिखना चाहते हैं
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
टीवी चैनल पे सूरत दिखाने का नशा ऐसा है कि अच्छे-अच्छों को चपरगट्टू बना देता है.
किसी भी टॉक शो में मेहमानों को भले ही न बोलने दिया जाए, एंकर भले ही मीडिया की आज़ादी के नाम पे उनकी इज़्जत के कपड़े तार-तार कर दे, मगर फ़िर भी मेहमान अगले शो में वही कपड़े दोबारा पहनकर जाने के लिए तैयार होता है.
उसके बाद किसी सम्मेलन या सेमिनार में रोना भी रोता है कि साहब बदतमीजी की इंतेहा हो गई, मीडिया खुलेपन के नाम पर बिलकुल बेलगाम हो चुका है. आधा सच बोलता है, बात को तोड़ मरोड़कर पेश करता है, इत्यादि...इत्यादि..
रेटिंग बरक़रार रखने के तरीके
हद तो है कि ये मेहमान अर्णब गोस्वामी जैसे ठंडे-तमीज़दार-आदरवादी-निष्पक्ष एंकरों को भी बदनाम करने से नहीं चूकते. सबसे सयाने वो मेहमान हैं जो अपनी रेटिंग बरक़रार रखने के लिए रोज़ाना कोई-न-कोई ऐसी फुलझड़ी छोड़ देते हैं कि सारा मीडिया उसे हड्डी समझकर लपक पड़ता है.
भारत का तो हमें ज़्यादा पता नहीं, परंतु पाकिस्तान में यह हो ही नहीं सकता कि परवेज़ मुशर्रफ़ या उनसे भी सुपर से भी ऊपर इमरान ख़ान किसी भी रोज़ ख़बरों में बने रहने के लिए कोई ऐसी फुलझड़ी छोड़ने से चूक जाएं.
विरोधियों को चोर-डाकू-माफ़िया-बेशर्म-कमीना कहना तो कोई बात ही नहीं और जब इससे भी मज़ा नहीं आता तो जिस पार्लियामेंट का खाते हैं उसी पर हज़ार बार लानत भी भेज देते हैं.
और जब मीडिया में हाहाकार मचती है तब ख़ान साहब को वो आनंद मिलता है जो क्या किसी चरस-गांजे या कोकीन के क़श में मिलेगा. इसका ये मतलब नहीं कि बाकी पक्षों के नेता रेटिंग में रहने के लिए यह सब नहीं करते.
भाषण और औरत की स्कर्ट!
ये सर्कस जब हमारे आदरणीय मुख्य न्यायाधीश श्री साक़िम निसार ने देखा तो उनसे ना रहा गया और अब वो भी मीडिया को लाल कपड़ा दिखाकर छकाई देना सीख गए हैं.
ये बात पुरानी हुई की जज नहीं उनके फ़ैसले बोलते हैं. अब फ़ैसले बोलें न बोलें, जज बोलने से नहीं चूकते और जो मन में आए बोल पड़ते हैं.
ताज़ा बवाल ये खड़ा हो गया है कि जस्टिस श्री साक़िब निसार ने एक तक़रीर में यह कह दिया कि भाषण औरत के स्कर्ट जैसा होना चाहिए, इतना लंबा भी नहीं कि बोरियत हो जाए और इतना छोटा भी नहीं कि विषय नामुकम्मल रह जाए.
तवज्जो दिलाने पर उन्होंने यह सफाई दी कि ये दरअसल चर्चिल ने कहा था, मैंने तो बस चर्चिल की चर्चा की है.
इससे पहले आप किसी जगह फरमा चुके हैं कि पाकिस्तान बनाने के संघर्ष में एक तरफ़ तो मुसलमान थे और दूसरी तरफ़ वो कौम जिसका मैं नाम भी नहीं लेना चाहता.
इस इज़्जत अफ़जाई पर पाकिस्तान के हिंदुओं ने जस्टिस साहब को जी भर के वो-वो दुआएं दीं, तब जाके श्रीमान का जी ठंडा हुआ.
इसी तरह जब भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ पनामा पेपर्स का फ़ैसला आया, तो फ़ैसले की पहली लाइन में ही यह हवाला है कि हर बड़े धन के पीछे एक जुर्म छिपा होता है. यानि नवाज़ शरीफ़ माफ़िया गॉड फादर हैं.
मगर साहब ये मीडिया तो आपे से बाहर हो गया है, इसका कुछ होना चाहिए...है ना!
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