ग्राउंड रिपोर्टः नए नागरिक पंजीकरण से हटेगा ‘बांग्लादेशी’ का लेबल?

    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, असम से, बीबीसी हिंदी के लिए

'हम सभी के पास पूरे कागजात हैं. मेरे शौहर के पास भी हैं और सुसराल के अन्य लोगों के पास भी. हमारे दस्तावेजों में कोई गलती नहीं हैं. हम यहीं के नागरिक हैं. हम बांग्लादेशी नहीं हैं. हमें किसी का डर नहीं हैं.'

यह कहना है असम के एक अंदरूनी गांव लटूरादिया की 22 वर्षीय कोरिमोन नेशा का. 10 महीने पहले मोहम्मद कमालुद्दीन अहमद के साथ शादी कर यहां आई कोरिमोन को भी उन सैंकड़ों महिलाओं की तरह यह डर था की उनका नाम भी असम में अपडेट की जा रहीं राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) में शामिल नहीं किया जाएगा.

लेकिन अब वह काफी आत्मविश्वास से मेरे सवालों का जवाब दे रही थी. उसके चेहरे पर अपनी नागरिकता को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं थी.

क्या है अपडेटेड एनआरसी?

असम सरकार आगामी 31 दिसंबर की रात राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) का पहला मसौदा जारी करने जा रही है. नागरिकों की इस नई सूची में उन्हीं लोगों के नाम शामिल किए जाएंगे जिन्होंने 25 मार्च 1971 के पहले की भारतीय नागरिकता से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ जमा करवाएं हैं. हालांकि यह एक संपूर्ण अपडेट एनआरसी नहीं होगी, क्योंकि अभी दस्तावेजों के वैरिफिकेशन का काम ख़त्म नहीं हुआ हैं.

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यहां की सरकार असम को अवैध बांग्लादेशी नागरिकों से मुक्त कराने के लिए एनआरसी अपडेट करवा रही है. 24 मार्च 1971 को आधार वर्ष बनाया गया है क्योंकि 25 मार्च 1971 को बांग्लादेश बना था.

बांग्लादेशी का लेबल हटेगा!

राजधानी शहर गुवाहाटी से करीब 95 किलो मीटर दूर गोरोइमारी से आगे ब्रह्मपुत्र के रेतीले हिस्से में बसे लटूरादिया गांव पहुंचने पर जब मैंने लोगों से एनआरसी ड्राफ्ट को लेकर बात की तो सभी ने यही कहा कि 31 दिसंबर के बाद असम के लोग हमें 'बांग्लादेशी' की नजर से नहीं देखेंगे.

लटूरादिया तथा इसके आसपास सटे गांवों की पूरी आबादी बंगाली मुसलमानों की है. गोरोइमारी से वहां मौजूद 26 साल के नूरुल इस्लाम ने बीबीसी से कहा, "भारत के नागरिक होने के बाद भी सालों से हम लोगों पर 'बांग्लादेशी' टैग लगा हुआ है. हम अपनी सुरक्षा को लेकर हमेशा भयभीत रहे हैं. लेकिन नए साल में यह उम्मीद करते हैं कि अब हमें कोई संदेह की नजर से नहीं देखेगा. कोई हमें विदेशी नहीं कहेगा."

स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहें नूरुल ने एक सवाल का जवाब देते हुए कहा,"अगर सुप्रीम कोर्ट पंचायत प्रमाणपत्र को मान्यता नहीं देता तो लाखों मुसलमान अपनी नागरिकता गंवा देते. क्योंकि ज्यादातर लोग गरीब है. हमारी महिलाएं इतनी पढ़ी लिखी नहीं हैं. जल्दी शादी कर दी जाती है और उसके बाद लड़कियां एक गांव से दूसरे गांव चली जाती हैं. पंचायत प्रमाणपत्र के अलावा इनके पास लीगेसी लिंकेज के लिए और कोई सहायक दस्तावेज नहीं हैं."

शादी के बाद दस्तावेज़ों की जद्दोजहद

दरअसल शादी के बाद या किसी अन्य कारण से जो महिलाएं एक गांव से दूसरे गांव स्थानांतरित हुई हैं उनके लीगेसी लिंकेज दस्तावेज़ को लेकर काफी समस्या हो रही थी. ऐसे में इनके पास सहायक दस्तावेज के तौर पर केवल पंचायत प्रमाणपत्र ही था जिसे गुवाहाटी हाई कोर्ट ने वैध दस्तावेज मानने से इंकार कर दिया था.

लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए पंचायतों द्वारा जारी प्रमाणपत्र को नागरिकता लिए वैध सहायक दस्तावेज मानने का फैसला सुनाया. हालांकि कोर्ट ने ऐसे पंचायत प्रमाणपत्रों की समुचित जांच करवाने को कहा है.

एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए 3.20 करोड़ के दावों में से 48 लाख नागरिक ग्राम पंचायत सचिव के प्रमाण पत्र के आधार पर दावा कर रहे हैं जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं.

लोगों के मन में कई सवाल

एनआरसी अपडेट के राज्य समन्वयक प्रतीके हजेला ने एक बयान में कहा कि 31 दिसंबर को प्रकाशित होने वाली एनआरसी के पहले ड्राफ्ट में जिन लोगों का नाम नहीं आता है, उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, इसका मतलब यह होगा कि उनके दस्तावेज वेरिफिकेशन की प्रक्रिया में हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामले हैं जहां व्यक्ति दस्तावेजों में अपने माता-पिता या पूर्वजों के साथ अपने संबंध स्थापित नहीं कर पाए हैं. वहां वास्तविक कारण हैं और हम प्रत्येक मामले को अलग-अलग सुनेंगे.

हासोरी गांव की 65 वर्षीय सबिरुन बेगम एनआरसी अपडेट की ऐसी कोई जानकारी से वाकिफ़ नहीं हैं. लेकिन कुछ दिनों से गांव के लोग उन्हें समझा रहे हैं कि अपना गांव छोड़कर कहीं जाना नहीं पड़ेगा.

इसी गांव के लोकमान हेकिम प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और वे कहते है कि "एनआरसी अपडेट से हमारे लोगों में आंतक मचा हुआ था. सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी हैं. इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक पार्टियों ने भी सालों से हमारे लोगों का बहुत फायदा उठाया हैं. हम खुद चाहते थे कि एनआरसी अपडेट का काम जल्द पूरा हो ताकि हमें मानसिक परेशानी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सके."

'आसू' के साथ हुआ था समझौता

इस बीच इन गांवों में अर्धसैनिक बलों के जवान गश्त लगाते हुए दिखाई दिए. इस संदर्भ में संपर्क करने पर असम पुलिस के महानिदेशक मुकेश सहाय ने कहा,"हर स्तर पर सुरक्षा की व्यव्स्था की गई हैं. थाना प्रभारी से लेकर डीजी तक अपनी जिम्मेदारी संभाल रहें हैं. इसके लिए एडीजी कानून-व्यवस्था को नोडल अधिकारी बनाया गया हैं.''

''इसके साथ ही अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात किया गया हैं. एनआरसी की पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित और निर्विघ्न लागू करवाने के लिए सभी तरह के उपाए किए जा रहें हें. फिलहाल किसी तरह की कोई परेशानी नहीं दिख रही है अगर कुछ होता है तो उसका जवाब दिया जाएगा."

असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के ख़िलाफ़ 1979 से तकरीबन छह साल तक चले आंदोलन के बाद 1985 में भारत सरकार ने ऑलअसम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के साथ जो समझौता किया था उसी शर्त के अनुसार एनआरसी को अपडेट किया जा रहा हैं.

आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य का कहना है कि 1971 के बाद असम में आने वाले किसी भी बांग्लादेशी नागरिक को राज्य में रहने की इजाज़त नहीं दी जाएगी. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान. पिछले लंबे समय से आसू एक त्रुटि मुक्त एनआरसी की मांग करते आ रहा है जिसमें केवल भारतीय नागरिकों के नाम ही दर्ज किए जाएंगे.

गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकिल हाफ़िज रशीद अहमद चौधरी ने कहा, "बांग्लादेशी मुद्दे पर लंबे समय राजनीति होती आ रही है. कोई कहता है असम में 40 लाख बांग्लादेशी है तो कोई 50 लाख कहता हैं. बंगाली मुसलमान इन बातों को सुन कर पूरी तरह थक चुके है.''

''लोगों को काफी दुख है कि असम की भाषा और संस्कृति को अपनाने के बाद भी उन्हें 'विदेशी' कहा जाता हैं. सेना में काम करने के बावजूद विदेशी होने का नोटिस भेज दिया जाता हैं. लिहाजा मुसलमान खुद चाहते है कि एक शुद्ध एनआरसी लोगों को सामने आए ताकि इस तरह की बातों पर हमेशा के लिए विराम लग सके."

भारत में 1951 की जनगणना के बाद उसी साल एनआरसी तैयार की गई थी. इसका कार्यान्वयन भारत सरकार के रजिस्ट्रार जनरल के अधीन राज्य सरकार के माध्यम से किया जाता है.

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