You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्यों 'बुलेट राजा' नहीं बन पाईं पायल?
- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
समाज की कल्पना करते ही अक्सर दिमाग में पहली छवि महिला और पुरुष की आती है.
स्कूल से लेकर सरकारी फॉर्म्स में जेंडर के सिर्फ दो कॉलम दिखते हैं - महिला और पुरुष. सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल पहले ट्रांसजेंडर्स को 'थर्ड जेंडर' के तौर पर मान्यता दी थी. लेकिन इस मान्यता को कागज़ों से ज़मीनी हक़ीक़त बनने में अभी बहुत कुछ होना बाकी है.
'थर्ड जेंडर होने की वजह से मुझे बाइक के लिए फाइनेंस कंपनी ने कर्ज़ देने से इंकार किया.'
चोलामंडलम फाइनेंस कंपनी पर ये आरोप लखनऊ में एक ट्रांसजेंडर पायल सिंह ने लगाया है. हालांकि चोलामंडलम कंपनी इन आरोपों को ख़ारिज़ करती है.
2011 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में कुल 4.88 लाख ट्रांसजेंडर्स हैं. इनमें सबसे ज़्यादा एक लाख 37 हज़ार ट्रांसजेंडर्स उत्तर प्रदेश से हैं. अगर ट्रांसजेंडर्स की साक्षरता दर की बात करें तो ये 56 फ़ीसदी है.
क्या बोलीं पायल सिंह और पुलिस?
बीबीसी से ख़ास बातचीत में पायल सिंह ने कहा, ''मेरा बुलेट खरीदने का मन था. बुलेट की कीमत डेढ़ लाख के क़रीब थी. 50 हजार रुपये तो मेरे पास थे, लेकिन एक लाख रुपये कम पड़ रहे थे. जब मैंने लोन लेना चाहा तो फाइनेंस कंपनी चोलामंडलम ने पहले तो कहा कि आप कर्ज़ मत लो. आपको 15 हजार ज़्यादा देना पड़ेगा. लेकिन जब मैं नहीं मानी तो उन्होंने मुझे आधार, आईटीआर समेत ज़रूरी कागज तैयार करने के लिए कहा.''
पायल ने बताया, ''इन कागजातों को देखने के लिए फाइनेंस कंपनी के लोग जब हजरतगंज मेरे दफ्तर आए तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया. इन लोगों ने कहा कि हम आपको कर्ज़ नहीं दे सकते क्योंकि हमारे अधिकारियों ने मना किया है. जब मैंने कहा कि अपने अधिकारियों से मेरी बात करवाइए तो उन्होंने इससे भी इंकार किया. मैंने इसकी शिकायत लखनऊ के महानगर पुलिस थाने में भी करवाई.''
महानगर पुलिस थाने के एसएचओ विकास पांडे ने बीबीसी को बताया, ''पायल ने शिकायत बुलेट कंपनी एन्फ़ील्ड के शोरूम के ख़िलाफ दी है. उनकी शिकायत शोरूम वालों के ख़िलाफ है. जब हमने शोरूम वालों से जाकर जांच की तो उन्होंने कहा कि फाइनेंस मुहैया कराने का काम हमारे शोरूम का नहीं, फाइनेंस कंपनी का है. अगर पायल को मुकदमा दर्ज करवाना है, तो थाने आकर करवा लें.''
इस पर पायल कहती हैं कि 'मैंने शिकायत में फाइनेंस कंपनी का भी नाम लिखा था.'
फाइनेंस कंपनी का पक्ष
चोलामंडलम फाइनेंस कंपनी के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन और पीआर हेड सुधीर राव ने ऐसी किसी भी घटना के होने से इंकार किया है.
सुधीर राव ने कहा, ''हमारी कंपनी में लोन देने का सिर्फ एक ही पैमाना है और वो ये कि लोन लेने वाला लोन चुका सके. मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि हमारी कंपनी में ऐसी कोई पॉलिसी नहीं है जिसमें जेंडर, धर्म या जाति की वजह से किसी से भेदभाव होता है. सिर्फ ऐसे लोगों को लोन नहीं दिया जाता है जो लोन नहीं चुका सकते हैं.''
चोलामंडलम फाइनेंस के लखनऊ दफ्तर से हमने कई बार संपर्क करने की कोशिश की. लेकिन दफ्तर के कर्मचारी बात करने से बचते नज़र आए.
सुधीर राव इस पर कहते हैं कि 'लखनऊ ऑफिस को इस बारे में बात करने का अधिकार नहीं है.'
सुधीर ने कहा, ''हमने लखनऊ ऑफिस से इस बारे में बात की है, वहां हाल के दिनों में पायल सिंह नाम से कोई ऐप्लीकेशन नहीं आई है. अगर पायल सिंह हमसे लोन लेना चाहती हैं तो हमें खुशी होगी, अगर वो लोन के लिए अप्लाई करें. हम मेरिट बेसिस पर उनकी ऐप्लीकेशन को तरजीह देंगे.''
बुलेट का शौक
पायल कहती हैं, ''आने वाले वक्त में लोगों के लिए बहुत गलत हो रहा है. पहले भी ऐसे कई वाकये हुए थे, लेकिन तब सरकार ने हमें मान्यता नहीं दी थी. लेकिन अब तो सरकार ने हमें मान्यता दी है, तब ऐसा क्यों हो रहा है. इन प्राइवेट कंपनियों की इतनी हिम्मत कि ये सरकार की बात न मानें. आधार कार्ड बनवाने जाओ तो वहां भी यही कहते हैं कि पुरुष चुनो या महिला. सरकार की बात मानी ही नहीं जा रही है.''
38 साल की पायल अपने बाइक शौक के बारे में कहती हैं, ''मैं बाइक चलाने के लिए ही मशहूर हूं. अब तक कई बाइक चला चुकी हूं. अब बुलेट खरीदने का मन है क्योंकि समाज में कई लोग बुलेट के दीवाने हैं. मुझे भी बुलेट पसंद है. लेकिन लोन नहीं मिला तो बुलेट न ले पाने का कुछ मलाल है.''
पायल का बुलेट प्रेम कर्ज़ न मिलने से ख़त्म नहीं हुआ है. वो बताती हैं, ''बुलेट तो मैं लेकर रहूंगी और वो भी किस्तों में. अब ये भी मेरी ज़िद है.''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)