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ब्लॉगः औरतें तीन तलाक़ देनेवाले पति को जेल क्यों नहीं भेजना चाहतीं?
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मेरे इस सवाल पर आपको ताज्जुब होगा. शायद आपको ये सवाल ही ग़लत लगे. क्योंकि आप और हम सहमत हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फ़ैसले में कहा है कि एक बार में दिया तीन तलाक़ ग़ैर-क़ानूनी है. फिर क़ानून तोड़नेवाले मर्दों को जेल में डालना ही तो अगला कदम होना चाहिए?
लेकिन नहीं, ये वो न्याय नहीं है जिसे मुस्लिम औरतें तलाश रही हैं.
मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज बिल
जब मुस्लिम औरतें एक बार में दिए तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गईं थीं, उन्होंने ऐसा शादी में रहने या उसे तोड़ने के समान अधिकार के लिए किया था.
और पति को जेल में डालना समान अधिकार हासिल करने का सबसे अच्छा ज़रिया नहीं है.
इसे कुछ यूं समझा जा सकता है कि घरेलू हिंसा और काम की जगह पर यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों के लिए भी औरतें जेल की सज़ा नहीं चाहतीं.
उसकी जगह वो ऐसे विकल्प चाहती हैं जिनके बल पर वो अपने घर और दफ़्तर में ज़्यादा अधिकार और हक़ के साथ रह सकें.
इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम मर्दों के एक बार में तीन तलाक़ कहने की प्रथा को असंवैधानिक क़रार दिया था. चाहे वो ईमेल या टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए ही क्यों ना कहा गया हो.
अब सरकार ने 'मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज बिल' का मसौदा तैयार किया है जिसके तहत एक बार में तीन तलाक़ कहनेवाले मर्द को तीन साल की जेल की सज़ा हो सकेगी.
सेक्सुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस
इससे पहले भी महिला आंदोलन ने ग़ैर-आपराधिक तरीके से अपराधों के न्याय को समझने की बात रखी थी और उसी नज़रिए से क़ानून बनवाने में सफ़ल रहीं.
मिसाल के तौर पर, 'प्रोटेक्शन फॉर वुमेन फ़्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस ऐक्ट 2005' के तहत पति को जेल नहीं भेजा जाता; बल्कि क़ानून में औरत को ससुराल में रहने का अधिकार, घरेलू हिंसा से बचने के लिए प्रोटेक्शन ऑफ़िसर, ख़र्चा दिया जाना, मुआवज़ा और बच्चों की कस्टडी के प्रावधान रखे गए हैं.
ये तरीके औरत को शादी में रहने में और हिंसा की परेशानी का हल निकालने में मदद करते हैं.
इसी तरह 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेनशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) ऐक्ट 2013' भी प्रताड़ना करनेवाले को जेल नहीं भेजता; बल्कि क़ानून में उसे नौकरी से सस्पेंड या हटाए जाने और शिकायतकर्ता को मुआवज़ा देने के प्रावधान हैं.
ये तरीके औरत को काम की जगह पर बने रहते हुए न्याय दिलाता है.
हालांकि अगर औरत को लगे कि उत्पीड़न या हिंसा ऐसी है कि उसके लिए कड़ा दंड सही होगा तो वो पुलिस के पास जाकर अन्य धाराओं के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करने के लिए आज़ाद हैं.
'मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज बिल' को भी इस अलग नज़रिए से देखने की ज़रूरत है.
फ़िलहाल ये मसौदा इस जुर्म को ग़ैर-ज़मानती बताता है. अब इसे राज्य सरकारों की राय के लिए भेजा गया है.
पर उन मुस्लिम औरतों की राय का क्या, जिन्होंने इस प्रथा को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया?
आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं चाहती मुस्लिम महिलाएं?
मुंबई के मुस्लिम महिलाओं के संगठन, 'बेबाक़ कलेक्टिव' ने अल्पसंख़्यक मामलों के मंत्री, मुख़्तार अब्बास नक़वी से मुलाकात कर कहा कि इस संदर्भ में उन्हें सज़ा दिलानेवाले न्याय में विश्वास नहीं है.
वो बोलीं, "एकतरफ़ा फ़ैसले लेकर शादी ख़त्म करनेवाले मुस्लिम मर्दों के ख़िलाफ़ हम कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं चाहते."
एक और याचिकाकर्ता 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' ने कहा कि "ये मसौदा सिर्फ़ (तलाक़ के) एक तरीके को ग़ैर-क़ानूनी बनाता है और कोई विक़ल्प भी नहीं देता."
अपनी प्रेस विज्ञप्ति में उन्होंने लिखा, "अगर एक से ज़्यादा विवाह करने की प्रथा को ग़ैर-क़ानूनी नहीं किया जाता तो मर्द तलाक़ दिए बग़ैर वही रास्ता अपनाने लगेंगे, या फिर तीन महीने की मियाद में तीन तलाक़ देने का रास्ता अख़्तियार करने लगेंगे."
सरल शब्दों में कहें तो क़ानून ऐसा होना चाहिए जो ऐसा मॉडल बनाए जिसमें दोनों पक्ष की साफ़ सहमति का प्रावधान हो, शादी को पंजीकृत करवाना ज़रूरी हो, औरत को ससुराल में रहने का अधिकार मिले वगैरह.
तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के दिए फ़ैसले से मुस्लिम महिलाओं को मिलनेवाले अधिकार की जानकारी फैलाने का तरीका तय हो.
ऐसे समाधान निकाले जाएं जो जैसी करनी-वैसी भरनी या सज़ा दिलानेवाले न्याय की जगह सकारात्मक रुख़ रखें और मुस्लिम औरतों को अपनी शादी और अपनी ज़िंदगी के बारे में आज़ाद फ़ैसले लेने में सक्षम बनाएं.
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