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सतारा ज़िले के गांवों में महिलाएं कर रहीं मौन क्रांति
- Author, संजय रमाकांत तिवारी
- पदनाम, पुणे से बीबीसी हिंदी के लिए
महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के कारी गांव की शोभा मोरे 42 साल की हैं. इन दिनों उनके घर पर एक नेम प्लेट लगी है. इस पर परिवार के सभी महिलाओं का नाम दर्ज़ है. घर के स्वामित्व पर भी शोभा का नाम है.
शोभा के पति का एक साल पहले बीमारी से निधन हो गया था. हालांकि इससे उनके आत्मविश्वास पर कोई असर नहीं पड़ा.
पति के प्रोत्साहन के कारण वो कारी गांव की सरपंच बनी हैं और गांव में महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं पर अमल कर रही हैं.
वो बताती हैं कि उनके गांव में क़रीब 70 से 80 फ़ीसदी घरों में अब पति और पत्नी का बराबरी का हक़ है.
सातारा की सामाजिक कार्यकर्ता वर्षा देशपांडे के प्रयासों से राज्य सरकार की 'घर दोघांचे' (दोनों का घर) योजना पर अमल हो रहा है. वर्षा देशपांडे और उनके सामाजिक संगठन दलित महिला विकास मंडल के दो वर्षों से जारी प्रयासों के चलते सातारा ज़िले के 20 गांवों मे यह संभव हुआ है.
वकील वर्षा देशपांडे महिलाओं से जुड़े विषयों पर सक्रिय रही हैं. वो कहती हैं कि शराब पीकर पत्नी को पीटना और नशे के खर्च के चलते घर या ज़मीन गिरवी रखना या बेच देना आम समस्या हो चली है.
इस पर उपाय यही हो सकता था कि घर या खेती पर महिला का भी सामान हक़ हो और बेचने के लिए उसे पत्नी की भी अनुमति लेनी पड़े.
सातारा ज़िले के जानगड़ गांव की वनिता शेलके बताती हैं कि उनके गांव के कुछ मर्द शराब की लत के चलते अपनी बीवी की साड़ियां और घर में रखे अनाज को भी बेच आते हैं.
फिर उन महिलाओं को मजदूरी कर बच्चों का पेट भरना पड़ता है. उनके लिए ख़ुद कमाना मजबूरी हो गया है.
सातारा ज़िला सावित्री बाई फुले का मायका था. महात्मा ज्योतिराव फुले की सावित्री पत्नी थीं और उन्होंने भारत में स्त्री शिक्षा की पहल की थी. यहां उनका राष्ट्रीय स्मारक भी है.
सातारा के जिन घरों में महिलाओं को बराबरी का हक़ मिल पाया है वहां की स्थिति में क्या कुछ परिवर्तन हुआ है? वर्षा देशपांडे का कहना है कि घरेलू हिंसा में कमी आई है, शराब पीकर घर-बार बेचने की घटना बंद हो रही है.
अब पति शराब पीकर घर में सो जाता है. पत्नी के पास अब बराबरी का हिस्सा है और वो बेचने नहीं देती. भाषा में बदलाव आया है. ऐसे में पति को लगता है कि पत्नी लोगों के सामने अपमानित कर देगी.
साल 1990 से ज़रूरतमंद महिलाओं के लिए मुफ़्त क़ानूनी सलाह केंद्र चला रही वर्षा देशपांडे कहती हैं, ''मेरा मानना है कि घरेलू हिंसा के मामले 2005 के क़ानून के बाद लगातार बढ़े हैं. उस दौरान लड़कियों के ख़िलाफ़ इतना अन्याय थमे नहीं. दरअसल, लड़कियों को पराया धन माना जाना क्योंकि उन्हें तो शादी के बाद दूसरे घर जाना होता है. यह सोच समस्या की जड़ है.''
उन्होंने कहा, ''उसके पहले 2003 में महाराष्ट्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 'घर दोघांचे' नामक अभियान शुरू किया. इसमें पति-पत्नी दोनों को घर और ज़मीन का स्वामित्व देने का प्रवाधान है. हालांकि इसे अमल में प्रभावी तरीक़े से नहीं लाया गया. इसे हमने उठाया.
देशपांडे कहती हैं, ''हमने 20 गांवों की 500 महिलाओं को लेकर इस अमल में लाने की प्रतिबद्धता जताई. हमने 20 गांवों में विशेष ग्राम सभायें कीं ताकि पुरुष भी आएं और इस पर बहस हो. विज्ञापन दिए और इसे लेकर जमकर अभियान छेड़ा. ज़मीन के स्वामित्व में पुरुष के संग महिला का नाम लिखने में दिक़्क़त थी. उसके लिए जिसके नाम से ज़मीन है उस पुरुष की लिखित अनुमति आवश्यक है.''
विरोध पर वर्षा देशपांडे हंसकर कहती हैं, ''यदि हम यह काम 10 वर्ष पहले शुरू करते तो परेशानी होती. लेकिन, अब माहौल काफ़ी बदल चुका है. अब पति भी चाहता है कि जब उसकी मृत्यू के बाद पत्नी का नाम चढ़ना है तो अभी से क्यों नहीं? मरने से पहले यह हक़ दे देंगे तो अच्छी सेवा होगी. पुरुषों के विचार में बदलाव आ रहा है. घर के मुखिया की मौत के बाद प्रॉपर्टी के लिए झगड़े होते हैं, कटुता आती है, ये भी पुरुष लोग जानते हैं. उसे टालने के लिए ये ज़रूरी है.''
चूंकि सातारा ज़िला सावित्री बाई फुले का मायका था, लिहाजा ऐसी योजना है कि 2018 तक सातारा ज़िले में घर घर में और ज़मीन की मालकियत पर महिला का नाम पुरुष के नाम के साथ लगे. वर्षा देशपांडे आगे की योजना बताते हुए कहती हैं कि शहरों में अब भी यह नहीं हो रहा है.
उनका कहना है कि वहां भी महिलाओं को घरों में सामान हिस्सेदारी मिले. इससे उन्हें घरसे बाहर नहीं निकाला जाएगा और घरेलु हिंसा में कमी आएगी. कुल मिलाकर अभियान का अब उतना विरोध नहीं होर हा जैसी उम्मीद थी. ज़ाहिर है कि महिलाओं को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए ऐसे ही रास्ते चुनने होंगे.
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