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गुजरात में रूपाणी पर क्यों है बीजेपी को भरोसा?
विजय रूपाणी मंगलवार को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और बीजेपी शासित 18 राज्यों के मुख्यमंत्री भी इस समारोह में शिरकत करेंगे.
इस बार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सरकार बनाने में तो कामयाब रही है मगर उसे पिछले चुनाव के मुक़ाबले सीटों का नुकसान हुआ है. कयास लगाए जा रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी इस बार गुजरात में रूपाणी की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बना सकती है, मगर ऐसा नहीं हुआ.
सिर्फ़ 99 सीटें आने के बावजूद बीजेपी हाईकमान ने रूपाणी पर ही भरोसा जताया. मगर इसकी वजह क्या है? जानने के लिए बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने बात की गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट से. पढ़िए उनका नज़रिया...
रूपाणी के पक्ष में थे चार फैक्टर
पहली बात तो यह कि भारतीय जनता पार्टी के हाई कमान की सोच थी कि विजय रूपाणी के नेतृत्व में गुजरात में भारतीय जनता पार्टी को 49.1 प्रतिशत वोट मिले हैं जो पिछले चुनाव की तुलना में करीब 1.25 फ़ीसदी ज़्यादा हैं.
दूसरा कारण है कि चुनाव से पहले अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया था कि यह चुनाव रूपाणी के नेतृत्व में लड़े जा रहे हैं और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.
तीसरी वजह यह है कि नतीजे आने के बाद बीजेपी नहीं चाहती थी कि रूपाणी को हटाने से मतदाताओं के बीच यह संकेत जाए कि बीजेपी को गुजरात चुनाव में झटका लगा है.
चौथा फैक्टर यह था कि अगर रूपाणी को हटाकर बीजेपी जातिगत समीकरण पर जाकर पाटीदार समाज से किसी को मुख्यमंत्री बनाती तो ग़ैर-पाटीदार समाज नाराज़ हो जाता. ओबीसी को सीएम बनाने से दलित और पाटीदार नाराज़ हो सकते थे. ऐसे में लाज़िमी था कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक बीजेपी रूपाणी को बनाए रखे और मुख्यमंत्री के चेहरे में कोई परिवर्तन न करें.
ऊपर से विजय रूपाणी काफी संजीदा आदमी हैं और उनका सर्वस्वीकार्य व्यक्तित्व है. इसे देखते हुए उन्हें और उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल को बनाए रखा गया.
'रूपाणी ज़रूरी तो नितिन पटेल मजबूरी'
जब आनंदी बेन पटेल को हटाकर जैन समुदाय के विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री पद पर लाया गया था, तब पटेल समुदाय नाराज़ न हो, इसलिए नितिन भाई पटेल को डिप्टी सीएम बनाया गया था. बीजेपी की यह सोच आज भी बरक़रार है क्योंकि उन्हें हटा देते तो यह सिग्नल चला जाता कि बीजेपी ने पाटीदार समुदाय से मुंह मोड़ लिया है.
इसलिए सीएम रूपाणी को रखना ज़रूरी था तो उनके साथ डिप्टी सीएम नितिन पटेल को बनाए रखना भी बीजेपी की लाचारी थी.
क्या इतने से सध पाएंगे पाटीदार?
पाटीदार समाज भारतीय जनता पार्टी से विमुख हो गया है. इस कारण इस बार बीजेपी को सात ज़िलों में एक भी सीट नहीं मिली है.
नौ ज़िलों में एक ही सीट मिली है. इसीलिए प्रधानमंत्री ने जब भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में जाकर यही कहा था कि समाज का जो तबका हमसे नाराज़ है, उसे मनाने की कोशिश की जाए.
इसीलिए मंगलवार को जब शपथ ग्रहण के लिए 18 राज्यों के मुख्यमंत्री यहां आ रहे हैं तो पाटीदार समुदाय के छह नेताओं को समारोह से जोड़ा गया है ताकि यह संदेश दिया जाए कि भारतीय जनता पार्टी पाटीदार समाज को अपने साथ रखना चाहती है.
क्या अगले साल बदल जाएगा मुख्यमंत्री?
गुजरात में अगले मार्च और मई के बीच राज्यसभा चुनाव होने वाला है. इसमें अरुण जेटली, पुरुषोत्तम रुपाला और मनसुख मांडव्या गुजरात से चुनकर गए हैं और इनकी सीट खाली हो सकती है.
संभावना है कि मनसुख मांडव्या को प्रधानमंत्री का विश्वास पात्र माना जाता है. सौराष्ट्र की लेउआ पटेल समुदाय की काफी पावरफुल कम्युनिटी भाजपा से विमुख हो गई है. ऐसे में उन्हें लाया जा सकता है.
पुरुषोत्मम रुपाला की छवि काफी स्वच्छ है और वह अच्छे वक्ता भी हैं. इन दोनों में से किसी को पसंद किया जा सकता है. मगर यह अनिश्चित है कि इनमें से किसी को लाया गया या फिर दोबारा मार्च में केंद्र में भेजा जाए.
मगर आज भारतीय जनता पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि वह किसी भी कीमत पर पाटीदारों का तुष्टीकरण करके बाकी के समाज को नाराज़ नहीं करना चाहती.
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