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नज़रिया: भाषणों में पीएम मोदी के बदले अंदाज़ के मायने
- Author, शिव विश्वनाथन
- पदनाम, समाजशास्त्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिकांश बड़े नेताओं की तरह ही भाषण कला के माहिर हैं.
उन्हें अपने भाषण में की गई बयानबाजी की ताक़त और उससे पड़ने वाले प्रभाव की भली भांति समझ है.
मोदी जानते हैं कि उनके भाषण में किए गए वादों से लोगों को आश्वासन मिलता है कि जो वो बोल रहे हैं उसे ही नीतियों में लागू करेंगे या फिर वो अपने किए वादे पूरे करेंगे. यानी उनकी ताक़त की जड़ उनके भाषण से जुड़ी है.
मोदी के भाषण के तीन हिस्से
मोदी के भाषण के अधिकांश विश्लेषकों ने इसे तीन चरणों में बांटा है.
पहला, वो महत्वकांक्षी नेता जिसकी चाहत दिल्ली जीतने की थी. दूसरा, मोदी ने देश, देशभक्ति और विकास की नई परिभाषा गढ़ दी. तीसरा, सत्ता, शासन और दक्षता के गूढ़ अर्थ हैं और मोदी के शब्द हुकूमत के शब्द हैं.
सभी तीन चरणों में किसी को भी एक जबरदस्त अहंकार दिख सकता है, जैसे इसने श्रोताओं को लुभाया या उन्हें वशीभूत किया.
मोदी के भाषण का पहला चरण
ये अधिक आक्रामक है, उनकी बॉडी लैंग्वेज बेहद कसी हुई, यहां तक कि उसमें धमकी का लहजा भी है. ये पूछने के लहजे में, व्यंग्य करने में और महमोहन सिंह और राहुल जैसे कांग्रेसियों पर प्रहार करते हुए है. ये चरण किसी बहस पर नहीं बल्कि बिना किसी बंदिश के किसी गढ़ को ढहाने की कोशिश है.
कांग्रेस के लिए कुछ उदाहरणों का बार-बार इस्तेमाल किया जाता है जो एक मीडिया शोध को जन्म देता है. ये ताबूत में कील ठोंकने जैसा है. फिर भी बाहर के किसी व्यक्ति का तर्क होगा कि यही तो सत्ता है. अब भी सत्ता में रहते दूसरों को तकलीफ में देखते हुए खुशी मिलती है.
इसके बावजूद ये विश्वास कि जीत का समय आ गया है. किसी ऐसे व्यक्ति की आवाज़ और बॉडी लैंग्वेज जिसने सत्ता पा लिया हो. हर गूंज में जीत की उत्कंठ इच्छा, प्रतीक्षा और धुन को महसूस किया जाता है.
मोदी के भाषण का दूसरा चरण
दूसरा चरण तो और भी ठोस है. सबसे पहले तो ड्रेस बदल जाती है. ये सत्ता पाने के जश्न जैसा एहसास कराती हुई है. राजनेता से बढ़कर राष्ट्रनेता जैसी परिपक्वता, थोड़ी नम्रता और आलोचनात्मकता से उनमें सरकार की सौम्यता दर्शाती भाषा आ जाती है. इसमें जीत की सुगंध आती है.
इसमें विकास और शासन की नई शब्दावली समाहित है. अब यह सालों के इंतजार के बारे में नहीं है. अब यह कछुए की गति से चलती कांग्रेस को बीजेपी ने पहले दिन से ही कैसे पीछे छोड़ दिया उस पर है.
ये अब भी अनिश्चित है और वो एनआरआई, संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक के नौकरशाहों से प्रशंसा पाना चाहते हैं. उनकी नीतियां गंभीर हो गईं. देश की सेवा का सबसे उपयुक्त समय है. भाषण में गांधी और पटेल को लाकर उन्हें शासन का नया मॉडल बनाया गया.
मीडिया ने मोदी के भाषणों को आधिकारिक तौर पर मोदी की बोली बताई. विकास, देशभक्ति, बलिदान, जनहित, सुरक्षा उनकी शब्दावली में आ गए. कपड़े और गंभीर हो गए लेकिन वेशभूषा से उनके ताक़तवर होने का एहसास होता है.
