You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमला रोकने में नाकाम रही है मोदी सरकार': ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट
"धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ 2017 में हुए हमलों की भरोसेमंद जांच कराने या उन्हें रोकने में भारत सरकार नाकाम रही है."
साल 2018 की 'वर्ल्ड रिपोर्ट' जारी करते हुए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था 'ह्यूमन राइट्स वॉच' ने गुरुवार को ये दावा किया.
'ह्यूमन राइट्स वॉच' का ये आरोप है कि 'सत्तारूढ़ बीजेपी के कई नेताओं ने सभी भारतीयों के बुनियादी अधिकारों की क़ीमत पर हिंदू श्रेष्ठता और कट्टर राष्ट्रवाद को बढ़ावा' दिया है.
रिपोर्ट में कहा गया है, "अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बीफ़ के लिए गाय खरीदते-बेचते हैं या फिर उन्हें मारते हैं, इन अफ़वाहों के जवाब में सत्तारूढ़ बीजेपी से जुड़े होने का दावा करने वाले कई कट्टरपंथी हिंदू समूहों ने मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ कई हमले किए."
गंभीर कोशिशों की ज़रूरत
रिपोर्ट कहती है, "हमलावरों पर फौरन क़ानूनी कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने गोहत्या पर पाबंदी लगाने वाले क़ानून के तहत पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही शिकायतें दर्ज कीं. साल 2017 में कम से कम ऐसे 38 हमले हुए और इनमें दस लोग मारे गए."
ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया डायरेक्टर मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, "भारत में अधिकारियों ने खुद ही ये साबित किया है कि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों और ख़तरे का सामना कर रहे अन्य समूहों पर लगातार हो रहे हमलों से उन्हें बचाने में अनिच्छुक है."
उन्होंने कहा, "भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने की गंभीर कोशिशों और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की ज़रूरत है."
643 पन्नों की वर्ल्ड रिपोर्ट के 28वें संस्करण में ह्यूमन राइट्स वॉच ने 90 से ज़्यादा देशों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायजा लिया है.
इंटरनेट सेवाएं बंद करने का विकल्प
ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार के हनन और क़ानून व्यवस्था लागू करने के नाम पर भारत में इंटरनेट सेवाएं बंद करने का चलन का मुद्दा भी उठाया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है, "अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का दर्जा दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, क़ानून के शासन और सत्ता के दबंग बर्ताव के ख़िलाफ़ गारंटी पर जोर दिया था. लेकिन इसके बावजूद सरकारी नीतियों या उसकी गतिविधियों की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं, अकादमिक जगत के लोगों और पत्रकारों के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि और राजद्रोह के मुकदमे दर्ज किए गए."
"राज्य सरकारों ने हिंसा या सामाजिक तनाव रोकने के नाम पर पूरी तरह से इंटरनेंट बंद करने सहारा लिया है ताकि क़ानून व्यवस्था को लागू रखा जा सके. नवंबर तक 60 बार इंटरनेट सेवाएं ठप की गई हैं, उनमें से 27 मामले जम्मू और कश्मीर राज्य के हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)