मोदी के भाषण का तीसरा चरण
तीसरे चरण में, जहां पृष्ठभूमि में 2019 के चुनाव आते दिख रहे हैं, चुनावी अभियान का ढंग और शासन का रंग दोनों जुड़ गए लेकिन भाषण अब तीन प्रतिष्ठित छवियों में बंट गया है- योगी आदित्यनाथ, अमित शाह और नरेंद्र मोदी.
राजनाथ और जेटली अब पार्श्व भूमिका में हैं. आदित्यनाथ लड़ाका हैं और इन नई त्रिमूर्ति के कट्टरपंथी हिस्से का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अमित शाह चतुर पार्टी प्रमुख की तरह एक संख्याबल का वादा करते हैं और मोदी धकियाते कम और तकनीकी ज्यादा हैं.
वो चाहते हैं कि उनकी उपलब्धि खुद ब खुद बोले. हमेशा की तरह अब भी उनकी तरकश में सुरक्षा, विकास जैसे शब्द बने हुए हैं. वो नीति की समरूपता पर जोर देते हुए आगे बढ़ते हुए संकेत देते हैं कि असहमति यहां वर्जित है.
लेकिन केंद्र की भाषा गुजरात के चुनावी भाषणों से अलग है. यहां मोदी पार्टी नेता नहीं प्रधानमंत्री हैं. राहुल गांधी की सोमनाथ यात्रा को कैसे लिया गया इससे जोड़ कर इसे देखा जा सकता है. अचानक ग़ैर-हिंदू, ग़ैर-भारतीय और फिर राष्ट्रद्रोही बन गया.
पादरी थॉमस मैक्वान पर हमला डरावना है. लोगों से उनकी अपील को देश प्रेमियों पर उग्र हमले के रूप में बताया गया. अचानक मोदी के आत्मविश्वास में कमी दिखती है और गुजरात चुनाव को ज़रूरत से ज्यादा महत्व दिया जाता है.
मोदी के भाषण के अन्य रंग
मोदी के भाषण का एक और हिस्सा है. जो पश्चिमी देशों को उनके जवाब, डोनल्ड ट्रंप, इवांका ट्रंप और अमरीका भक्त होने की उनकी मायूसी में दिखता है.
मोदी के महत्वकांक्षी शब्द ऊपर चढ़ते व्यक्ति से बदलकर एक आगे की ओर बढ़ते मुल्क के नेता की तरह हो गए हैं.
मोदी के भाषण विकसित देशों से हमेशा उनकी तारीफ़ चाहते हैं. वो अपनी उपलब्धियां गिनाते और असंतोष को राष्ट्रविरोधी बताते हैं.
आखिरकार, पुराने चुनावी अभियान के बयान शासन की शक्ल में आ गए. वहां आलोचना कम और खुद की प्रशंसा के असीम प्रयास किए गए, चाहे वो अर्थव्यवस्था या नए सुधारों की पेशकश को लेकर हो, विनम्रता या संशय का अभाव था.
इन्हें ऐसी बुलंद आवाज़ में पेश किया जाता है जैसे ये नीतियां हज़ारों सालों से पूरी तरह से विश्वसनीय हैं.
जैसा कि, वर्षों से उनकी बॉडी लैंग्वेज और बयानबाजी को देखते आ रहे हैं, हमें बलिदान और देशभक्ति की उनकी बोली में धार्मिकता और अहंकार से भरा एक अत्यधिक आत्मविश्वासी और दबंग व्यक्ति महसूस होता है.
हमें नए विचारों की कमी दिख रही है और इससे भी ज्यादा कृषि और शिक्षा पर उनकी चुप्पी खल रही है. साल 2019 को लेकर अब भी थोड़ा संदेह है. पार्टी और इसकी भाषा चिंताजनक रूप से लाजमी लग रहे हैं.
बीजेपी को अगले दशक के लिए कानूनी रूप से चुनने के लिए चुनाव महज एक औपचारिकता बन कर रह गए हैं.